फिर वही रोना है

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पश्चिमी अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि चीन ने गैर-बाजार नीतियों पर चलते हुए फ्री मार्केट अर्थव्यवस्थाओं को अपने सस्ते उत्पादों से पाट दिया है। इस कारण वहां के उद्योग-धंधों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां बनी हैं। मगर हल क्या है?

साल 2025 में चीन से व्यापार में भारत का घाटा रिकॉर्ड 116.12 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। चीन सरकार के आंकड़ों के मुताबिक बीते साल भारत का निर्यात 5.5 प्रतिशत बढ़ते हुए 19.75 बिलियन डॉलर पहुंच गया, लेकिन चीन से आयात 12.8 फीसदी बढ़ कर 135.87 बिलियन डॉलर तक जा पहुंचा। 2024 में चीन से भारत का व्यापार घाटा 99 बिलियन डॉलर था। इन आंकड़ों ने देश में फिर बेचैनी पैदा की है। मगर ऐसा नहीं लगता कि इसकी बुनियादी वजहों पर कोई ऐसी ठोस चर्चा होगी, जिससे समाधान की तरफ बढ़ने में मदद मिले।

ऐसी चर्चा के लिए चीन की निर्यात क्षमता के गंभीर आकलन की जरूरत होगी। 2025 में चीन ने 1.2 ट्रिलियन डॉलर का व्यापार लाभ कमाया, जो ऐतिहासिक रिकॉर्ड है। ऐसा अमेरिका के लिए निर्यात में 20 प्रतिशत गिरावट के बावजूद हुआ। उसने यूरोप, अफ्रीका, आसियान समूह और भारत जैसे देशों में बड़ी मात्रा में निर्यात बढ़ाने में कामयाबी पा ली। इस तरह उसने अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिका के व्यापार युद्ध से अप्रभावित बनाए रखा है। पश्चिमी अर्थशास्त्रियों ने इसका कारण उसकी “अत्यधिक उत्पादन क्षमता” एवं देश के अंदर “कम उपभोग” को बताया है। कहा है कि चीन ने “गैर-बाजार” नीतियों पर चलते हुए फ्री मार्केट अर्थव्यवस्थाओं को अपने सस्ते उत्पादों से पाट दिया है। इस कारण वहां के उद्योग-धंधों के लिए प्रतिकूल परिस्थितियां बनी हैं।

मगर हल क्या है? पश्चिमी देश अपने यहां मजदूरी महंगी होने को समाधान के रास्ते में बाधा बताते हैं। मगर भारत जैसे देश पर तो यह बात लागू नहीं होती। भारत में औसत मजदूरी चीन से छह गुना सस्ती है। यह भारत के लिए लाभ का पहलू है। फिर भी भारत को इसका फायदा नहीं मिल रहा है, तो कारण इन्फ्रास्ट्रक्चर का महंगा एवं अपर्याप्त होना, अनुसंधान पर न्यून खर्च, और कुशल कर्मियों का अभाव है। साथ ही उद्योग घरानों की कायम हुई मोनोपॉली या कार्टेल बनाने की उनकी प्रवृत्तियों ने बाजार में प्रतिस्पर्धा कुंद कर रखी है। इन मसलों का हल भारतीय नीति-निर्धारकों को ही ढूंढना होगा। चीन से आयात-निर्यात के आंकड़ों पर साल-दर- साल रोने से कुछ हासिल नहीं होगा।


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