श्रीराम का मर्यादित जीवन

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श्रीराम के जीवन का सबसे बड़ा आधार सत्य है। वाल्मीकि रामायण में उन्हें सत्यवादी और दृढव्रतः कहा गया है। श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने मानवीय सीमाओं अर्थात मर्यादाओं में रहकर वह सर्वोच्च आचरण प्रस्तुत किया, जो आज भी मानवता का पथ-प्रदर्शक है।

महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित रामायण केवल एक महाकाव्य नहीं, बल्कि आदर्श जीवन का वह दर्पण है जिसमें मर्यादा शब्द को जीवंत रूप दिया गया है। श्रीराम को मर्यादा पुरुषोत्तम इसलिए कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने मानवीय सीमाओं अर्थात मर्यादाओं में रहकर वह सर्वोच्च आचरण प्रस्तुत किया, जो आज भी मानवता का पथ-प्रदर्शक है। श्रीराम के जीवन का सबसे बड़ा आधार सत्य है। वाल्मीकि रामायण में उन्हें सत्यवादी और दृढव्रतः कहा गया है। जब राजा दशरथ ने उन्हें वनवास का आदेश दिया, तो उन्होंने बिना किसी शोक या क्रोध के उसे स्वीकार किया। अयोध्या कांड में श्रीराम स्वयं स्वीकारते हैं-

रामो द्विर्नाभिभाषते।

अर्थात- राम दो बार नहीं बोलते।

राम की बात अटल होती है। उन्होंने पिता के वचन को निभाने के लिए राजपाट का मोह क्षण भर में त्याग दिया। वाल्मीकि ने राम को धर्म का साक्षात विग्रह माना है- रामो विग्रहवान् धर्मः। उनके लिए धर्म का अर्थ किसी संकीर्ण पूजा पद्धति से नहीं, बल्कि कर्तव्य से था। एक पुत्र, भाई, पति और राजा के रूप में उन्होंने सदैव निजी सुख के ऊपर कर्तव्य को स्थान दिया। अयोध्या कांड में जब भरत उन्हें वापस लेने वन में जाते हैं, तब श्रीराम उन्हें कच्चित् सर्ग के माध्यम से राजधर्म का उपदेश देते हैं, जो एक शासक के लिए नीतिशास्त्र का सर्वोत्तम ग्रंथ है। माता कैकेयी, जिनके कारण उन्हें वनवास हुआ, उनके प्रति भी राम के मन में कभी कटुता नहीं रही। वन से लौटकर उन्होंने सबसे पहले कैकेयी के चरण स्पर्श किए। लक्ष्मण और भरत के प्रति उनका प्रेम निःस्वार्थ था। लक्ष्मण के मूर्छित होने पर विलाप करते हुए वे कहते हैं कि देश-देश में स्त्रियां मिल सकती हैं, सगे संबंधी मिल सकते हैं, पर सहोदर भाई मिलना कठिन है। सुग्रीव और विभीषण के साथ उनकी मित्रता में ऊँच-नीच या स्वार्थ का स्थान नहीं था। एक सामान्य मनुष्य के समान राम रोते हैं, दुखी होते हैं और क्रोध भी करते हैं, लेकिन कभी अपनी गरिमा नहीं लांघते। समुद्र से रास्ता मांगते समय जब वह प्रार्थना से नहीं मानता, तब राम क्रोधित होते हैं, लेकिन वह क्रोध भी केवल लक्ष्य प्राप्ति के लिए था, विनाश के लिए नहीं। अरण्य कांड में सीता के अपहरण के बाद उनका विलाप उनके गहरे मानवीय प्रेम को दर्शाता है, किन्तु वे विलाप में भी कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होते। श्रीराम की मर्यादा की पराकाष्ठा रावण के साथ उनके व्यवहार में दिखती है। युद्धभूमि में जब रावण निहत्था हो जाता है, तो राम उसे मारते नहीं, बल्कि कहते हैं- थक गए हो, आज घर जाओ, कल शस्त्र लेकर आना। युद्ध कांड में रावण की मृत्यु के बाद राम विभीषण से कहते हैं-

मरणान्तानि वैराणि।

अर्थात-  मृत्यु के साथ ही वैर समाप्त हो जाता है।

श्रीराम ने रावण का विधिवत अंतिम संस्कार करवाया।

वाल्मीकि रामायण के केवट संवाद और भरत मिलाप श्रीराम के सबसे भावुक और मर्यादित प्रसंगों में शामिल हैं। केवट संवाद तो मर्यादा और प्रेम का संगम ही है। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में अंकित केवट संवाद के अनुसार जब श्रीराम वनवास के लिए निकले तो गंगा तट पर उनकी भेंट केवट से हुई। केवट ने प्रभु के चरणों को धोने की जिद की, क्योंकि उसने सुना था कि उनके चरणों की धूल से पत्थर की अहिल्या नारी बन गई थी। उसे डर था कि कहीं उसकी काठ की नाव भी स्त्री न बन जाए। श्रीराम ने उसकी इस भोली और प्रेमभरी शर्त को सस्मित अर्थात मुस्कुराते हुए स्वीकार किया। यहां श्रीराम की मर्यादा यह है कि वे एक राजा के पुत्र होकर भी एक साधारण केवट के सामने झुकते हैं ताकि वह अपना काम अर्थात पैर धोना कर सके। वे ऊँच-नीच के भेदभाव को पूरी तरह मिटा देते हैं। मर्यादा की पराकाष्ठा यह है कि जब केवट उन्हें पार उतार देता है, तब श्रीराम उसे उत्तराई अर्थात किराया देना चाहते हैं। वे खाली हाथ थे, तो सीता जी ने अपनी रत्नजड़ित मुद्रिका अर्थात अंगूठी दी। केवट ने उसे लेने से मना कर दिया, यह कहते हुए कि हम दोनों एक ही व्यवसाय के हैं, मैं नाव से पार उतारता हूं, आप भवसागर से। श्रीराम ने उसके इस निस्वार्थ प्रेम को सम्मान दिया और उसे गले लगा लिया।

