चाबहार में हार?

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इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि ईरान स्थित जिस चाबहार बंदरगाह परियोजना को चीन को नियंत्रित करने की भारत की पहल माना जाता था, उसका संचालन अब चीन के हाथ में ही जा सकता है!

चाबहार बंदरगाह सिर्फ कारोबारी लिहाज से अहम नहीं है, बल्कि इसके साथ भारत की भू-राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं भी जुड़ी हुई थीं। इसे पाकिस्तान के ग्वादार में चीन निर्मित बंदरगाह के जवाब के रूप में देखा जाता था। इसके अलावा चाबहार से भारत को मध्य एवं पश्चिम एशिया से होते हुए यूरोप तक ऐसा मार्ग मिलने की संभावना थी, जिसमें पाकिस्तान नहीं आता। इस लिहाज से यह भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक तथा वाणिज्यिक हित को सुरक्षित बनाने वाली परियोजना है। मगर अब अमेरिकी दबाव में भारत चाबहार बंदरगाह से नाता तोड़ रहा है।

2018 में चाबहार में निर्माण कार्य आगे बढ़ाने के लिए अमेरिका ने ईरान पर लगाए अपने प्रतिबंधों में विशेष छूट दी थी। तब समझा गया था कि चीन के पसरते पांवों पर लगाम लगाने के मुद्दे पर भारत और अमेरिका में रणनीतिक साझापन है। मगर बतौर राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल में डॉनल्ड ट्रंप ने वह छूट वापस ले ली। कुछ समय बाद यानी बीते अक्टूबर में ट्रंप प्रशासन ने छह महीनों के लिए छूट की अवधि बढ़ाई। अब पता चला है कि यह समय विस्तार भारत को चाबहार परियोजना में हिसाब-किताब पूरा करते हुए अपना हाथ समेटने के लिए दिया गया। खबर है कि अमेरिका से बिना कोई प्रतिरोध जताए भारत समयसीमा के अंदर इस कार्य को पूरा कर रहा है।

इसके बाद ईरान चाबहार बंदरगाह का संचालन किसी अन्य देश को देने के लिए स्वतंत्र होगा। संभवतः ये ठेका चीन को जाएगा। इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि जिस परियोजना को चीन को नियंत्रित करने की भारत की पहल माना जाता था, उसका संचालन अब चीन के हाथ में ही जा सकता है। इसके पहले 2019 में ईरानी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने अचानक ईरान से अपनी दीर्घकालिक ऊर्जा साझेदारी खत्म कर दी थी। इस कदम ने ईरानी बाज़ार को लगभग चीन के हवाले कर दिया। चीन तब से दुनिया के सस्ते ईरानी कच्चे तेल का लगभग अकेला खरीदार है, मगर उस पर अमेरिका ने कोई कार्रवाई नहीं की है। जबकि उसकी धौंस में आकर भारत अपने हितों की बलि चढ़ाता गया है। इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और क्या होगा!


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