स्वतंत्र सोच पूरी तरह सिकुड गई!

कभी समय था जब सियासी असहमति का मतलब बहसबाजी थी। तथ्य तौलने के लिए रखे जाते थे। तब तर्कों की कसौटी होती थी, और गर्मागर्म बहस में भी सामने वाले की सोच के प्रति सम्मान होता था। वह समय अब मानों प्रागैतिहासिक काल है। ईमानदारी से सोचना भी अब दुश्मन बनाना है। असहमति मानो युद्ध… Continue reading स्वतंत्र सोच पूरी तरह सिकुड गई!

यह जनवाद कब भरोसा गंवाएंगा?

भारत इन दिनों अलग ही तरह के नए जनवाद की लहर पर सवार है। हर चुनाव इस ज्वार को और ऊँचा कर देता है। लहर अब इतनी प्रबल है कि न क्षितिज दिख रहा है, न नीचे की धारा। सवाल है क्या यह लहर कभी टूटेगी? क्या एक ऐसा देश, जिसने लोकप्रिय राष्ट्रवाद को इतना… Continue reading यह जनवाद कब भरोसा गंवाएंगा?

सवाल अब विपक्ष की मूर्खताओं पर है!

कितना हैरानी भरा है यह! आप चाहें तो सिर पकड़ लें, मन टूटता महसूस करें, चिंता में घुल जाएँ, पर सच दो टूक, अडिग खड़ा है। फिर साबित हुआ है कि लोकसभा चुनाव में झटके के बाद राज्यों में भाजपा का लगातार जीतते जाना केवल संगठन की वजह से नहीं बल्कि प्रबंधकीय  कौशल से है।… Continue reading सवाल अब विपक्ष की मूर्खताओं पर है!

क्यों जेनरेशन जेड़ में राहुल फ्लॉप?

कांग्रेस को अब आत्ममंथन की ज़रूरत नहीं है बल्कि कायाकल्प याकि राजनीतिक पुनर्जन्म, या फिर एक शांत, गरिमापूर्ण राजनैतिक मौत की जरूरत है। लोकसभा चुनावों को डेढ़ वर्ष बीते हैं। और इस दौरान कांग्रेस हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली तथा अब बिहार में हारी है। ‘हार’ कहना भी नरम शब्दों में बात रखना है। ग्यारह वर्षो से… Continue reading क्यों जेनरेशन जेड़ में राहुल फ्लॉप?

सोशल मीडिया धीरे-धीरे ढ़ह रहा है?

एक समय था जब फॉलोअर्स की संख्या से क़ीमत तय होती थी। जिसके ज़्यादा अनुयायी, वही असरदार, वही ‘प्रासंगिक’। मतलब भीड़ का आकार ही पहचान था, पहुँच थी, यहाँ तक कि ताक़त भी। लेकिन ‘द न्यूर्याकर में छपे ताजा लेख (It’s Cool to Have No Followers Now)  ने बताया कि यह तर्क चुपचाप ढह चुका… Continue reading सोशल मीडिया धीरे-धीरे ढ़ह रहा है?

भारत अब विरोध नहीं करता

और इसलिए नहीं क्योंकि हम एक संतुष्ट, आत्मसंतोषी देश बन चुके हैं बल्कि इसलिए कि हम विरोध करना ही भूल गए हैं।पिछले एक हफ़्ते से ज़्यादा समय से दिल्ली अपनी ही हवा में घुट रही है। कुछ चिंतित नागरिकों ने इसलिए इंडिया गेट पर एकत्र होकर विरोध दर्ज करने का निर्णय लिया। यह प्रदर्शन तमाशा… Continue reading भारत अब विरोध नहीं करता

नीतीशः बनाई विरासत से ज़्यादा रहना!

सत्ता, एक बार मिल जाए तो छूटती नहीं। वह धीरे-धीरे रगों में आदत बनकर उतर जाती है,  और फिर वही मृगतृष्णा बनी हुई होती! यह भारत के लोकतंत्र की खास पहचान है। जो नेता ज़िंदगी भर सीढ़ियाँ चढ़ते हैं, वे शिखर को ही फिर नियति मान लेते हैं। जितना ज़्यादा ठहरते हैं, उतना ही खुद… Continue reading नीतीशः बनाई विरासत से ज़्यादा रहना!

बिहार में कहानी उसी की जो ट्रेंड करना जानता है!

बिहार को मैं दूर से देख रही हूँ! कुछ वैसे ही जैसे एक ही सूरज ढलते हुए हर बार कुछ अलग लगता है, फिर भी हर बार वैसा ही। रिपोर्टरों की रिपोर्टों से, विश्लेषणों से और बिहार की नब्ज़ पकड़ने का दावा करने वाले सर्वेक्षणों की गणित में लोग अनुमानों, प्रतिशतों में चाहे जितने बंटे… Continue reading बिहार में कहानी उसी की जो ट्रेंड करना जानता है!

जब ख़बरें ‘नई’ लगना बंद कर दे

डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वे तीस साल बाद फिर से परमाणु परीक्षण शुरू करेंगे। उधर पाकिस्तान ने धमकी दी है कि तालिबान को फिर से गुफ़ाओं में धकेलने के लिए वह अपने जखीरे का “एक अंश” खोल देगा। ग़ाज़ा में एक और रात रॉकेटों के आसमान तले गुज़री। इज़राइल की ताज़ा हवाई बमबारी… Continue reading जब ख़बरें ‘नई’ लगना बंद कर दे

जीवित रहने की बहस में सकंल्प कब?

क्या जलवायु चिंता से शुरू कोप (COP) सम्मेलन कुछ मायने रखता हैं? या सिर्फ बस एक नौटंकी है? यह प्रश्न अब स्थाई है पर बेचैन करने वाला, आवश्यक भी, मगर अनुत्तरित। क्या COP सम्मेलन से तनिक भी कुछ बदलता हैं? फिलहाल ब्राज़ील के बेले (Belém) में COP30 की तैयारी हो रही है। सो “पार्टियों का… Continue reading जीवित रहने की बहस में सकंल्प कब?

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