हम लुढ़कने के लिए ही हैं!

Categorized as हरिशंकर व्यास कालम

आंखें थकती नहीं। दिमाग रुकता नहीं। तब भला बुढ़ापा कैसा होगा?

मैं बूढ़ा नहीं हूं, लेकिन उम्र सत्तर की है। और दिमाग ने लगभग पचास साल भारत और भारत के लोगों पर गौर करते हुए बिताए हैं तो शायद यही वजह है जो कोई दिन ऐसा नहीं आता जब यह सवाल मन में न उठे कि आखिर हम लोग क्या मनुष्य और पशु में फर्क समझते हैं? फर्क है भी या बस शब्दों का छलावा है?

मैं कल कोई बारह घंटे दिल्ली से 150 किलोमीटर दूर गया और लौटा। और सफर ने फिर याद दिलाया कि देश में सचमुच हवा याकि सांस में जहर साल-दर-साल घना होता जा रहा है।

सुबह साढ़े दस बजे घर से निकला। फिर भी घर से दिल्ली–मुंबई एक्सप्रेसवे पर जैसे-जैसे गाड़ी बढी तो अलवर से आगे राजगढ़ तक धुएं-जहरीली हवा की मोटी परत में बेचारा सूरज मटमैला मरा पड़ा था। हवा का प्रदूषण इतना गहरा और सघन कि कार के अंदर एसी चलने के बावजूद सांस घुटती हुई। गुरुग्राम से लेकर सोहना और फिरोजपुर झिरका तक ऐसा लगा मानों शरीर हवा नहीं, धूल खींच रही हो। गजब यह कि दिल्ली से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर के बाद जा कर राजगढ़ में सूरज धूल-धुएं की दीवार को चीरता हुआ प्रकट हुआ—थका सा, मगर जीवित।

इसके बाद नए अनुभव। एक्सप्रेसवे से नीचे उतरा तो अहसास हुआ कि आज देवउठनी ग्यारस है। गांवों की सड़कों पर आस्था और उत्सव की भीड़ थी। बड़े पैमाने पर आयोजित सामूहिक विवाह और मंदिरों की ओर जाती भीड़, और लाउडस्पीकर-डीजे भी। लौटते वक्त मैंने जो देखा, वह अकल्पनीय था। जनरेशन अल्फा के बच्चे (यानी जेड के बाद की वह नई पीढ़ी जो अभी आठ–बारह साल की है) फुटपाथ के किनारे, धुल में लुढ़कते मंदिरों की ओर जा रहे थे। मिट्टी गंदी और कचरा लिए हुए। विश्वास-आस्था उसी मिट्टी में लुढ़क रहा था जो खुद गंदगी में दम घोंट रही थी।

फिर एक और हकीकत खुली। मैं बाहर जाता हूं तो बोतलबंद पानी जरूरी होता है। आखिर रास्ते में याकि सार्वजनिक जन धर्मं में अब कही भी पेयजल का नल नहीं दिखता है। यह “विकसित भारत” की सचमुच सच्चाई है। हम गाड़ियों को उछलवाता-कूदाता एक्सप्रेसवे बनवा रहे है पर उसके किनारे की चाईनीज सामानों की साजसज्जा के आलीशान ठहरावों में  पेयजल का एक नल नहीं मिलेगा। तभी हर किसी के हाथ में बोतलबंद पानी की बोतल अनिवार्य है। इसलिए भी क्योंकि भारत में जल भी अब जल नहीं रहा है। वह एक धंधा है। संकट है इसलिए दुर्लभ वस्तु बन महंगा बिकता है।

एक और ऑब्जर्वेशन। गांव-देहात में (अलवर-दौसा पट्टी में) सड़क किनारे की गुमटियों में कोल्ड ड्रिंक डिव्यू की दो लीटर वाली बोतलें बेइंतहां दिखलाई देती हैं। मजदूर हों या किसान, सभी की आदत सी हो गई है जो फुरसत या चाय ब्रेक में इस कथित कोल्‍ड ड्रिंक की बोतल को कागज़ के गिलासों में भरकर पीते हैं। चाय की जगह अब ‘डिव्यू पानी’। लगा यह तो “अमृतकाल” ही है। भला पानी की जगह गरीब भी पैकेज बोतल का सोडा या खटा-मीठा अमृत घटक रहा है! मोदीजी के विकसित भारत के समय का अमृत गरीब का भी टाइमपास है, एक चस्का है!

