क्या यूक्रेन-रूस की लड़ाई से भी लंबी? संभव है! इसलिए क्योंकि रूस-यूक्रेन की लड़ाई जमीनी है। दो सेनाओं का आमना-सामना है। वही खाड़ी में धर्म-सभ्यता-इतिहास की बोतल से निकले शैतान, जिन्न, अलीबाबा के बीच की मूंछ की लड़ाई है। कौन शैतान, कौन जिन्न व कौन अलीबाबा इसका भेद बेमतलब है इसलिए क्योंकि यह कॉमन बात सभी पर लागू है कि लड़ाई का उद्देश्य हवा-हवाई है। लड़ाई से न ट्रंप ईरान को खलास कर सकते हैं और न अयातुल्लाह शासन इजराइल को मिटा सकता है। न ही नेतन्याहू मिसाइल धमाकों से ईरानी इस्लामी क्रांतिकारी गार्ड्स के खत्म कर सकते हैं।
मतलब लड़ाई का मकसद हवा-हवाई है तो लड़ाई के साधन (ड्रोन, विमान, मिसाइल, सेटेलाइट) भी हवाई हैं। और जीत या हार भी हवा-हवाई प्रोपेगेंडा! सबसे बड़ा सवाल है लड़ाई का सूत्रधार कौन है? मेरा दो टूक जवाब है- नेतन्याहू। और नेतन्याहू का क्या ट्रैक रिकॉर्ड है? नेतन्याहू के हवा-हवाई सैनिक ऑपरेशन कभी खत्म नहीं होते! सोचें, इजराइल एक छोटी सी गाजा पट्टी को दुश्मनरहित बनाने, हमास-हिजबुल्लाह के कोई 40-50 हजार आतंकियों-लड़ाकों को खत्म करने के मिशन में कितने सालों से लड़ रहा है। तो बाहर लाख ईरानियों की सेना को खत्म करने में कितना समय लगेगा? इस वास्तविकता को भी नहीं भूल सकते कि इजराइल मारता है और वे जिन्न की तरह बार-बार बोतल से निकल पड़ते हैं।
2023 में हमास की शैतानी के तीन साल बाद इजराइली सेना क्या फंसी हुई नहीं है? पर नेतन्याहू अपने स्वभाव के मारे हैं। वे नहीं थकते। तभी मौका देखा तो तुरंत लपके। 24 घंटे में तेहरान की लीडरशीप को खत्म कर कठपुतली लीडरशीप बना देने की ऐसी हवाई खुफिया जानकारियां राष्ट्रपति ट्रंप को दी जो उनके हवाई अंहकार से ईरान पर कहर बरपा।
पर शैतान-जिन्न की लड़ाई में कोई मरता नहीं है! तभी पंद्रह दिन हो गए हैं और ट्रंप खिसियाते हुए लिख रहे हैं कि ईरान के छापामार छाप सैनिकों, ड्रोन, सुरंगबाजी के आगे क्या कर सकते हैं! इतना ही नहीं ‘एनबीसी’ से इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा मुझे यह देखकर ‘हैरानी’ है कि ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के सहयोगी देशों को निशाना बनाया! बहरीन, कुवैत, सऊदी अरब, यूएई, कतर और ओमान पर ‘बिना वजह हमला हुआ’।
सोचें, नेतन्याहू ने अमेरिका को कितना बेवकूफ बनाया! पर अमेरिका में बेवकूफ बनने की जमीन बनी हुई है। वहां इन दिनों सात-आठ करोड़ इवेंजेलिकल (Evangelical) ईसाइयों की इस सोच का भूत बोतल से बाहर है जो मानता है कि यहूदियों का अपनी “प्रतिज्ञात भूमि” (इजराइल) में लौटना ईश्वर की योजना का हिस्सा है। इससे अंतकाल (End Times) की घटनाएं घटेंगी। नतीजतन मसीह का पुनरागमन होगा।
इसलिए इक्कीसवीं सदी अभूतपूर्व है। इस सदी का आरंभ सुन्नी जिहादी आंदोलन के ओसामा बिन लादेन के शैतानी हवाई मकसद में हुआ। 9/11 को आकाश से न्यूयॉर्क पर कहर बरपा। तब से निरंतर अफगानिस्तान, इराक, सीरिया हो या इजराइल (सात अक्टूबर 2023 को पैराग्लाइडर से हमास) गाजा या लेबनान तथा 28 फरवरी को तेहरान पर हवाई हमले के सिलसिले (भारत के हवाई ऑपरेशन, ऑपरेशन सिंदूर भी शामिल करें) पर यदि क्रमबद्ध सोचें तो 21वीं सदी की हवा-हवाई लड़ाइयों में क्या ऐसा कुछ भी है जो 20वीं सदी की लड़ाइयों में था?
