संदेश नाकारात्मक है

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जिस समय मुक्त व्यापार समझौते के लिए भारत से वार्ता अंतिम दौर में है और इसी हफ्ते उसकी घोषणा की आशा है, जीएसपी के तहत मिली छूट की सुविधा हटाने के ईयू के कदम से नकारात्मक संदेश गया है।

भारतीय उत्पादों से सामान्यीकृत प्राथमिकता प्रणाली (जीएसपी) के तहत मिली छूट को हटा लेने के यूरोपियन यूनियन (ईयू) के फैसले पर केंद्र ने कहा है कि भारतीय निर्यात पर इसका ज्यादा असर नहीं होगा। सरकार का दावा है कि इससे भारत के सिर्फ 2.66 प्रतिशत निर्यात प्रभावित होंगे। जबकि ईयू मुख्यालय से आई खबरों में बताया गया है कि जीएसपी छूट वापस होने से वस्त्र, प्लास्टिक, धातु, इंजीनियरिंग साग्रियां सहित लगभग 87 फीसदी भारतीय निर्यात यूरोपीय बाजार में बांग्लादेश या वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों के उत्पादों की तुलना में महंगे हो जाएंगे। जिस समय मुक्त व्यापार समझौते के लिए भारत से वार्ता अंतिम दौर में है और इसी हफ्ते उसकी घोषणा की आशा है, बेशक ईयू के इस कदम से नकारात्मक संदेश गया है।

एक समझ यह है कि इससे व्यापार वार्ता में भारत की स्थिति कमजोर हुई है। जो छूट दशकों से हासिल थी, उसे बहाल कराना भी अब इस वार्ता में भारत का एक मकसद हो जाएगा। दूसरी तरफ उन रियायतों को ईयू भारत के लिए नई छूट के रूप में पेश कर सकता है। पहले ही सहमति ना बनने के कारण कृषि एवं निवेश संरक्षण जैसे क्षेत्रों को फिलहाल प्रस्तावित समझौते से अलग रखने का फैसला हुआ है। ईयू के कार्बन टैक्स का मुद्दा अभी अनसुलझा है। इस बीच “मदर ऑफ ऑल डील्स” तथा “रक्षा एवं सुरक्षा समझौता” होने जैसी बातें कही जरूर गई हैं।

मगर यह भी साफ किया गया है कि 27 जनवरी को नई दिल्ली में होने वाली भारत- ईयू शिखर बैठक के दौरान समझौतों पर दस्तखत नहीं होंगे। इस बारे में सिर्फ आम सहमति बनने की घोषणा ही अपेक्षित है। गौरतलब है कि ईयू से मुक्त व्यापार समझौते की बात दशक पुरानी हो चुकी है। डॉनल्ड ट्रंप के दौर में बने अमेरिकी दबाव के कारण ईयू और भारत दोनों नए सहभागी ढूंढने को मजबूर हुए हैं, तो इस वार्ता को तरजीह मिली है। मगर अड़चनें अभी बरकरार हैं। इसी बीच ईयू ने जीएसपी सुविधा हटा कर अटकलों को हवा दी है। ऐसा जानबूझ कर किया गया या नहीं, इस बारे में फिलहाल कयास लगाए जा रहे हैं।


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