ईरान के निशाने पर अमेरिकी वर्चस्व का हर खंभा

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लोगों की सोच में यह सवाल बना है कि अगर ईरान जैसी कमजोर शक्ति लड सकती है, तो चीन और रूस जैसी महाशक्तियों से मुकाबला करना अमेरिका के लिए कितना कठिन होगा? ऐसे सवालों और ऐसी धारणाओं का दुनिया को बदलने में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। इसीलिए इस युद्ध में जो हो रहा है, उसका युगांतकारी परिणाम संभव है।

ईरान पर आक्रमण के बाद 17वें दिन युद्ध किस मुकाम पर था, इसे समझने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की यह टिप्पणी मौजूं हैः ‘यह शतरंज का बहुत ऊंचे स्तर का खेल है। यह बहुत ऊंची संभावना है, सबसे ऊंची। और मेरा मुकाबला बहुत चतुर (स्मार्ट) खिलाड़ियों से है। ये स्मार्ट लोग हैं। वरना, आज जहां वे हैं, वहां नहीं पहुंचते। जब आपका सामना ऐसे कुछ लोगों से हो, तो आपको पता चलता है कि आपका मुकाबला किससे हो रहा है। उच्चतम स्तर की मेधा से। ऊंचे, बहुत ऊंचे स्तर के आईक्यू (बौद्धिक क्षमता) वाले लोगों से।’

https://x.com/clashreport/status/2033646453919269172?s=20

अमेरिका और इजराइल के 28 फरवरी को ईरान पर साझा हमले के साथ शुरू हुए युद्ध के पहले दो हफ्तों में दुनिया ने जो देखा, उसके बाद शायद ही कोई व्यक्ति ट्रंप की इस टिप्पणी से असहमत होगा। इस अवधि का जब कभी इतिहास लिखा जाएगा, तो ईरान की रणनीति, युद्ध कौशल, एवं उसका अद्भुत साहस उस अध्याय की केंद्रीय विषयवस्तु होंगे। बल्कि, भरे अभी यह कहना जल्दबाजी हो, फिर भी अनुमान लगाया जा सकता है कि ये युद्ध इतिहास में संभवतः एक युगांतकारी घटना के रूप में दर्ज होगा।

दो सूरतें हमारे सामने हैः पहला अमेरिका और इजराइल की विनाशकारी शक्ति का प्रदर्शन। उस दौर में ये ताकत और अधिक भयंकर नजर आई है, जब अमेरिकी शासक वर्ग ने हर तरह के नियम, कायदे, और मर्यादाओं को खुलेआम तिलांजलि दे रखी है। लड़ाई के आरंभिक दिनों में ही अमेरिका के युद्ध मंत्री पीटर हेगसेट ने बेहिचक कह दिया कि इस लड़ाई में हमारे दुश्मनों के लिए कोई जगह, कोई दया नहीं होगी। हेगसेट की टिप्पणियां युद्ध अपराध संबंधी कानूनों तथा जिनेवा एवं हेग संधियों के खिलाफ मानी गई हैं। विशेषज्ञों ने उनके बयानों को युद्ध अपराध की श्रेणी में रखा है। (Why Pete Hegseth’s ‘No Quarter’ Comment Has Raised Alarms Amid Iran War | Times Now)

खुद ट्रंप भी ऐसी टिप्पणियां करते रहे हैं। इनसे साफ होता है कि अमेरिका अब युद्ध किस नजरिए के साथ लड़ रहा है। लड़ाई के आरंभ में ही राज्य-प्रमुख की हत्या और उसके बाद हर रोज कारपेट बॉम्बिंग (यानी बिना सैनिक-असैनिक ठिकानों का ख्याल किए अंधाधुंध बमबारी) करते हुए अमेरिका और इजराइल इस युद्ध को आगे बढ़ा रहे हैं। पहले ही दिन मिनाब में स्कूल पर मिसाइल दाग कर 160 से ज्यादा बच्चियों की हत्या और उसके बाद हर रोज आम नागरिकों की हत्या की वीभत्स मिसालें उन्होंने इस दौरान पेश की हैं। ऐसे हमलों के कारण ईरान में भारी बर्बादी हुई है। स्कूल, अस्पताल, आम इन्फ्रास्ट्रक्चर, तेल एवं गैस के ठिकानों से लेकर सैन्य ठिकानों तक को बहुत नुकसान पहुंचा है। उचित ही यह कहा गया है कि इजराइल ईरान में गज़ा जैसा हाल करने पर आमादा है, तो अमेरिका वियतनाम के मॉडल को लेकर चल रहा है, जहां उसने मानवता के खिलाफ अपराध की अनगिनत मिसालें पेश की थीं।

