विरह और वापसी का सिनेमाई राग: ‘मैं वापस आऊंगा’

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इम्तियाज़ अली की यह फ़िल्म हमें याद दिलाती है कि सीमाएं देशों को बांट सकती हैं, लेकिन स्मृतियों को नहीं। समय शरीर को बूढ़ा कर सकता है, लेकिन प्रेम को नहीं। और शायद इसलिए फ़िल्म का शीर्षक अंततः एक वादा बन जाता है, “मैं वापस आऊंगा। किसी व्यक्ति की तरह नहीं, बल्कि उस प्रेम की तरह जो कभी मरता नहीं।

सिने -सोहबत

इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों की दुनिया में प्रेम कभी सीधी रेखा में नहीं चलता। वह हमेशा भटकता है, टूटता है, खुद को खोजता है और अंततः किसी गहरे आत्मबोध तक पहुंचता है। ‘जब वी मेट’ का प्रेम आत्मविश्वास देता है, ‘रॉकस्टार’ का प्रेम विनाश की ओर ले जाता है, ‘तमाशा’ का प्रेम पहचान की खोज बन जाता है और ‘अमर सिंह चमकीला’ में प्रेम सामाजिक प्रतिरोध का रूप ले लेता है। लेकिन उनकी नवीनतम फ़िल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ इन सबसे अलग है। यह प्रेम को भारतीय इतिहास के सबसे बड़े मानवीय विस्थापन, ‘विभाजन’ की पृष्ठभूमि में रखकर देखती है और इस प्रश्न को उठाती है कि क्या प्रेम सीमाओं, धर्मों, देशों और समय से भी बड़ा हो सकता है। आज के ‘सिने-सोहबत’ में इम्तियाज़ अली की सबसे ताज़ा फ़िल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ पर एक विमर्श करते हैं।

‘मैं वापस आऊंगा’ 1947 के विभाजन से उपजी वास्तविक मानवीय कहानियों से प्रेरित है और एक ऐसी प्रेमकथा कहती है जो दशकों तक स्मृति में जीवित रहती है। इसमें दिलजीत दोसांझ, शरवरी, वेदांग रैना और नसीरुद्दीन शाह जैसे कलाकार हैं, जबकि संगीत एआर रहमान का है और गीत इरशाद कामिल के।

फ़िल्म का शीर्षक पहली नज़र में किसी व्यक्ति की वापसी का संकेत देता है, लेकिन फ़िल्म देखते हुए धीरे-धीरे समझ आता है कि यहां लौट कर आने वाला कोई इंसान नहीं, बल्कि प्रेम है। वह प्रेम जिसे इतिहास ने अधूरा छोड़ दिया था, जिसे राजनीतिक सीमाओं ने बांट दिया था और जिसे स्मृतियों ने जीवित रखा।

इम्तियाज़ अली ने विभाजन को किसी राजनीतिक विमर्श की तरह नहीं बरता। वे न तो इतिहास पढ़ाते हैं और न ही राष्ट्रवाद का कोई भाषण देते हैं। उनका फ़ोकस उन लोगों पर है जिनकी ज़िंदगी इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं हुई। उन प्रेमियों पर, जो अचानक दो देशों में बांट दिए गए। उन परिवारों पर, जिनके लिए सीमा रेखा किसी नक्शे पर नहीं, दिल के आर-पार खिंची थी।

फ़िल्म का सबसे बड़ा गुण यही है कि यह विभाजन को आंकड़ों में नहीं, आंसुओं में मापती है। इम्तियाज़ अली को अक्सर भावुक रोमांटिक फ़िल्मकार कहा जाता है, लेकिन ‘मैं वापस आऊंगा’ में वे अपने सबसे संयमित रूप में दिखाई देते हैं। पटकथा कहीं भी दर्शक को जबरन रुलाने की कोशिश नहीं करती। दर्द धीरे-धीरे भीतर उतरता है।

