आपसी फूट ने ही इतिहास बिगाडा

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इतिहास चेतावनी देता है कि मजबूत सेना भी बिखरे हुए समाज को नहीं बचा सकती। यदि आज का भारत जाति, भाषा या इंटरनेट पर फैलाए जा रहे प्रचार के कारण फिर से आपस में लड़ने लगा, तो वह प्राचीन भारत के उन राजाओं की तरह ही होगा जिन्होंने आपसी ईर्ष्या में अपनी स्वतंत्रता खो दी थी।

भारत हमेशा बाहरी सैन्य श्रेष्ठता के कारण नहीं, बल्कि अदंरूनी कमजोरियों और आपसी संघर्ष से इतिहास का मारा है। बाहरी आक्रमणकारियों की सफलता का मुख्य कारण शासकों की सैन्य कमजोरी नहीं, बल्कि उनके बीच की पारस्परिक फूट और एकता की कमी थी। भारतीय राजाओं ने अक्सर पड़ोसी शत्रु को विदेशी आक्रमणकारी से अधिक बड़ा खतरा माना। जब-जब देश को एकजुट मोर्चे की आवश्यकता थी, तब-तब क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं और आपसी दुश्मनी ने राष्ट्र को कमजोर किया। जिसके कारण प्राचीन और मध्यकालीन भारत में राजनीतिक एकता कुल और वंश के झूठे अहंकार की भेंट चढ़ गई।

महाभारत में द्वापर युग के कौरव-पांडव संघर्ष और भगवान श्रीकृष्ण के सामने ही उनके कुल के राजा और राजकुमारों के आपसी अहंकार और गुटबाजी के कारण आपस में लड़कर समाप्त होने तथा पौराणिक ग्रंथों में अनेक कुल और वंशों में आपसी फूट की कथाएं भरी पड़ी हैं। आधुनिक ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार पृथ्वीराज चौहान और जयचंद के बीच हुआ चौहान और गहड़वाल संघर्ष भारतीय इतिहास की सबसे चर्चित और विनाशकारी फूट मानी जाती है। दिल्ली और अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान और कन्नौज के राजा जयचंद के बीच व्यक्तिगत और राजनीतिक दुश्मनी इतनी गहरी थी कि 1192 ईस्वी में हुए तराइन के दूसरे युद्ध में जयचंद तटस्थ रहा।

पृथ्वीराज चौहान की हार ने भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना का रास्ता खोल दिया। पृथ्वीराज चौहान और जयचंद की व्यक्तिगत दुश्मनी ने मोहम्मद गोरी के लिए दिल्ली के दरवाजे खोल दिए। यह भारतीय इतिहास का वह मोड़ था, जहां देशहित से ऊपर स्वार्थ को रखा गया। यदि ये दो बड़ी शक्तियां साथ होतीं, तो गोरी का भारत में टिकना असंभव था। इसी तरह पाल, प्रतिहार और राष्ट्रकूटों ने कन्नौज पर अधिकार के लिए 200 वर्षों तक एक-दूसरे की शक्ति कमजोर की, इस त्रिपक्षीय संघर्ष से उत्तर-पश्चिम सीमा असुरक्षित हो गई और अरब आक्रमणकारियों को पैर जमाने का मौका मिला।

मध्य भारत और दक्कन के राज्यों, जैसे मालवा के परमार और गुजरात के चालुक्य के बीच सदियों तक वर्चस्व की लड़ाई चली। राजा भोज जैसे प्रतापी शासक भी अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा पड़ोसी हिन्दू राज्यों से लड़ने में खर्च करते रहे। जैन और चारण साहित्य में इन राजाओं के बीच के युद्धों का विस्तृत वर्णन मिलता है। जब तुर्क आक्रमणकारी उत्तर भारत को रौंद रहे थे, तब मध्य भारत के ये राज्य आपसी सीमाओं के लिए संघर्ष में उलझे थे, जिससे उनकी सैन्य और आर्थिक शक्ति कमजोर हो गई। 1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों का साथ न देने वाले जाट और राजपूत शासकों ने अनजाने में अंग्रेजों के लिए रास्ता तैयार किया।

सिंधिया, होल्कर, गायकवाड़ आदि मराठा सरदारों की आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण मराठा संघ के बिखराव ने मराठा साम्राज्य को भीतर से कमजोर कर दिया। अंग्रेजों ने भारतीयों की इसी मानसिक दरार को पहचान लिया। उन्होंने सैन्य युद्धों से अधिक कूटनीतिक युद्ध लड़े। सहायक संधि और लैप्स की नीति के माध्यम से अंग्रेजों ने एक हिन्दू राजा को दूसरे के विरुद्ध सुरक्षा का लालच दिया। 1857 का उदाहरण देते हुए लॉर्ड कैनिंग ने स्वयं स्वीकार किया था कि यदि ग्वालियर के सिंधिया और अन्य रजवाड़े विद्रोहियों के साथ मिल जाते, तो अंग्रेजों को भारत उसी समय छोड़ना पड़ता।

