एयर में संकटग्रस्त इंडिया

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खबरों के मुताबिक एयर इंडिया उड़ानों में कटौती, ऑर्डर दिए विमानों की डिलीवरी लेने में देर, और विस्तार योजनाओं पर विराम लगाने जा रही है। इस बीच उसकी सेवाओं की गुणवत्ता पर भी गंभीर सवाल उठे हैं।

घाटे की दलील देकर दशकों से एयर इंडिया के निजीकरण के पक्ष में माहौल बनाया गया। कहा जाता था कि नौकरशाहों के अकुशल प्रबंधन और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण करदाताओं के हजारों करोड़ रुपए डूबाए गए हैं। आखिरकार इन तर्कों की जीत हुई। 2022 में नरेंद्र मोदी सरकार ने एयर इंडिया को टाटा ग्रुप को सौंप दिया। मगर अब हाल यह है कि सिर्फ गुजरे साल में कंपनी को तीन बिलियन डॉलर का घाटा हुआ है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इसके मद्देनजर कंपनी ने उड़ानों में कटौती, ऑर्डर दिए विमानों की डिलीवरी लेने में देर, और विस्तार योजनाओं पर विराम लगाने का फैसला किया है। इस बीच एयर इंडिया की सेवाओं की गुणवत्ता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं।

एक साल गुजरने के बाद भी एआई-171 की हुई दुर्घटना के कारण अज्ञात हैं। विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) ने कहा है कि उड़ान भरने के महज 32 सेकंड बाद हुई इस भीषण दुर्घटना की वजह के बारे में ठोस नतीजे तक पहुंचने में उसे अभी और वक्त लगेगा। उचित ही इसे एएआईबी की दर्दनाक अकुशलता का सबूत बताया गया है। गौरतलब है, एयर इंडिया के निजी हाथ में जाने के साथ भारतीय विमानन क्षेत्र में लगभग ड्यूओपॉली (दो कंपनियों का वर्चस्व) बन गई।

उनमें से एक कंपनी- इंडिगो ने पायलटों की कार्यस्थिति संबंधी नियमों को लेकर सेवाओं को ही अस्त-व्यस्त कर देने का जो कथित नजरिया अपनाया, उससे प्रतिस्पर्धा खत्म होने के जोखिम खुल कर सामने आ गए थे। आज सूरत है कि दोनों कंपनियां यात्री किराए में मनमानी बढ़ोतरी करती हैं। यात्रियों के सामने विकल्प ना होने के जितने लाभ हो सकते हैं, उन्हें उठाने के आरोप उन पर लगे हैं। यह तर्क आंशिक रूप से ही सच है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों के कारण यह सब हुआ। ऐसी अवधि कोई नहीं थी, जब ऐसे हालात सामने नहीं आते थे। तब सरकारी विमान कंपनी घाटा सहकर भी यात्रियों के हितों को तरजीह देती थी। मगर अब यात्रियों के हित प्राथमिकता में सबसे निचले पायदान पर हैं। फिर भी विमानन उद्योग संकट में है। इस उद्योग की नाकामी की इससे बड़ी मिसाल और क्या होगी?


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