एक तरफ राष्ट्रीय जनता दल के अदृश्य दबाव में सरेंडर करने की खबर है तो दूसरी ओर प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी के भी मैदान छोड़ देने की चर्चा है। पिछले 10 दिन से प्रशांत किशोर लगभग पूरी तरह से मैदान से बाहर हैं। सोशल मीडिया पर उनका अभियान कमजोर हो गया है। पहले हजारों की संख्या में एक्स, फेसबुक और इंस्टाग्राम हैंडल से पीके की बातों को प्रचारित किया जाता था। कई तटस्थ दिखने वाले हैंडल से प्रशांत किशोर के बारे में प्रोपेगेंडा चलता रहता था। वे खुद हर दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे और विपक्षी पार्टियों पर निशाना साधते थे। लेकिन पिछले 10 दिन से उन्होंने यह सब बंद कर दिया है। सोचें, जिन नेताओं को उन्होंने आर्थिक भ्रष्टाचार या आपराधिक मामलों में शामिल होने के लिए निशाने पर लिया उन्होंने नामांकन किया लेकिन पीके ने किसी पर सवाल नहीं उठाया। किसी के हलफनामे में गलती निकालने का प्रयास उन्होंने नहीं किया।
सबसे हैरानी की बात है कि प्रशांत किशोर खुद चुनाव नहीं लड़े और अपनी पार्टी के किसी भी उम्मीदवार के नामांकन में नहीं गए। आमतौर पर नामांकन में बड़े नेता शामिल होते हैं और उसके बाद जनसभा को संबोधित करते हैं, जिससे उस क्षेत्र में चुनाव का माहौल बनता है। लेकिन प्रशांत किशोर ने ऐसी एक भी जनसभा नहीं की है और पहले चरण की 121 सीटों के नामांकन समाप्त हो गए। उनका दानापुर सीट का उम्मीदवार ऐन नामांकन के समय मैदान छोड़ कर भाग गया। मजबूरी में एक दूसरा उम्मीदवार उतारा गया, जिसका नामांकन खारिज हो गया। जानकार सूत्रों का कहना है कि उनको भी कहीं से फोन आया या कहीं से संदेश आय़ा, जिसके बाद वे शिथिल हो गए। इस मामले में भी उनके पूरे अभियान को एक बड़ी साजिश के साथ जोड़ कर देखा जा रहा है। हालांकि किसी को पक्की जानकारी नहीं है। परंतु जिस तरह वे और उनकी पार्टी जमीनी और वर्चुअल लड़ाई से बाहर हुए हैं उससे सवाल तो उठ ही रहा है।