राजाओं में यह फूट केवल राजनीतिक नहीं थी, बल्कि सामाजिक भी थी। डॉ. अंबेडकर और सावरकर दोनों ने बताया कि समाज का एक बड़ा वर्ग (दलित और पिछड़े) अधिकारों से वंचित था। जब बहुसंख्यक आबादी को राष्ट्र की मुख्यधारा से अलग रखा गया, तो उनमें देश की रक्षा का सामूहिक भाव विकसित नहीं हो सका। नालंदा और विक्रमशिला जैसे केंद्रों का विनाश इसलिए संभव हुआ

क्योंकि उस समय कोई भी एकीकृत भारतीय सेना उनके बचाव के लिए खड़ी नहीं हो सकी। आज के डिजिटल युग में फूट का स्वरूप बदल गया है, लेकिन उद्देश्य वही है। विदेशी ताकतें आज भी सोशल मीडिया प्रचार के माध्यम से जाति, भाषा और क्षेत्रीयता के आधार पर भारतीयों को बांटने का प्रयास करती हैं। साइबर और विचार युद्ध के माध्यम से यह काम आज विदेशी ताकतें और विपक्षी पार्टियां खुलकर कर रही हैं। भारत का संविधान अनुच्छेद 1 और सरदार वल्लभ भाई पटेल द्वारा किया गया रियासतों का एकीकरण, इतिहास की इसी फूट से ली गई सबसे बड़ी सीख है।

विविधता में एकता केवल नारा नहीं, बल्कि भारत की सुरक्षा की अनिवार्य शर्त है। इतिहास का यह कठोर सत्य है कि जब-जब घर बंटा, पड़ोसी ने फायदा उठाया। प्राचीन काल की क्षेत्रीय रियासतें हों या आधुनिक काल की राजनीतिक दलों की दुश्मनी, यदि राष्ट्र प्रथम नहीं है, तो नुकसान तय है। भारत की संप्रभुता की रक्षा उसकी सेना से अधिक उसकी आंतरिक एकता पर निर्भर है। प्राचीन और मध्यकालीन भारत की आपसी फूट की ऐतिहासिक गलतियां आज के छद्म युद्ध और सूचना युद्ध के युग में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई हैं। वर्तमान में शत्रुओं ने हथियारों के स्थान पर विचारों को बांटने को अपना हथियार बनाया है। आज के दौर में विदेशी ताकतें सीधे युद्ध के बजाय मानसिक युद्ध का सहारा लेती हैं। इसके मुख्य साधन सोशल मीडिया और इको चैम्बर हैं। अंग्रेजों की तरह ही चीन अथवा पाकिस्तान समर्थित तत्व और अन्य विदेशी एजेंसियां सोशल मीडिया एल्गोरिदम का उपयोग करके भारतीयों को छोटे-छोटे वैचारिक समूहों में बांटती हैं। जब एक व्यक्ति केवल अपनी जाति अथवा विचारधारा के इको चैम्बर में रहता है, तो वह पूरे राष्ट्र के हित को भूल जाता है।

जातिगत संघर्ष या धार्मिक विवाद जैसे पुराने घावों को डिजिटल माध्यमों से उभारकर फेक न्यूज और ऐतिहासिक नैरेटिव के जरिए समाज में अविश्वास पैदा किया जाता है। यह ठीक वैसा ही है, जैसे अंग्रेजों ने रियासतों के बीच पुराने विवादों को हवा दी थी। जैसे मध्यकाल में राजाओं ने सुरक्षा के लिए अंग्रेजों से संधि की थी, वैसे ही आज डेटा और तकनीक के लिए विदेशी कंपनियों पर अत्यधिक निर्भरता एक नए प्रकार की सहायक संधि बन सकती है।

इतिहास चेतावनी देता है कि मजबूत सेना भी बिखरे हुए समाज को नहीं बचा सकती। यदि आज का भारत जाति, भाषा या इंटरनेट पर फैलाए जा रहे प्रचार के कारण फिर से आपस में लड़ने लगा, तो वह प्राचीन भारत के उन राजाओं की तरह ही होगा जिन्होंने आपसी ईर्ष्या में अपनी स्वतंत्रता खो दी थी। राष्ट्रीय एकता अब केवल एक सामाजिक मूल्य नहीं, बल्कि भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक आवश्यकता है।


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