पिछली सदी की इजराइल-अरब देशों की चार लड़ाइयों, भारत-पाकिस्तान की लड़ाइयों या वियतनाम युद्ध पर गौर करें। तब सेना-सैनिकों में शक्ति परीक्षण वास्तविक था। यह शैतानी रूप नहीं था कि गाजा में हमास के कुछ हजार लड़ाके भले खत्म न हों लेकिन साठ हजार आम नागरिकों, उनकी संपत्तियों, बसावट को गोला-बारूद बरसा कर खत्म करो। हां, तब और अब का यह साम्य जरूर उभरता है कि लड़ाई यदि हवाई, शैतानी है तो सभी का हश्र एक सा। अमेरिका ने तब साम्यवाद यानी दिमाग के वैचारिक खतरे में युद्ध किए और सबमें मुंह की खानी पड़ी। भले वह कोरिया, वियतनाम की लड़ाई हो या निकारागुआ की। ऐसे ही सोवियत संघ की तब यूरोपीय साम्राज्य से ले लेकर अफगानिस्तान की जिद में हुई सैनिक कार्रवाइयां। अमेरिका और सोवियत संघ ने अपने ख्यालों में इतने गठबंधन, इतनी कठपुतलियां बनाईं, ऐसे-ऐसे चौकीदारी प्रबंध किए लेकिन सधा कुछ नहीं। अमेरिका और सोवियत संघ अपने दायरे में भी अभेदी सुरक्षित किले साबित नहीं हुए!
विषयांतर हो रहा है। पते की बात विचारकों ने शीत युद्ध, सोवियत संघ के ढहने और वैश्वीकरण के खुलेपन से बड़ी उम्मीदें बांधी थीं। ज्ञान-विज्ञान-तकनीक की चहुंमुखी प्रगति के बूते भविष्यवाणी थी कि युद्धों-जंगखोर मनुष्यों के इतिहास की समाप्ति! लेकिन वह झूठी साबित हुई। क्योंकि विज्ञान-तकनीक के विस्फोट से मानवता को नए पंख मिले। उद्देश्य अंतरिक्ष में उड़ने का था लेकिन विमान-ड्रोन-मिसाइल का परचून भाव ऐसा निर्माण हुआ कि शैतानी को भी पंख। परिणाम सामने है। पिछले पच्चीस वर्षों की एक-एक कर तस्वीर याद करें। न्यूयॉर्क के वर्ल्ड सेंटर से लेकर ताजा ईरान, खाड़ी देशों में हवाई हमलों के विध्वंस का क्या त्रासद सत्य है? पृथ्वी के मनुष्य के जीवन की छत पहला टारगेट!
ईरान के खुमैनी ने 1979 में अयातुल्लाहशाही की नींव डालते हुए प्रण लिया था कि नक्शे से इजराइल को मिटाना है। इसके पीछे 1948 से बार-बार, चार दफा इजराइल के हाथों अरब देशों की सैनिक शिकस्त थी। उन लड़ाइयों में ईरान नहीं था। इतिहास तथ्य है कि ईरान, वहां शिया मुसलमानों का यहूदियों से पंगा नहीं रहा। उलटे सुन्नी बहुल सऊदी अरब व खाड़ी देशों का ज्यादा ईरान से पंगा रहा है। पूरी दुनिया में वहाबी सुन्नीवाद फैलाने, ओसामा बिन लादेन से लेकर बगदादी पैदा करने का असल कसूरवार देश सऊदी अरब है। मगर अमेरिकीपरस्त ईरान के शाह के खिलाफ खुमैनी की इस्लामी क्रांति थी। फिर 1979 में कार्टर प्रशासन के समय तेहरान में अमेरिकी दूतावास को बंधक बनाने की ईरानी क्रांतिकारियों की करतूत थी तो अमेरिका उससे ऐसा दहला कि उसने वैश्विक प्रतिबंध लगाए। ईरान चालीस वर्षों से प्रतिबंधों में सांस ले रहा है।
सो, अयातुल्लाहशाही भी अमेरिका-इजराइल से दुश्मनी में डींगे मारती रही। उसने इजराइल से अंततः लड़ाई के सिनेरियो में वायु सेना पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि ड्रोन-मिसाइल और पैदल सेना, क्रांतिकारी गार्ड्स, हमास, हिज्जबुल्लाह, हूती जैसे इस्लामी संगठनों को खड़ा किया।