भरत मिलाप प्रसंग में त्याग और कर्तव्य की पराकाष्ठा दिखाई देती है। चित्रकूट में जब भरत अपनी सेना और माताओं के साथ श्रीराम को वापस अयोध्या ले जाने आते हैं, तो वह दृश्य भ्रातृ प्रेम का विश्वकोश बन जाता है। भरत को लगता था कि उनके कारण श्रीराम को कष्ट हुआ है। वे नंगे पैर चलकर श्रीराम के पास पहुंचे। वाल्मीकि लिखते हैं कि जैसे ही श्रीराम ने धूल से धूसरित भरत को देखा, वे दौड़कर उनसे लिपट गए। यहां श्रीराम अपनी राजसी गरिमा भूलकर केवल एक बड़े भाई बन गए। भरत ने श्रीराम से प्रार्थना की कि वे अयोध्या लौटें और राज्य संभालें। राम के सामने दो मर्यादाएं थीं- एक तरफ छोटे भाई का प्रेम और दूसरी तरफ पिता का वचन। श्रीराम ने भरत को समझाते हुए कहा कि पिता की आज्ञा का पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने भरत से कहा-

यद् यथा पित्रा कथितं, तत् तथा कर्तव्यम्।

अर्थात- पिता ने जैसा कहा, वैसा ही करना चाहिए।

अंत में, भरत ने राम की खड़ाऊँ अर्थात पादुका माँगी। राम ने अपनी पादुकाएं दे दीं, जिन्हें भरत ने अपने सिर पर रखा। यहां श्रीराम की मर्यादा यह है कि उन्होंने राज्य का मोह नहीं किया, और भरत की मर्यादा यह कि उन्होंने सिंहासन पर न बैठकर, राम की पादुकाओं को प्रतिनिधि मानकर 14 वर्ष तक तपस्वी का जीवन जीया। ये दोनों प्रसंग सिखाते हैं कि शक्ति और सत्ता होने के बावजूद सामान्य जन के प्रति प्रेम और सम्मान रखना चाहिए। अपनों के लिए और सत्य के लिए बड़े से बड़े पद का त्याग कर देना चाहिए।

शबरी प्रसंग और हनुमान मिलन की घटनाएं श्रीराम के जीवन में प्रेम और मैत्री की पराकाष्ठा को दर्शाती हैं। वाल्मीकि रामायण के अरण्य कांड में वर्णित शबरी का प्रसंग सिद्ध करता है कि श्रीराम के लिए जाति, कुल या सामाजिक स्थिति का कोई महत्व नहीं था। उनके लिए केवल भाव प्रधान था। शबरी एक वृद्ध तपस्विनी थीं, जो मतंग ऋषि के आश्रम में रहती थीं। उन्होंने वर्षों तक केवल इस विश्वास पर प्रतीक्षा की कि उनके गुरु के वचनों के अनुसार राम यहां अवश्य आयेंगे। जब श्रीराम और लक्ष्मण वहां पहुंचे, तो शबरी ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार कंद-मूल और फल अर्पित किए। वाल्मीकी लिखते हैं कि राम ने उन फलों को बड़े चाव से ग्रहण किया। यह राम की मर्यादा थी कि उन्होंने एक वनवासी वृद्धा के प्रेमपूर्ण निमंत्रण को राजसी भोग से ऊपर रखा। राम ने शबरी को साध्वी कहकर संबोधित किया और उनसे उनके तप के बारे में पूछा। यह दर्शाता है कि राम स्त्री शक्ति और उनकी तपस्या का कितना सम्मान करते थे।

किष्किंधा कांड में अंकित श्रीराम- हनुमान मिलन प्रसंग विवेक और परख का अद्भुत उदाहरण है।

हनुमान श्रीराम की वास्तविकता जानने के लिए एक भिक्षुक ब्राह्मण का रूप धरकर आए थे। उन्होंने बड़े ही चतुर और विद्वतापूर्ण तरीके से श्रीराम से उनका परिचय पूछा। हनुमान के बोलने के ढंग से श्रीराम अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने लक्ष्मण से कहा-

नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम्।

अर्थात- निश्चित ही इन्होंने संपूर्ण व्याकरण का अनेक बार अध्ययन किया है।

श्रीराम ने हनुमान की वाणी में शुद्धता और विनय को तुरंत पहचान लिया।

जब हनुमान ने अपना असली रूप प्रकट किया और राम के चरणों में गिरे, तो श्रीराम ने उन्हें उठाकर गले लगा लिया। यह एक स्वामी और सेवक का मिलन नहीं, बल्कि दो महान आत्माओं का मिलन था। इसी मिलन ने आगे चलकर सुग्रीव के साथ मित्रता और रावण के विरुद्ध विजय की नींव रखी। इस प्रकार शबरी प्रसंग सिखाता है कि ईश्वर केवल प्रेम के भूखे हैं, वे आडंबर के नहीं। हनुमान मिलन सिखाता है कि योग्य व्यक्ति की पहचान उसकी वाणी और उसके आचरण से होती है।


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