कुछ वैसै ही जैसे दिल्ली के पॉश वसंत कुंज में फ्लैटों के पिछवाड़े की गलियों में पानी की टंकियों के सूने इलाके में नौजवान जनरेशन के लड़के-लड़कियों के बहके चेहरे दिखते हैं या गटकी शराब की बोतलों और कचरों का ढेर दिखता है।

इसी वसंत कुंज में दो दिन पहले अचानक (पहली बार) घर के बाहर रात में छोटे-छोटे बच्चे (कलाई पर काले धागे बांधी जरनेशन अल्फा) भूतिया रूप (हैलोवीन मनाते हुए) में दिखलाई दिए थे। सो, एक दिन पहले हैलोवीन मनाते बच्चे तो उससे डेढ़ सौ किलोमीटर दूर मिट्टी में लुढकती दर्शनार्थी जनरेशन अल्फा के चेहरे! उधर गरीब-मजदूर-किसान की डिव्यू की ड्रिंक का नजारा।

सभी दृश्य दिल-दिमाग में उमड़ते-घुमड़ते ये सवाल बना गए कि हम आखिर ऐसे कैसे हैं जहां क्या तो हवा, मिट्टी, पानी है और कैसा क्या मानस है, जिसे अहसास ही नहीं है कि वह क्या खाता-पीता और हवा लेता हुआ है और शरीर क्या-क्या भुगतता हुआ है?

जब मैं जन्मा था, और मेरा जो बचपन था तब मैंने रोटी, कपड़ा, मकान की आवश्यकता में भारत के लोगों के संघर्ष को सुना था। आज क्या है? अब हवा, पानी और मिट्टी के लिए लोगों का बेसुध संघर्ष है।

मैं शब्दों की खेती के साथ-साथ मिट्टी में कुछ असली खेती भी करता हूं। एक ‘ऑर्गेनिक शगल’। इसने मुझे गहराई से बताया है कि भारत की मिट्टी अब रसायनों में मटियामेट हो चुकी है। मिट्टी अब वह धरती नहीं है जो जीवन देती थी। वह धीरे-धीरे ज़हर उगलती है। यही कारण है जो चिकित्सा का धंधा सबसे अधिक फल-फूल रहा है।

कुछ महीने पहले मैंने एक डायटीशियन से पूछा था—हमारे घर में लोग चाय में खूब चीनी डालते थे, मिठाई खाते थे, पर किसी को डायबिटीज नहीं थी। मेरी 96 साल की बुआ आज भी स्वस्थ हैं, न उन्हें दिल की बीमारी, न डायबिटीज। पर मैं, जो पैदल चलता हूं, सावधानी रखता हूं, डायबिटिक हूं। क्यों?

उसका जवाब सपाट था—“आपके बुज़ुर्गों ने फैक्टरी में बना, प्रोसेस हुआ खाना नहीं खाया था। उनका आटा, दाल, तेल, मसाले सब घर में पिसे या स्थानीय थे। उनका खानपान प्रोसेस्ड नहीं था। वे धुआं, गंदा पानी और रासायनिक खाद से पला अनाज नहीं खाते थे।”

और मेरा मानना है कि यह कहानी, तब और अब के फर्क की वह हकीकत है जो अंग्रेजों के समय से ले कर 1960 तक जन्मे हर भारतीय की यादों में है।

तभी यक्ष प्रश्न है। बचपन की आंखों देखी और आज के कथित विकसित भारत, अमृतकाल, अंबानी-अडानी काल के समय की भारत तस्वीरों का लब्बोलुआब क्या है? पहली जरूरत, कब अंबानी-अडानी भारत के लोगों को ऑक्सीजन सप्लाई करना शुरू करेंगे? दूसरी जरूरत- कब नदियों के किनारे हमें भी वह शुद्ध जल मिलेगा जो सुना है हाल में छठ के पर्व पर दिल्ली में यमुना किनारे नरेंद्र मोदी की छठ पूजा के लिए संग्रहित हुआ था? हां, सोशल मीडिया में चर्चा रही है कि छठ के लिए यमुना की प्रायोजित साफ-सफाई में प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक ऐसा अलग खास बाड़ा बना था, जिसमें बोतलबंद जैसा पानी भरा गया। हालांकि फिर मोदी ने उसमें उतरने का इरादा छोड़ा क्योंकि स्क्रिप्ट-निर्देशन अनुसार सेट और फोटोशूट कुछ बिगड़ गया था।

