अमरीका-ईरान युद्ध से पूर्व सैनिक चिंतित

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भारत को अपनी गलती सुधारनी चाहिए। तटस्थ रहकर शांति की बात करनी चाहिए। ईरान से संबंध वापसी सुधारने चाहिए। तेल आयात के वैकल्पिक रास्ते तलाशने चाहिए। भारत की विदेश नीति हमेशा सभी के साथ, किसी के खिलाफ नहींरही है। मोदी सरकार को इस सिद्धांत पर लौटना चाहिए। क्योंकि अंत में भारत का हित सबसे ऊपर है सस्ता तेल, सुरक्षित नौकरियां और मजबूत अर्थव्यवस्था।

फिलहाल दुनिया की सबसे बड़ी चिंता है – तेल के दाम। पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस और हर चीज महंगी हो रही है। क्यों? क्योंकि अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला कर दिया। मार्च 2026 की शुरुआत में ही सुप्रीम लीडर अली खामेनी समेत ईरान के कई बड़े नेता मारे गए। ईरान ने जवाब दिया, मिसाइलें और ड्रोन दागे। अब युद्ध दो सप्ताह से ज्यादा चल रहा है। तेल 110 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। होर्मुज की खाड़ी, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है, को बंद किए जाने का खतरा भी मंडरा रहा है।

दुनिया भर के युद्ध व कूटनीति विशेषज्ञ इस पूरे मामले को लेकर काफ़ी गंभीर हैं। भारत के बात करें तो रिटायर्ड मेजर जनरल जी डी बख्शी स्पष्ट शब्दों में इस युद्ध का विश्लेषण कर रहे हैं। सोशल मीडिया और टीवी पर उन्होंने बार-बार कहा, “ये हमला गलत था। अमेरिका-इजराइल ने ईरान को बहुत कम आंका।” जनरल बख्शी ने अपने एक पोस्ट में लिखा, “सब सोच रहे थे कि ये केकवॉक होगा। लेकिन मैंने शुरू से चेतावनी दी थी कि ईरान को कम मत समझो। वह असंयमित युद्ध लड़ेगा।”

एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने सरल भाषा में समझाया कि क्या गलती हुई। ईरान के पास सस्ते ड्रोन (20,000 डॉलर का एक) हैं, जबकि अमेरिका-इजराइल के महंगे इंटरसेप्टर मिसाइल (20 लाख डॉलर का एक) खत्म हो रहे हैं। ईरान ने हाइपरसोनिक मिसाइलें दागीं, जो रडार से बच सकती हैं। इन मिसाइलों ने कतर के रडार, थाड बैटरी, अमेरिकी बेस और इजराइल के कई शहरों पर हमले किए। 15 दिन में 650 मिसाइलें और 2600 ड्रोन तबाह हुए, 21 अमेरिकी सैनिक मारे गए। इस सबका अंदाज़न खर्च क़रीब 21 अरब डॉलर से ज्यादा हुआ। जनरल बख्शी के अनुसार, “ट्रंप ने सोचा था कि खामेनी मरते ही युद्ध खत्म हो जाएगा। लेकिन ईरान का हौसला बहुत ऊंचा है। 8 साल के ईरान-इराक युद्ध में 10 लाख मौतें हुईं, फिर भी ईरान नहीं झुका। अब ये अस्तित्व की लड़ाई है।”

वे आगे कहते है, “होर्मुज खाड़ी बंद करने से पूरी दुनिया में मंदी आ जाएगी। तेल 150 डॉलर से भी ऊपर जा सकता है। अमेरिका के लिए बॉडी बैग्स (सैनिकों की मौत) मिडटर्म चुनाव में आफत बन सकती है। ट्रंप फंस गए हैं। ये युद्ध शुरू करना आसान था, लेकिन खत्म करना मुश्किल। ये 21वीं सदी का सबसे बड़ा संघर्ष है। एकध्रुवीय दुनिया खत्म हो रही है। बहुध्रुवीय दुनिया मजबूत हो रही है।”

