वक़्त की छटपटाहट है ‘इक्कीस’

‘इक्कीस’ कई स्तरों पर काम करती है। एक स्तर पर यह साहस और कर्तव्य की कहानी है; दूसरे स्तर पर यह उम्र और ज़िम्मेदारी के असंतुलन की पड़ताल करती है। फ़िल्म यह सवाल उठाती है कि वीरता क्या है, क्या वह डर का न होना है, या डर के बावजूद आगे बढ़ना? यहां वीरता किसी… Continue reading वक़्त की छटपटाहट है ‘इक्कीस’

राजतंत्र के फ़र्ज़ी जनतंत्र का मुख-श्रंगार

मुद्दआ तो यह है कि सब जानते हैं कि मुद्दआ क्या है, मगर सब यह पूछने से पिंड छुड़ाते भाग रहे हैं कि मुद्दआ क्या है? जब तक हम सवालों का सामना नहीं करते, तब तक हर 365 दिनों बाद एक नया बरस आएगा, हर 365 दिनों बाद एक पुराना बरस जाएगा और हम अपने… Continue reading राजतंत्र के फ़र्ज़ी जनतंत्र का मुख-श्रंगार

नए साल का संदेशः हौसला नहीं छोड़ना !

नया साल उत्साह भरता है। पर देखे नए साल का भी ….कोई पाइंट ऐसा नहीं होना चाहिए जहां से आप आगे बढ़ सकें। हर चीज में शक पैदा कर दो उसे अस्वीकार्य घोषित कर दो ताकि सिर्फ ढलान ही ढलान बचे। अब कविता बना रहे है कि  ये नव वर्ष हमें स्वीकार नहीं। हिम्मत होती… Continue reading नए साल का संदेशः हौसला नहीं छोड़ना !

भारत की संभावनाओं की कुंजी

भारत को ऐसी सोच चाहिए जो व्यक्ति को केवल डेटा बिंदु नहीं, एक स्वायत्त, समझदार, गरिमामय नागरिक माने। एक ऐसी लोकतांत्रिक सोच जो यह माने कि प्रगति केवल आंकड़ों से नहीं, आशाओं और अवसरों से भी मापी जाती है। क्यों शिक्षा और तकनीक को नेतृत्व करना चाहिए? प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एजाज़ ग़नी (मेरे जेएनयू के मित्र… Continue reading भारत की संभावनाओं की कुंजी

धार्मिक पर्यटन से तीर्थ शहरों को मुश्किले

धार्मिक नगरीय संतुलन को डगमगा दिया है। छोटे नगरों की सीमित सड़कों, आवासों और संसाधनों पर अचानक लाखों की भीड़ का दबाव प्रशासन के लिए बड़ा सिरदर्द बन गया है। पर्यावरणीय दबाव, कचरा प्रबंधन और जल संकट जैसी समस्याएँ अब इन नगरों के स्थायी साथी बन चुके हैं। उल्लेखनीय है कि भारत में भीड़ प्रबंधन… Continue reading धार्मिक पर्यटन से तीर्थ शहरों को मुश्किले

क्रिसमस, आतंकवाद और बेबस यूरोप

आखिर भय का माहौल कौन बना रहा है? फ्रांसीसी मीडिया में मैनहैटन इंस्टीट्यूट के आप्रवासन सदस्य डैनियल डी मार्टिनो के हवाले से कहा गया है, “स्पष्ट है कि यह यूरोप में बिना समुचित जांच के बड़े पैमाने पर मुस्लिम प्रवासन का परिणाम है।” यह घटनाक्रम एक ऐसे गहरे संकट को उजागर करता है, जिसमें तथाकथित… Continue reading क्रिसमस, आतंकवाद और बेबस यूरोप

सबकी खुशहाली के बिना कैसा लोकतंत्र?

हकीकत यह है कि जो राजनीतिक अधिकार मिले होते हैं, समाज की बहुसंख्यक आबादी उनके उपभोग के लिए भी सक्षम नहीं होती। उन्हें सक्षम बनाने का दायित्व राज्य नहीं लेता। ऐसे में सारे अधिकार वास्तव में प्रभु वर्ग के लिए सीमित रह जाते हैं। इसीलिए ऐसे चुनावी लोकतंत्र में बनने वाली सरकारें प्रभु वर्ग के… Continue reading सबकी खुशहाली के बिना कैसा लोकतंत्र?

भाजपा में नई सुबह का आगाज

भारतीय जनता पार्टी ने संगठन में बिना शोर शराबे के इतना बड़ा परिवर्तन किया और उसे इतने सहज तरीके से स्वीकार कर लिया गया, जो भाजपा का अलग और विशिष्ठ चरित्र दिखाता है। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन को पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के साथ साथ देश के समस्त कार्यकर्ताओं, नेताओं ने भी… Continue reading भाजपा में नई सुबह का आगाज

‘रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स’

‘रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स ‘उन फ़िल्मों में से नहीं है जो तालियां बटोरे। यह उन फ़िल्मों में है जो असुविधा पैदा करती हैं और यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।…नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का अभिनय यहां किसी संवाद या भावुक दृश्य का मोहताज नहीं। उनका चेहरा ही इस फ़िल्म का सबसे सशक्त संवाद है। आंखों… Continue reading ‘रात अकेली है: द बंसल मर्डर्स’

दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के आगे बेबस तंत्र

कागज़ पर सरकार ने कड़े कदमों का एक पूरा ढांचा बनाया है, लेकिन ज़मीनी असर सीमित है। यह वही कहानी है, जिसमें ज़िम्मेदारी सबकी है और जवाबदेही किसी की नहीं। बेबसी महज़ संसाधन समस्या नहीं, राजनीतिक प्राथमिकताओं की भी कहानी है। चुनावी बहस में प्रदूषण अभी भी हाशिये का मुद्दा है। इसलिए ‘आपातकालीन’ प्रेस कांफ्रेंस… Continue reading दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण के आगे बेबस तंत्र

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