पाकिस्तान की सियासी चाल

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यह लाइन भारत की रही है कि आतंकवाद और क्रिकेट साथ-साथ नहीं चल सकते। मगर दोनों देशों के बीच मैच चलते रहें, इसकी राह भी निकाली जाती रही है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसा करने में बीसीसीआई सहायक बनती आई है।

जो फैसला भारत को लेना चाहिए था, वह पाकिस्तान ने किया है। दोनों देशों की दुश्मनी का कारोबारी फायदा उठाने के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की पाखंड भरी रणनीति का अंत होना ही चाहिए। यह लाइन भारत की रही है कि आतंकवाद और क्रिकेट साथ-साथ नहीं चल सकते। मगर दोनों देशों के बीच मैच चलते रहें, इसकी राह भी निकाली जाती रही है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसा करने में बीसीसीआई सहायक बनती आई है। इससे यह अजीब स्थिति बनी है कि टीमें मैदान पर हाथ नहीं मिलातीं, लेकिन मैच खेलती हैं। परदे के पीछे अधिकारी और खिलाड़ी एक-दूसरे के सामने मुस्कराते हैं, मगर दूसरे देश के अधिकारी से ट्रॉफी लेने से इनकार किया जाता है। जग-जाहिर है कि ऐसे पाखंड की गुंजाइश इसलिए निकाली जाती है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान के मैचों को सर्वाधिक रेवेन्यू मिलता है, जिसे पाने में प्रायोजकों और ब्रॉडकास्टर के साथ-साथ क्रिकेट अधिकारियो एवं खिलाड़ियों का भी स्वार्थ है। मगर ये सूरत टिकाऊ नहीं है। जैसे आतंकवाद और क्रिकेट साथ-साथ नहीं चलना चाहिए, वैसे ही ‘यहां खेलेंगे मगर वहां नहीं’ का दिखावा भी खत्म होना चाहिए।

बहरहाल, इन बातों से यह भ्रम नहीं बनना चाहिए कि पाकिस्तान ने पाखंड के खात्मे के लिए 15 फरवरी को भारत से होने वाले मैच के बहिष्कार का फैसला किया है। हकीकत यह है कि पाकिस्तानी अधिकारी भी इस दिखावे का अभिन्न अंग रहे हैं। मगर अब पाकिस्तान सरकार ने मैच बायकॉट का आदेश अपनी टीम को दिया है, तो उसके पीछे कारण भू-राजनीति है, जिसमें पाकिस्तान अपने लिए फायदा देख रहा है। इस बार मसला पाकिस्तान का नहीं, बल्कि बांग्लादेश का था। बात बांग्लादेशी खिलाड़ी को आईपीएल टीम- केकेआर से निकालने से शुरू हुई, जो भारत में ना खेलने की बांग्लादेश की जिद और आखिरकार आईसीसी के उसे टूर्नामेंट से निकाल देने तक चली गई। पाकिस्तान सरकार को इस प्रकरण में बांग्लादेश का साथ देने में भारत की घेराबंदी का मौका नजर आया। इसमें वो कामयाब होगी या नहीं, यह दीगर है, मगर इस कारण उसने सियासी चाल चली है। यानी बायकॉट फैसला पूर्णतः राजनीतिक है, इसमें क्रिकेट की कोई चिंता नहीं है।


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