‘मैं वापस आऊंगा’ की कहानी दो समय-रेखाओं में चलती है। एक विभाजन के दौर की और दूसरी वर्तमान की, जहां अतीत की स्मृतियां अब भी जीवित हैं। यह संरचना हमें ‘टाइटैनिक’ या ‘द नोटबुक’ जैसी फ़िल्मों की याद दिला सकती है, लेकिन इम्तियाज़ इसे पूरी तरह भारतीय संवेदना के साथ गढ़ते हैं।

फ़िल्म का सबसे प्रभावशाली पक्ष इसका धैर्य है। आज के तेज़-रफ्तार सिनेमाई दौर में, जहां हर पांच मिनट पर कोई बड़ा घटनाक्रम चाहिए होता है, इम्तियाज़ दर्शकों को रुककर महसूस करने का अवसर देते हैं।

यदि फ़िल्म का भावनात्मक केंद्र कोई है तो वह हैं नसीरुद्दीन शाह। उन्होंने उम्र के अंतिम पड़ाव पर खड़े एक ऐसे व्यक्ति की भूमिका काफ़ी सूक्ष्मता से निभाई है जो अपनी स्मृतियों में जीवित है। ये भूमिका इतनी गहरी है कि इसे हाल के वर्षों के सर्वश्रेष्ठ अभिनय प्रदर्शनों में गिना जा सकता है। उनकी आंखों में प्रतीक्षा का जो अथाह समुद्र दिखाई देता है, वह शब्दों से परे है।

वेदांग रैना फ़िल्म का सुखद आश्चर्य हैं। युवा प्रेमी के रूप में उनमें मासूमियत भी है और बेचैनी भी। कई दृश्यों में वे इतने सहज लगते हैं कि अभिनय दिखाई ही नहीं देता। वे लगातार प्रभाव छोड़ते हैं।

शरवरी ने अपने किरदार को अत्यंत गरिमा के साथ निभाया है। उनकी उपस्थिति फ़िल्म को भावनात्मक संतुलन देती है। वे किसी पारंपरिक ‘हीरोइन’ की तरह नहीं लिखी गई हैं, बल्कि कहानी की आत्मा का हिस्सा हैं।

दिलजीत दोसांझ अपेक्षाकृत कम नाटकीय लेकिन बेहद महत्वपूर्ण भूमिका में हैं। वे दर्शकों और अतीत के बीच पुल का काम करते हैं। उनकी सहजता फ़िल्म को ज़मीन से जोड़े रखती है।

किसी इम्तियाज़ अली फ़िल्म की चर्चा संगीत के बिना अधूरी है। रॉकस्टार, हाईवे और तमाशा के बाद एक बार फिर एआर रहमान और इम्तियाज़ की जोड़ी जादू रचती है। यहां संगीत कहानी के ऊपर नहीं बैठता, बल्कि उसके भीतर बहता है। कई गीत सुनने से अधिक महसूस किए जाते हैं। रहमान का संगीत विभाजन की त्रासदी को किसी शोर में नहीं बदलता; वह उसे स्मृति की तरह बरतता है।

इरशाद कामिल के बोल भी उल्लेखनीय हैं। वे प्रेम को बड़े-बड़े रूपकों में नहीं बांधते, बल्कि साधारण शब्दों में असाधारण भावनाएं व्यक्त करते हैं।

फ़िल्म के सिनेमैटोग्राफ़ी की विशेष चर्चा होनी चाहिए। कैमरा केवल घटनाएं रिकॉर्ड नहीं करता, बल्कि समय को दर्ज करता है। पंजाब के खेत, पुराने रेलवे स्टेशन, धूल भरी सड़कें, भीड़ से भरी ट्रेनें और बिछड़ते हुए लोग, हर फ्रेम में एक उदासी तैरती है। लेकिन यह उदासी निराशाजनक नहीं, बल्कि काव्यात्मक है। फ़िल्म  के कई दृश्य किसी पुराने पारिवारिक एलबम की तस्वीरों जैसे लगते हैं जिन्हें वर्षों बाद फिर से देखा जा रहा हो।

