आत्म-निरीक्षण की जरूरत

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जिन देशों में पहले भारतीय छात्रों को प्रतिभाशाली एवं शिष्ट समझा जाता था, वहां उनके प्रति नजरिया क्यों बदल गया है? भारतीय छात्र जाकर वहां की अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं। फिर भी उनकी एंट्री क्यों कठिन होती गई है।

विदेश जाकर पढ़ने की हसरत रखने वाले भारतीय छात्रों को एक और झटका लगा है। इस बार खबर ऑस्ट्रेलिया से आई है, जहां भारतीय छात्रों की वीजा अर्जी को उच्चतम जोखिम श्रेणी में डाल दिया गया है। इस फैसले के साथ ऑस्ट्रेलिया ने भारत को उसी श्रेणी में रख दिया है, जहां पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल पहले से हैं। उन्होंने इसका कारण बताया है- भारतीय छात्रों की ‘विश्वसनीयता संबंधी’ बढ़ा जोखिम। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक भारत में फर्जी डिग्री संबंधी घोटालों के हुए खुलासों की अंतरराष्ट्रीय मीडिया में खूब चर्चा हुई। अब उसका नतीजा सामने आया है। इसके पहले भारतीय छात्रों के लिए कनाडा और ब्रिटेन जाना भी कठिन हुआ है।

पिछले वर्ष कनाडा ने भारतीय छात्रों के लिए जारी होने वाले वीजा में 31 प्रतिशत कटौती की। साथ ही जीवन यापन शुल्क में बढ़ोतरी कर दी गई। ब्रिटेन में भारतीय छात्रों के लिए वीजा एवं ई-वीजा शुल्क में बढ़ोतरी की गई है। साथ ही अब सिर्फ पीएचडी और रिसर्च छात्र ही अपने जीवनसाथी या बच्चों को ब्रिटेन ले जा सकेंगे। वीजा पाने के लिए आमदनी का पहले से अधिक बड़ा स्रोत उन्हें दिखाना होगा। अमेरिका में तमाम विदेशी छात्रों के लिए हालात जिस तरह बिगड़े हैं, वे अब रोजमर्रा की सुर्खियां हैं। उनसे भी सबसे ज्यादा प्रभावित भारतीय छात्र ही हुए हैँ। मुद्दा यह है कि जिन देशों में अभी कुछ वर्ष पहले तक भारतीय छात्रों को प्रतिभाशाली एवं शिष्ट समझा जाता था, वहां उनके प्रति नजरिया क्यों बदल गया है?

विदेशी छात्र उन तमाम देशों के शिक्षा क्षेत्र में आय का बड़ा स्रोत हैं। भारतीय छात्र भी वहां जाकर अपना ही पैसा खर्च करते हैं। इसके बावजूद उनकी एंट्री कठिन बना दी गई है। क्या इसका संबंध उन देशों में भारत की बदली छवि से है? या वहां भारतीयों के व्यवहार ने स्थानीय आवाम एवं सरकारों के कान खड़े किए हैं? भारतवासियों को इन प्रश्नों पर गंभीरता से आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। कोई भी देश अपने यहां किसे किन शर्तों पर आने देगा, यह तय करना उसका अधिकार है। भारतीयों अगर वहां जाना है, तो उन्हें उनकी कसौटियों पर खरा उतरना होगा।


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