मणिपुर का जटिल रास्ता

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मैतई और कुकी-जो के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरा चुकी है कि उनमें से किसी एक को पसंद आने वाले करार से दूसरा समुदाय भड़क जाता है। दोनों समुदायों के बीच भड़की हिंसा के बाद से हालात सुलगते रहे हैं।

केंद्र और मणिपुर के कुकी-जो समुदाय के विद्रोही संगठनों के बीच एक दूसरे पर हमला ना करने के हुए समझौते और उसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय राजमार्ग-2 को आम परिवहन के लिए खोलने के एलान से जगी उम्मीदों पर 24 घंटों के अंदर बड़ा प्रहार हुआ, जब प्रमुख मैतेई संगठन ने इस समझौते को नकारने की घोषणा कर दी। मैतेई संगठन कॉ-ऑर्डिनेशन कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी (सीओसीओएमआई) ने इसे “मूलवासी आवाम और उनके प्रतिनिधियों पर अलोकतांत्रिक और वर्चस्ववादी ढंग से थोपा गया समझौता” बता दिया। संगठन ने ध्यान दिलाया कि मणिपुर की तत्कालीन एन. बीरेन सिंह सरकार ने 10 मार्च 2023 को एक ऐसे ही समझौते को सर्व-सम्मति से रद्द कर दिया था।

इस प्रतिक्रिया ने जता दिया है कि मणिपुर में जमीनी हालात कितने पेचीदा हैं। मैतई और कुकी-जो के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरा चुकी है कि उनमें से किसी एक को पसंद आने वाले करार से दूसरा समुदाय भड़क जाता है। हकीकत यही है कि मई 2023 में इन दोनों समुदायों के बीच भड़की हिंसा के बाद से हालात सुलगते रहे हैं। इस दौरान ढाई सौ से अधिक लोगों की जान गई, जबकि 50 हजार से ज्यादा लोग विस्थापित जीवन जी रहे हैं। इन हालत का बड़ा दोष केंद्र पर जाता है, जिसने हिंसा भड़ने के बाद लंबे समय तक एन. बीरेन सिंह की भाजपा सरकार की जवाबदेही तय नहीं की। इस दौरान बीरेन सिंह सरकार पर आरोप रहा कि वह मैतेई समुदाय की तरफ से काम कर रही है।

इससे कुकी-जो समुदायों में विरोध भाव गहराता गया। खाई बेहद चौड़ी होने के बाद जब बीरेन सिंह को हटाया गया, तो उसे मैतई समुदाय ने अपने साथ नाइंसाफी माना। इस बीच नस्लीय पहचान और भूमि अधिकारों से जुड़े प्रश्नों पर दोनों समुदायों में अधिकतम संभव सहमति बना कर मसलों को हल करने की कोशिश नहीं की गई। नतीजा सामने है। अब खबर है कि इस हफ्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मणिपुर जाने वाले हैं। उससे पहले कुकी-जो समुदाय से करार हुआ। मगर मैतेई समुदाय ने उसे ठुकरा कर प्रधानमंत्री की यात्रा के लिए सद्भावपूर्ण माहौल बनाने की कोशिश में पलीता लगा दिया है।


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