इसके बावजूद चर्चा के केंद्र में यह तथ्य ही है कि यह युद्ध हर गुजरते दिन के साथ अमेरिकी सैन्य शक्ति की सीमाओं को उजागर करता जा रहा है। क्यों?

     इसलिए कि यह असमान शक्तियों के बीच का युद्ध है।

     ईरान इस युद्ध में कमजोर पक्ष है

     उस पर दुनिया की सबसे मजबूत सैन्य शक्ति (अमेरिका) और “सबसे कुशल” खुफिया तंत्र वाली एवं युद्ध बेरहमी में बेमिसाल ताकत (इजराइल) ने मिल कर हमला किया।

     आक्रमणकारी शक्तियों का मकसद ईरान में तख्ता-पलट से लेकर ईरान की सैन्य शक्ति को नष्ट करना तक बताया गया। वैसे इजराइल का उद्देश्य तो ईरान को कई खंडों में विभाजित कर देना तक रहा है।

     इनके बरक्स ईरान का मकसद सिर्फ अपना अस्तित्व एवं अपनी संप्रभुता की रक्षा है। मतलब यह कि युद्ध समाप्त होने तक ईरान की अखंडता कायम रही और वहां वर्तमान इस्लामी सत्ता कायम रही, तो इसे उसकी ऐतिहासिक जीत माना जाएगा।

     अपने घोषित मकसद में नाकामी अमेरिका और इजराइल की रणनीतिक हार समझी जाएगी। जाहिर है, उससे अमेरिका की सैनिक शक्ति की सीमाएं खुलकर जाहिर होंगी।

वैसे, दुनिया की सर्वोपरि महाशक्ति बनने के बाद भी अमेरिका की हार या युद्ध में उतरने के बावजूद सैन्य उद्देश्य हासिल ना कर पाने की कहानियां वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान, इराक, और लीबिया तक बिखरी पड़ी हैं। मगर उन सबका संदर्भ अलग था। तब दुनिया पर अमेरिकी वर्चस्व के ऊपर कोई सवाल नहीं था। ताजा युद्ध उस दौर में हो रहा है, जब अमेरिकी शक्ति का क्षय प्रमुख कथानक बना रहा है। इसलिए प्रश्न यही है कि क्या ईरान से उसका युद्ध उसके क्षय की अंतिम रूप से पुष्टि करने वाली घटना बनेगा?

इसलिए इसे समझना जरूरी हो जाता है कि ईरान ने कैसे बाजी पलटी है? आखिर इस युद्ध में क्या हुआ है, जिससे पुरानी धारणाएं तेजी से ढहती नजर आ रही हैं?

गौर करेः दशकों तक इजराइल ने एक सरल रणनीतिक सूत्र पर भरोसा किया: तकनीकी श्रेष्ठता, त्वरित लामबंदी, और छोटे युद्ध। ये युद्ध उसके नागरिक केंद्रों से दूर लड़े जाते थे। संघर्ष भड़कता, इजराइल जोरदार प्रहार करता, और लड़ाई इतनी जल्दी समाप्त हो जाती कि उसके समाज और अर्थव्यवस्था पर कोई स्थायी दबाव नहीं पड़ता था। यह मॉडल इस शर्त पर टिका था कि युद्ध पर इजराइल का नियंत्रण बना रहे।

लेकिन 28 फरवरी के बाद पहले तीन हफ्तों वह शर्त टूटती नजर आई है। इजराइल एक ऐसे संघर्ष का सामना करना पड़ा है, जो उस पूरे क्षेत्र में फैलता और लंबा खिंचता चला गया है। विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसे युद्ध में निर्णायक तत्व केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि धीरज और सहनशीलता भी होते हैं।

