घुप्प अंधकार की खाई

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इस्लामी व्यवस्था की समर्थक शक्तियां अब बांग्लादेश की राजनीतिक मुख्यधारा का हिस्सा हैं, जिनका वैचारिक या सांगठनिक मुकाबला करने वाली कोई शक्ति प्रभावशाली नहीं रह गई है। समाज उग्रता एवं चरमपंथ की तरफ बढ़ता नजर आ रहा है।

बांग्लादेश में हिंसा और उपद्रव की ताजा घटनाओं का संकेत है कि वहां ऐसी चिनगारियां लगातार सुलग रही हैं, जो कभी भी देश को दीर्घकालिक अराजकता में धकेल सकती हैँ। महजबी कट्टरपंथ ने सूरत-ए-हाल को और खतरनाक बना रखा है। यह साफ है कि पिछले साल अगस्त में छात्र आंदोलन के कारण हुए तख्ता पलट के बाद बनी अस्थायी सरकार सामाजिक स्थिरता कायम करने में नाकाम रही है। शेख मुजीबुर्रहमान की विरासत के साथ-साथ भारत विरोध को भी उच्छृखंल ताकतों ने भीड़ जुटाने का जरिया बना रखा है। पिछले साल के छात्र आंदोलन के नेता शरीफ उस्मान हादी की हत्या के बाद बेकाबू हुई भीड़ ने जिस तरह के ठिकानों पर हमले किए, उससे यह बात फिर साफ हुई। उदारवादी अखबारों के दफ्तरों को तहस- नहस किया गया और भारत से संबंधित स्थलों पर हमले हुए। एक हिंदू व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या कर दी गई।

बांग्लादेश प्रशासन का आरोप है कि हादी के हत्यारे भागकर भारत चले गए हैं। उसने भारत से उन्हें वापस भेजने की मांग की है। इस इल्जाम ने भारत विरोधी माहौल को और हवा दी है। मगर घटनाएं यहीं तक सीमित नहीं रहीं। शनिवार को हादी की अंत्येष्टि के बाद जिस तरह एक बड़ी भीड़ ने संसद भवन पर धावा बोला, वह बांग्लादेश के भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है। हमलावरों ने साफ कहा कि वे आधुनिक ढंग की संसदीय व्यवस्था नहीं चाहते, बल्कि शरिया कानून पर आधारित इस्लामी व्यवस्था लागू करना उनका मकसद है। इस्लामी व्यवस्था की समर्थक शक्तियां अब बांग्लादेश की राजनीतिक मुख्यधारा का हिस्सा हैं, जिनका वैचारिक या सांगठनिक मुकाबला करने वाली कोई शक्ति प्रभावशाली नहीं रह गई है। ऐसे में अगले 12 फरवरी को होने वाले संसदीय चुनाव में भी मुख्य मुकाबला अपेक्षाकृत उदार और कट्टरपंथी इस्लामी ताकतों के बीच ही होगा। इन परिस्थितियों में अक्सर सियासी चर्चाएं अधिक उग्र और जज्बाती रूप लेती हैं, जो आखिरकार समाज को उग्रता एवं चरमपंथ की तरफ ले जाती हैं। बांग्लादेश में ऐसी ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति पैदा होती नजर आ रही है। इन हालात के उपमहाद्वीपीय परिणाम हो सकते हैं। इसको लेकर सतर्क एवं सचेत हो जाना चाहिए।


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