बिहार में इस बात की बहुत चर्चा हो रही है कि लालू प्रसाद के परिवार ने सरेंडर कर दिया है। कहा जा रहा है कि लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव दोनों मायावती की गति को प्राप्त हुए हैं। गौरतलब है कि ऐन चुनाव के बीच दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव सहित परिवार के कई लोगों के खिलाफ आईआरसीटीसी में हुए कथित टेंडर घोटाले में आरोप तय किया। 13 अक्टूबर को जिस दिन आईआरसीटीसी मामले में आरोप तय किया गया उसी दिन अदालत ने रेलवे में नौकरी के बदले जमीन घोटाले में सजा सुनाने का फैसला टाल दिया। उस दिन फैसला आना था लेकिन अदालत ने उसे 10 नवंबर तक के लिए टाल दिया है। ध्यान रहे बिहार विधानसभा के दूसरे चरण का मतदान 11 नवंबर को होने वाला है। साजिश थ्योरी में विश्वास करने वाले अनेक लोग मान रहे हैं कि महागठबंधन में जो खींचतान चल रही है वह राजनीतिक नहीं है, बल्कि कानूनी है। उनका कहना है कि कानून पचड़ों से बचने के लिए राजद को समझौता करना पड़ा और उसने सीट बंटवारे में कंफ्यूजन पैदा किया ताकि महागठबंधन की लड़ाई कमजोर हो।
पता नहीं इस बात में कितनी सचाई है लेकिन यह तो हकीकत है कि महागठबंधन में सब कुछ बिखरा हुआ है। इस मामले में कांग्रेस की भी गलती है लेकिन चूंकि ड्राइविंग सीट पर राजद और तेजस्वी यादव थे इसलिए उनकी ज्यादा बड़ी गलती मानी जाएगी। दूसरी बात यह है कि कांग्रेस ने जब सीटों की घोषणा कर दी तो राजद ने उन सीटों पर भी उम्मीदवार क्यों उतारे? ऐसी कई सीटें हैं। लेकिन सबसे अहम कुटुम्बा की सीट है, जहां से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राजेश राम चुनाव लड़ रहे हैं। उस सीट पर राजद ने सुरेश पासवान को उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस की वैशाली और लालगंज सीट पर भी राजद ने उम्मीदवार उतारा और वारसलिगंज भी उम्मीदवार दिया। राजद ने किसी भी पार्टी के नेता के साथ सीट बंटवारे को लेकर ऐसा लग रहा है कि गंभीरता से बात नहीं की, जिसकी वजह से दूसरी पार्टियों के साथ भी कंफ्यूजन हुआ।
राजद के कारण ही झारखंड मुक्ति मोर्चा के साथ बात नहीं बनी। जेएमएम को दो सीटें देनी थीं लेकिन राजद ने इस मामले में कोई पहल नहीं की। नतीजा यह हुआ कि थक हार कर जेएमएम ने छह सीटों पर उम्मीदवार की घोषणा कर दी और कहा कि चार और सीटों पर प्रत्याशी उतारेगा। इतना ही नहीं पार्टी ने कहा कि झारखंड में भी वह राजद के साथ अपने गठबंधन की समीक्षा करेगी। कांग्रेस का कहना है कि जेएमएम से बात करने का जिम्मा राजद का था। इसी तरह मुकेश सहनी की वीआईपी को बिल्कुल आखिरी समय में एडजस्ट किया गया लेकिन उनके साथ भी सीटों का पेंच नहीं सुलझा, तभी उनकी सबसे अहम गौड़ाबौराम सीट पर, जहां उनके भाई संतोष सुमन उम्मीदवार हैं, वहां भी राजद का उम्मीदवार है। कांग्रेस और लेफ्ट का विवाद कम से कम दो सीटों बछवाड़ा और राजापाकड़ में है। दोनों सीटों पर दोनों पार्टियों के उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। इन सबके लिए राजद को जिम्मेदार माना जा रहा है। कहा जा रहा है कि राजद ने अगर समय रहते बात की होती और वह चुनाव को लेकर गंभीर होती तो इतनी समस्या नहीं होने वाली थी। पार्टियों के बीच मोटे तौर पर सहमति बनी हुई थी और सीटों की संख्या को लेकर भी ज्यादा परेशानी नहीं थी। लेकिन पहले तो कांग्रेस अड़ी, जिसका कारण किसी को समझ नहीं आया और फिर राजद ने सब गुड़ गोबर कर दिया। हालांकि इसके बावजूद हर सीट पर महागठबंधन की सीधी लड़ाई एनडीए से है और मुकाबला एकतरफा नहीं हुआ है।