और फिर जब समय गाजा में फिलीस्तीनियों पर इजराइल के कहर की तस्वीरों का आया तो पारा उबला। सुन्नी बहुल खाड़ी, अरब देशों, सऊदी अरब, तुर्किए आदि सभी ने ट्रंप के गले लग कर नेतन्याहू के ऑपरेशन की ओर आंखें बंद किए रखी तो ईरान पर फोकस बना। दुनिया के सवा दो अरब मुसलमानों का अपने आप ईरान रहनुमा हुआ। वही नेतन्याहू ने लगे हाथ ईरान पर फोकस बनाया। और गुजरी फरवरी वह हुआ जो इजराइल का सपना था। नेतन्याहू-ट्रंप ने ईरान की पूरी लीडरशीप को उड़ा दिया। उसका असर चौतरफा। था। दिन धर्म-सभ्यता-इतिहास की बोतल से वह जिन्न बाहर निकला, जिससे शिया हो या सुन्नी सभी खदबदाए तो यहूदी-अमेरिकी कट्टरपंथी ईसाई अंहकार में तरबतर।
इसलिए नेतन्याहू-ट्रंप ईरान को कितना ही तबाह करें, ईरान सरेंडर नहीं करेगा। ट्रंप ईरान के तेल निर्यात ठिकाने खार्ग द्वीप को तबाह कर वहां अपनी सैनिक चौकी बना लें या चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन आदि के जहाजों की होरमुज़ जलडमरूमध्य में आवाजाही करा दें लेकिन ईरान का दम नहीं टूटेगा। ईरान की नौ करोड़ आबादी, बारह लाख लोगों की सेना पर कितनी ही बमबारी हो वह भी खाड़ी को दहलाए रखेगा। नेतन्याहू-ट्रंप की शैतानी के हमराही बन कर खाड़ी के देश, सऊदी अरब, कतर आदि ईरानियों पर बमबारी नहीं करेंगे। उलटे अब ये सोच रहे होंगे कि कैसे ट्रंप को कहें कि वे अपने सैनिक अड्डे बंद करें। अपने सैनिक हटाएं। ताकि ईरान के ड्रोन रुकें।
मतलब पश्चिम एशिया में ट्रंप और अमेरिका अब एक लायबिलिटी हैं। सोचें, ट्रंप पंद्रह दिन बाद किस दशा में हैं? वे अमेरिका, अपनी रिपब्लिकन पार्टी के लिए बोझ बन रहे हैं। पर ट्रंप न लड़ाई से पिंड छुड़ा सकते हैं, न थम सकते हैं और न सरेंडर कर सकते हैं। न ही नेतन्याहू पर ठीकरा फोड़ सकते हैं। वे और उनके सलाहकार देख-समझ रहे हैं कि मामूली ड्रोन, समुद्र में बारूदी सुरंग की छापामारी अमेरिका को पस्त कर देगी। सो, ट्रंप साल के आखिर में होने वाले मध्यावधि चुनाव तक सेना को खाड़ी में झोंके रखेंगे। जबकि नेतन्याहू और उनकी तैयार किए गए जंगबाज इजराइली नेता वैसे ही लड़ते रहेंगे जैसे सब कुछ ध्वस्त कर देने के बाद भी फिलीस्तीनी इलाकों, लेबनान में लड़ते जा रहे हैं।
दरअसल खाड़ी की लड़ाई नेतन्याहू बंद करें तो इजराइल मुंह दिखाने लायक नहीं। मेरा मानना है लड़ाई अब कैच-22 का वह खेला है, जिससे बाहर निकलने का कोई विकल्प नहीं है। कोई भी तरीका, रास्ता सोचें फंसना फिर भी तय है। ट्रंप-अमेरिका अकेले पड़ गए हैं। यह स्थिति चीन के लिए आदर्श है। जैसे यूक्रेन की लड़ाई में पुतिन की पीठ थपथपा कर शी जिनपिंग ने अमेरिका, यूरोप को उलझाए रखा, उन्हें दुनिया के आगे लाचार साबित किया। वैसे ही चीन और रूस दोनों मिल कर कथित महाबली, सर्वाधिक ग्रेट अमेरिका को ईरान के आगे उलझाए रख कर चीन विश्व राजनीति, आर्थिक व्यवस्था, मुस्लिम आबादी में क्या धारणा बनवाते हुए हैं? इसे भी समझ सकते हैं कि ग्रीनलैंड आदि के अनुभवों के बाद यूरोपीय देश, लातीनी अमेरिकी देश कितना अच्छा फील कर रहे होंगे? ऊंट आया पहाड़ के नीचे! पहाड़ कौन? वह ईरान, जिसे राष्ट्रपति ट्रंप पंद्रह दिनों से मरा हुआ घोषित कर रहे हैं!
