मार्क कार्नी की सोच है कि जब बड़ी ताकतें अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के कायदों को ठोकर मार रही हैं, मध्यम दर्जे की ताकतों को आपस में मिलकर अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए। भारत यात्रा में उनकी ये सोच प्रतिबिंबित हुई।
मार्क कार्नी की भारत यात्रा का सार है कि नए हालात के बीच भारत और कनाडा ने अपने रिश्तों में फंसे कांटे को निकाल कर आगे की दिशा तय की है। कनाडा के प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान तीन प्रमुख फैसले हुए। इसके तहत कनाडा 2.6 बिलियन डॉलर के यूरेनियम की आपूर्ति करने पर राजी हुआ है, दोनों देशों ने इस वर्ष के अंत तक व्यापक आर्थिक सहभागिता समझौते को अंतिम रूप देने का लक्ष्य तय किया है, और उन्होंने 2030 तक आपसी व्यापार को (पिछले साल के 23 बिलियन डॉलर से बढ़ा कर) 30 बिलियन डॉलर तक ले जाने का इरादा जताया है।
जिस दौर में व्यापार की पुरानी व्यवस्थाएं टूट चुकी हैं, दोनों देशों का अपने संबंध के व्यापारिक पहलुओं पर इस तरह ध्यान केंद्रित करना लाजिमी ही है। इसके पहले मार्क कार्नी अपनी यह सोच सामने रख चुके हैं कि जब बड़ी ताकतें अंतरराष्ट्रीय व्यवहार के कायदों को ठोकर मार रही हैं, तब मध्यम दर्जे की ताकतों को आपस में मिलकर अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए। भारत यात्रा के दौरान उनकी ये सोच प्रतिबिंबित हुई। मगर ऐसे संकेत भी मिले कि कांटा निकलने के बावजूद उसके हुआ जख्म अभी पूरी तरह भरा नहीं है। कार्नी की यात्रा के दौरान ही कनाडा की खुफिया एजेंसियों ने सिख आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या में भारतीय अधिकारियों के कथित हाथ से संबंधित सूचनाएं फिर मीडिया को लीक कीं।
उधर ये खबर भी चर्चित हुई कि कनाडा के नागरिक एक अन्य सिख चरमपंथी को उसकी जान का खतरा होने को लेकर आगाह किया गया है। इन खबरों को लेकर कनाडाई खुफिया एजेंसी के इरादों पर कूटनीतिक हलकों में कयास लगते रहे। सवाल उठा कि क्या कनाडा के सरकारी दायरे में कुछ ताकतें भारत से अपने देश के सुधरते संबंध को लेकर खुश नहीं हैं? जिस समय भारत और कनाडा ने पुरानी बातों को भूल कर आगे बढ़ने का फैसला किया है, दोनों देशों की सरकारों को ऐसी कोशिशों से सावधान रहना होगा। उन्हें दोनों देशों को जोड़ने वाले पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जिनमें भारतीय प्रवासी एक महत्त्वूपूर्ण कड़ी हैं।
