नई दिल्ली। चुनावों से पहले ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांटने की संस्कृति पर सुप्रीम कोर्ट पर तीखी टिप्पणी की है। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि अगर सरकार लोगों को सुबह से शाम तक मुफ्त में खाना, गैस और बिजली देती रहेगी तो लोग काम क्यों करेंगे। अदालत ने कहा कि सरकार को रोजगार देने पर फोकस करना चाहिए। सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को सुनवाई के दौरान कहा कि गरीबों की मदद करना समझ में आता है, लेकिन बिना फर्क किए सबको मुफ्त सुविधा देना सही नहीं है।
असल में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड की याचिका पर की। इसमें बिजली उपभोक्ताओं की वित्तीय स्थिति पर विचार किए बगैर सबके लिए मुफ्त बिजली देने का प्रस्ताव था। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा कि देश के ज्यादातर राज्य राजस्व घाटे में हैं और फिर भी वे विकास को नजरअंदाज करते हुए मुफ्त की घोषणाएं कर रहे हैं। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के सामने ‘मुफ्त की रेवड़ी’ से जुड़ी कई याचिकाएं लंबित हैं, जिन पर तीन जजों की बेंच आने वाले दिनों में विचार करने वाली है।
बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार की सुनवाई में कहा, ‘आपको लोगों के लिए रोजगार के रास्ते बनाने चाहिए, ताकि वे कमा सकें और अपनी इज्जत और आत्म सम्मान बनाए रख सकें। जब उन्हें एक ही जगह से सब कुछ मुफ्त मिल जाएगा तो लोग काम क्यों करेंगे। क्या हम ऐसा ही देश बनाना चाहते हैं’? अदालत ने आगे कहा, ‘अचानक चुनाव के आसपास स्कीम क्यों अनाउंस की जाती हैं? अब समय आ गया है कि सभी पॉलिटिकल पार्टियां, नेता फिर से सोचें’।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ‘अगर हम इस तरह से उदारता दिखाते रहे तो हम देश के डेवलपमेंट में रुकावट डालेंगे। एक बैलेंस होना चाहिए। ऐसा कब तक चलेगा? हम भारत में कैसी संस्कृति विकसित कर रहे हैं’? अदालत ने कहा, ‘यह समझ में आता है कि कल्याणकारी योजना के तहत आप उन लोगों को राहत दें, जो बिजली का बिल नहीं चुका सकते। जो लोग भुगतान करने में सक्षम हैं और जो नहीं हैं, उनके बीच कोई फर्क किए बिना मुफ्त सुविधा देना क्या तुष्टीकरण की नीति नहीं है’?
