बिहार में महागठबंधन का हस्र सबके सामने है। विधानसभा चुनाव के पहले चरण का नामांकन समाप्त हो जाने के बाद तक गठबंधन की सहयोगी पार्टियों की सीटों की घोषणा नहीं हुई और अनेक सीटों पर महागठबंधन के एक से ज्यादा उम्मीदवार मैदान में हैं। इसकी शुरुआत कांग्रेस के ज्यादा सीट मांगने और सीपीआई माले के अपनी सीटें बढ़वाने की मांग से हुई थी। ये दोनों पार्टियां अड़ीं और उसके बाद राजद के साथ कई अन्य कारणों की वजह से समय रहते सीट शेयरिंग नहीं हो सकी। इसी तरह का मामला अब तमिलनाडु में देखने को मिल रहा है। गौरतलब है कि वहां अगले साल मार्च में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।
विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और सीपीआई ने ज्यादा सीटों की मांग शुरू कर दी है। कांग्रेस लोकसभा चुनाव में लडी सीटों की संख्या को आधार बना रही है और पिछले लोकसभा चुनाव में मिली सफलता का भी हवाला दे रही है। गौरतलब है कि डीएमके नेता एमके स्टालिन के नेतृत्व वाले सेकुलर प्रोग्रेसिव अलायंस यानी एसपीए में 12 पार्टियां हैं। डीएमके के बाद कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, जो पिछली बार 25 सीटों पर लड़ी थी, जिसमें से 18 सीटों पर जीती। सीपीएम को छह सीटें मिली थीं, जिनमें से वह दो सीटों पर जीत पाई। अब कांग्रेस और सीपीआई दोनों सीटें बढ़ाने की मांग कर रहे हैं। हालांकि अभी चुनाव में समय है लेकिन अगर ये दोनों पार्टियां अड़ीं तो डीएमके को मुश्किल होगी क्योंकि फिर सीपीएम, फॉरवर्ड ब्लॉक, वीसीके, एमडीएमके, मुस्लिम लीग, एमएमके आदि पार्टियां भी सीट बढ़ाने की मांग करेंगी। 230 सदस्यों की विधानसभा में डीएमके ने 173 सीटों पर चुनाव लड़ा था।