मुद्दा है कि छठ या कुंभ या ऐसे कार्यक्रमों में जब माईबाप सरकार वीवीआईपी के लिए जल भंडारण कर गंगा-यमुना में जल के पवित्र छोटे-छोटे जलाशय बना सकती है तो 140 करोड़ लोगों के बोतलबंद पानी के दिन कब खत्म होंगे? गंगा जल या जल  कब स्वच्छ-सुलभ होगा? कोई न माने इस बात को लेकिन सत्य है कि हर शहर, हर आबादी पीने लायक पानी के लिए फड़फड़ाती हुई है। आरओ घर-घर पहुंच गया है और उस पानी में मिनरल, उसकी नैसर्गिक बुनावट को ले कर दस तरह के सवाल हैं! स्वतंत्र भारत ने 1947 से लेकर 2025 तक जल और उसकी आपूर्ति, उसकी स्वच्छता पर खरबों रुपए खर्च किए। मगर जल और बिगड़ा। मेरा मानना है कि मेरे बचपन में कुएं, बावड़ी और राजे-रजवाड़ों के समय की पाइप लाइन का पानी मिट्टी के घड़ों के जरिए जितना पीने लायक था वह आज की डिब्बाबंद बोतलों से भी अधिक शुद्ध और मानव शरीर अनुकूल था।

तभी सोचें, बीस-तीस साल बाद भारत की आबादी जब 160-170 करोड़ लोगों की होगी तब उनकी जरूरत के पानी, हवा और मिट्टी की सेहत कैसी होगी?

पर सच कहूं, तो अब किसी को फर्क नहीं पड़ता। दिल्ली का गैस चेंबर हर साल नया रिकॉर्ड बनाता है, पर लोग क्या करते हैं? सेल्फी लेते हैं। एक-दूसरे को दिखाते हैं  और भागने या बचने या छुपाने के नुस्खे सुझाते है! किसे फर्क पड़ रहा है दिल्ली के गैस चेंबर में घुटती सांसों से? शायद इसलिए भी कि हमने सदियों की गुलामी में गंदी हवा में सांस लेना सीख लिया है तो अब चाहे हवा में ज़हर हो या धुआं या पानी-मिट्टी खराब, “क्या फर्क पड़ता है?”

कल, देवउठवनी ग्यारस के दिन मंदिर की और लुढ़कते और उससे एक दिन पहले हैलोवीन के भूत बने जनरेशन अल्फा के बच्चों को देख मेरे मन में एक ही भाव उभरा, हम लुढ़कने के लिए ही हैं! हमारे हाथ-पांव पुरुषार्थ की मेहनत में रंगते नहीं हैं तो दिमाग में बुद्धि, विवेक खिलता ही नहीं! हम गैस चेंबर में घुटते रहेंगे तो निदान इतना ही समझ आएगा कि प्रदूषण को मापने वाले यंत्रों को बंद करा दो या उन्हें करप्ट कर दो। रिपोर्टिग ही गलत हो। प्रदूषण से सूरज भले दुबका रहे पर लोग यही मानें कि हवा ताजा है, खिली हुई है और सूरज नहीं चमक रहा है तो यह सूरज ही धोखेबाज है या खत्म होता हुआ है।

इसलिए हवा, पानी, मिट्टी पर सोचो नहीं!  सत्य नहीं पहचानो!  सत्य नहीं जानो और प्रदूषणों से लोटपोट होते हुए, उनमें डूबते, सांस लेते भगवानजी पर भरोसा रखो, मोदी-अडानी-अंबानी पर भरोसा रखो। वे हवा और ऑक्सीजन भी पाइपलाइनों से घरों में पहुंचा देंगे। इसलिए विश्वास रखिए 2047 का विकसित भारत हवा को वैसे ही डिब्बाबंद बेचता हुआ होगा जैसे पानी या मिट्टी डिब्बाबंद बोतलों, ऑर्गेनिक पैदावार को पैकेटों में बेचते हुए होंगे।

यही भारत का, आगे की पीढ़ियों का भविष्य है!


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