भारतीय सिनेमा में अब तक विभाजन पर कई महत्वपूर्ण फिल्में बनी हैं जैसे ‘गरम हवा’, ‘पिंजर’, ‘ट्रेन टू पकिस्तान’  इत्यादि। लेकिन ‘मैं वापस आऊंगा’ इन फिल्मों से इसलिए अलग है क्योंकि यह इतिहास को केंद्र में नहीं रखती। यहां इतिहास पृष्ठभूमि है और प्रेम ‘अग्रभूमि’ यानी की फ़ोरग्राउंड।

यह फ़िल्म यह नहीं पूछती कि विभाजन क्यों हुआ? यह पूछती है कि उसके बाद प्रेम का क्या हुआ?

और यही प्रश्न इसे विशिष्ट बनाता है।

जैसे चांद में भी कुछ दाग होते ही हैं, सो ‘मैं वापस आऊंगा’ में भी कुछ कमियां ज़रूर हैं।

ये फ़िल्म उत्कृष्ट तो है, पर पूर्ण नहीं।

पहले हिस्से में गति थोड़ी धीमी महसूस हो सकती है। कुछ दर्शकों को यह शिकायत भी हो सकती है कि फ़िल्म राजनीतिक और सामाजिक जटिलताओं को पर्याप्त विस्तार से नहीं छूती। कई बार लगता है कि इम्तियाज़ जान बूझकर इतिहास की कठोरता से दूरी बनाए रखते हैं ताकि प्रेमकथा पर फ़ोकस बना रहे। यह एक रचनात्मक चुनाव है, लेकिन हर दर्शक इससे सहमत हो, ज़रूरी नहीं। इसके अलावा कुछ सहायक पात्रों को और विस्तार दिया जा सकता था। फिर भी ये कमियां फ़िल्म के समग्र प्रभाव को बहुत अधिक कम नहीं करतीं।

पिछले कुछ वर्षों में इम्तियाज़ अली के काम को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं रही थीं। लेकिन ‘मैं वापस आऊंगा’ उन्हें उनके सर्वश्रेष्ठ रूप में स्थापित करती है।

यह फ़िल्म बताती है कि वे अभी भी भारतीय सिनेमा के सबसे संवेदनशील प्रेम-कथाकारों में से एक हैं। यहां वे अपने पुराने रोमांटिक अंदाज़ को इतिहास की गंभीरता के साथ जोड़ते हैं और एक ऐसी फ़िल्म रचते हैं जो मनोरंजन से कहीं आगे जाती है।

‘मैं वापस आऊंगा’ केवल एक प्रेमकथा नहीं, बल्कि स्मृति, प्रतीक्षा और मानवीय संबंधों पर बनी एक गहरी फ़िल्म है। यह विभाजन की त्रासदी को राजनीतिक नारेबाज़ी में नहीं बदलती, बल्कि उसे इंसानी चेहरों पर पढ़ती है। फ़िल्म खत्म होने के बाद भी इसके पात्र हमारे साथ बने रहते हैं। उनकी प्रतीक्षा, उनकी अधूरी बातें, उनके सपने और उनका प्रेम।

शायद यही किसी महान प्रेमकथा की सबसे बड़ी पहचान है कि वह पर्दे पर समाप्त नहीं होती।

इम्तियाज़ अली की यह फ़िल्म हमें याद दिलाती है कि सीमाएं देशों को बांट सकती हैं, लेकिन स्मृतियों को नहीं। समय शरीर को बूढ़ा कर सकता है, लेकिन प्रेम को नहीं। और शायद इसलिए फ़िल्म का शीर्षक अंततः एक वादा बन जाता है, “मैं वापस आऊंगा”। किसी व्यक्ति की तरह नहीं, बल्कि उस प्रेम की तरह जो कभी मरता नहीं।

आपके नज़दीकी सिनेमाघर में है। देख लीजियेगा।  (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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