एक और अविश्वास

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मुश्किलें इसलिए पैदा हुई हैं, क्योंकि सत्ता पक्ष ने पद, प्रक्रिया और परिणाम की गरिमा की चिंता छोड़ दी है। व्यापक रूप से संवैधानिक व्यवस्था की साख के साथ क्या हो रहा है, इसकी फिक्र करने की जरूरत वह नहीं समझता।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान विपक्ष ने संसदीय कार्यवाही के संचालन में अपने प्रति भेदभाव के साथ-साथ सत्ता पक्ष से स्पीकर की मिलीभगत का आरोप खुल कर लगाया। जैसा अनुमान था, अविश्वास प्रस्ताव ध्वनिमत से नामंजूर कर दिया गया। मगर जिस रोज ये हुआ, उसी दिन विपक्ष के 180 सांसदों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पेश होने वाले अविश्वास प्रस्ताव पर दस्तखत कर दिए। अब इस प्रस्ताव को दोनों सदनों में पेश किया जाएगा। विचार के लिए प्रस्ताव के स्वीकार होने की प्रक्रिया लंबी है, इसलिए इस पर बहस के लिए (अगर वो हुई तो) अभी इंतजार करना पड़ेगा।

वैसे, चर्चा हुई भी, तो यह अनुमान पहले से लगाया जा सकता है कि इसका हश्र स्पीकर के खिलाफ पेश प्रस्ताव से अलग नहीं होगा। कारण संसदीय गणित है। आज के माहौल में इसकी उम्मीद तो नहीं की जा सकती कि सत्ता पक्ष चुनाव प्रक्रिया की स्वच्छता एवं निष्पक्षता की व्यापक अपेक्षाओं को अपने दलगत हित पर तरजीह देकर समझने का प्रयास करेगा कि विपक्ष आखिर संवैधानिक पद पर बैठे एक व्यक्ति से इतना ख़फा क्यों है? और यही समस्या की जड़ है। मुश्किलें इसलिए पैदा हुई हैं क्योंकि सत्ता पक्ष ने पद, प्रक्रिया और परिणाम की गरिमा की चिंता छोड़ दी है। उसे मतदाताओं की गोलबंदी की अपनी क्षमता पर इतना भरोसा है कि व्यापक रूप से संवैधानिक व्यवस्था की साख के साथ क्या हो रहा है, इसकी फिक्र करने की जरूरत वह नहीं समझता।

नतीजा, अब तक राजनीतिक विवाद से परे माने जाने जानी संवैधानिक संस्थाएं और उनमें पदासीन प्राधिकारी अब रोजमर्रा की सियासत का मुद्दा बन गए हैं। उनको लेकर जनमत बंटता चला गया है। लोकतंत्र के दीर्घकालिक भविष्य के लिए इससे ज्यादा चिंताजनक बात कोई और नहीं हो सकती। अगर राजनीतिक समूह और जनमत के एक बड़े दायरे का मुख्य निर्वाचन आयुक्त एंव स्पीकर पर यकीन नहीं है, तो उससे चुनाव एवं संसदीय प्रक्रियाएं लांछित हो जाती हैं। जो लोग इसके खतरे को आज गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, वे इस देश के लोकतांत्रिक भविष्य से खिलवाड़ कर रहे हैं।


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