करार में संभल के

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ट्रंप के लिए गोल-पोस्ट बदल लेना आम बात है। रूस से तेल खरीदारी रुकवाने तक वे सीमित रहेंगे, यह सोचना भूल है। ब्रिक्स+ से अलगाव और भारतीय पूंजी का अमेरिका में निवेश करवाना उनकी अगली प्राथमिकताएं हो सकती हैं।

भारत सरकार जिसे पहले देश की ऊर्जा जरूरतों के मुताबिक अपना संप्रभु निर्णय कहती थी, उस मामले में झुकने का संकेत देकर उसने सारी दुनिया में बहुत गलत संदेश भेजा है। ताजा घटनाओं से अमेरिकी राष्ट्रपति का यह दावा सच होता दिखा है कि इस वर्ष के अंत तक रूस से कच्चे तेल की खरीदारी रोक देने का गुपचुप आश्वासन उन्हें दिया गया। इन खबरों के बाद चर्चा फिर गर्म है कि द्विपक्षीय व्यापार वार्ता पर दोनों देश सहमति की ओर बढ़ रहे हैं। कुछ मीडिया रिपोर्टों में तो यहां तक बताया गया है कि अब समझौते का प्रारूप लिखा जा रहा है। प्रस्तावित समझौते में कृषि एवं डेयरी क्षेत्रों को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोलने की ट्रंप प्रशासन की मांग पर भारत कहां तक झुकेगा, यह अभी साफ नहीं है।

मगर वह सिर्फ एक मुद्दा है। डॉनल्ड ट्रंप की कार्यशैली से जाहिर है कि ट्रेड डील उनके लिए सिर्फ व्यापार घाटा पाटने का जरिया नहीं है। बल्कि इसे उन्होंने अमेरिका के व्यापक भू-राजनीतिक हितों को साधने का औजार बना रखा है। ऑपरेशन सिंदूर रुकवाने के संदर्भ में उनके दावे भी इसी बात की पुष्टि करते हैं। फिलहाल एक विज्ञापन को आधार बना कर जिस तरह उन्होंने कनाडा से व्यापार वार्ता तोड़ दी, उससे यही संकेत मिला है कि ट्रंप के लिए गोल-पोस्ट बदल लेना आम बात है। यानी वे रूस से तेल खरीदारी रुकवाने तक सीमित रहेंगे, यह सोचना भूल है।

ट्रंप ने ब्रिक्स+ को निशाने पर ले रखा है, जिससे भारत को अलग करवाना उनका अगला मकसद बन सकता है। फिर भारतीय पूंजी का अमेरिका में निवेश करवाना उनकी आगे की प्राथमिकता हो सकती है। व्यापार समझौतों में उन्होंने ऐसा करने के लिए कई देशों को मजबूर किया है। यह साफ है कि जो देश कमजोरी दिखाते हैं, उनके ऊपर और चढ़ते जाना उनकी कार्यशैली का हिस्सा है। इसीलिए ताजा घटनाक्रम भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। झुक कर किया गया ट्रेड डील भारत की स्वायत्त पहचान पर कलंक लगाएगा, जिसका खराब असर अन्य द्विपक्षीय रिश्तों पर पड़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि केंद्र अभी से भी संभल जाए।


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