साधारण भारतीय के लिए ये युद्ध दूर की बात नहीं। हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक हैं। 80% तेल बाहर से आता है। यदि होर्मुज बंद हुआ तो पेट्रोल 150-200 रुपये लीटर हो जाएगा। रसोई गैस भी महंगी हो जाएगी। वहीं खाड़ी देशों में काम करने वाले 9 लाख भारतीयों की नौकरी भी खतरे में आ जाएगी। ईरान के साथ भारत का ‘चाबहार बंदरगाह प्रोजेक्ट’ ठप पद सकता है। अफगानिस्तान और मध्य एशिया का मार्ग भी बंद हो सकता है। महंगाई आम आदमी की जेब काटेगी।

गौरतलब है कि भारत ने हमेशा युद्ध की स्थिति में संतुलन बनाए रखा है। इस युद्ध की बात करे तो, ईरान से हमें सस्ता तेल, इजराइल से हथियार और टेक्नोलॉजी और अमेरिका से व्यापार मिलता रहा है। लेकिन इस बार मोदी सरकार ने अमेरिका-इजराइल के साथ खुलकर खड़ा होने का फैसला किया। प्रधानमंत्री मोदी फरवरी में इजराइल गए। वहां उन्होंने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ “स्पेशल स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप” की घोषणा की। युद्ध शुरू होते ही भारत ने ईरान के हमलों की निंदा की। खाड़ी देशों के राजाओं को फोन कर समर्थन जताया। संयुक्त राष्ट्र में ईरान के खिलाफ प्रस्ताव का समर्थन किया। खामेनी की मौत पर ईरानी दूतावास में श्रद्धांजलि देरी से दी।

जानकार मानते हैं कि भारत का ये फैसला गलत था। क्योंकि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता खतरे में पड़ गई। हम BRICS के अध्यक्ष हैं। रूस-चीन-ईरान हमारे साथी हैं। लेकिन अमेरिका के दबाव में हम ईरान के खिलाफ खड़े हो गए। भारत इजराइल और ईरान से अच्छे संबंध रखता है। हम युद्धविराम का मध्यस्थ बन सकते हैं। लेकिन सरकार ने मध्यस्थता की बजाय एक तरफा रुख अपनाया। भारत को तटस्थ रहना चाहिए था। दोनों पक्षों से बात कर युद्धविराम की अपील करनी चाहिए थी। मोदी जी को इजराइल जाने के बजाय दोनों देशों के नेताओं से फोन पर बात करनी चाहिए थी। संयुक्त राष्ट्र में ‘शांति और संवाद’ का प्रस्ताव लाना चाहिए था। ईरान से तेल खरीदना जारी रखना चाहिए था। चाबहार प्रोजेक्ट को मजबूत करना चाहिए था।

सरकार ने सोचा कि अमेरिका-इजराइल के साथ खड़े होने से फायदा होगा। लेकिन भूल गए कि ईरान हमारा पुराना दोस्त है। चाबहार बंदरगाह अमेरिका के खिलाफ हमारा रणनीतिक कदम था। सस्ता ईरानी तेल हमारी अर्थव्यवस्था को मजबूत करता था। अब तेल महंगा होने से मुद्रास्फीति बढ़ेगी। विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ पड़ेगा। यदि भारत QUAD और BRICS दोनों का सदस्य है तो हमारी आवाज दोनों तरफ सुनी जाती। लेकिन क्या एक तरफा रुख अपनाकर हमने अपनी ताकत कम कर दी?

मेजर जनरल बख्शी के अनुसार, “ये मूर्खतापूर्ण युद्ध है। ये जल्द खत्म हो।” भारत को अब अपनी गलती सुधारनी चाहिए। तटस्थ रहकर शांति की बात करनी चाहिए। ईरान से संबंध वापसी सुधारने चाहिए। तेल आयात के वैकल्पिक रास्ते तलाशने चाहिए। भारत की विदेश नीति हमेशा “सभी के साथ, किसी के खिलाफ नहीं” रही है। मोदी सरकार को इस सिद्धांत पर लौटना चाहिए। क्योंकि अंत में भारत का हित सबसे ऊपर है – सस्ता तेल, सुरक्षित नौकरियां और मजबूत अर्थव्यवस्था। युद्ध में किसी एक का पक्ष नहीं, बल्कि शांति का पक्ष लेना चाहिए।


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