इजराइल के सामने लंबे खिंचते युद्ध की वास्तविकता है। उसे एक साथ कई मोर्चों पर खतरे का सामना करना पड़ा है। उसके विरोधी एक ढीले-ढाले क्षेत्रीय नेटवर्क के रूप में काम कर रहे हैं। वे किसी एक राज्य के रूप में मौजूद नहीं हैं, जिसे निर्णायक रूप से हरा दिया जाए। फिर युद्ध-क्षेत्र के विस्तार की हकीकत उसके सामने है।

यह युद्ध सिर्फ सेनाओं के बीच नहीं लड़ा जा रहा है। बल्कि बुनियादी ढांचे, ऊर्जा प्रणालियां, समुद्री व्यापार, और ठिकाने भी निशाना बन रहे हैं। इसका शिकार सिर्फ ईरान ही नहीं, बल्कि इजराइल भी हुआ है।

युद्ध की शुरुआत अमेरिकी इजराइली हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई और उनके परिवार के सदस्यों के मारे जाने के साथ हुई। अमेरिका और इजराइल ने सोचा था कि राजनीतिक नेतृत्व के खात्मे से ईरान में विद्रोह हो जाएगा और लोग आगे आकर इस्लामी शासन का तख्ता पलट देंगे। लेकिन परिणाम उलटा हुआ। हमला ईरान को तोड़ने के बजाय एकजुट कर गया। राष्ट्रीय अस्तित्व की रक्षा और प्रतिशोध की भावना ईरान के आवाम का साझा मिशन बन गईं।

ईरान के नए नेतृत्व ने सुनियोजित प्रतिक्रिया दी। वही प्रतिक्रिया, जिसे डॉनल्ड ट्रंप ने ‘उच्चतम स्तर की मेधा और बहुत ऊंचे स्तर के आईक्यू (बौद्धिक क्षमता)’ का परिणाम माना है। ईरान ने शुरुआत अति आधुनिक मिसाइलों से नहीं की। बल्कि आरंभ में सस्ते ड्रोन दागे गए। उद्देश्य इजराइल के रक्षा कवच को क्षीण करना था। हर ड्रोन को रोकने के लिए आयरन डोम एवं अन्य महंगे इंटरसेप्टर मिसाइलों की जरूरत पड़ी। इस तरह ईरान ने इजराइल को संसाधन खर्च करने पर मजबूर किया। जब इंटरसेप्टर का भंडार काफी घट गया, तो ईरान ने भारी बैलिस्टिक मिसाइलों से हमले शुरू किए। उस कारण इजराइल में जैसी तबाहियां हुई हैं, वैसा उसके पूरे इतिहास में नहीं हुआ।

जहां तक अमेरिका की बात है, तो दशकों से उसका वर्चस्व तीन खंभों पर टिका रहा हैः पहला खंभा यह विश्वास है कि अमेरिका की सैन्य क्षमता असाधारण एवं अतुलनीय है। दूसरा खंभा उसकी मुद्रा- डॉलर का वैश्विक वर्चस्व रहा है। वैसे ये दोनों खंभे एक दूसरे अलग नहीं हैं। वे एक दूसरे पर आश्रित हैं। तीसरा खंभा दुनिया के जल मार्गों को अबाधित खुला रख पाने की उसकी क्षमता रही है। वैसे, ये ताकत अमेरिका की सैन्य क्षमता का ही एक हिस्सा रही है।

ईरान ने मौजूदा युद्ध में इन सभी खंभों पर प्रहार किया हैः

     डॉलर का वर्चस्व पेट्रो-डॉलर पर टिका है। 1971 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के डॉलर का स्वर्ण भंडार से संबंध खत्म करने के तीन साल बाद अमेरिका ने सऊदी अरब और अन्य तेल उत्पादक देशों को इस पर राजी कर लिया कि वे कच्चा तेल और गैस बेचने के बदले भुगतान सिर्फ डॉलर में स्वीकार करेंगे। इस तरह अपने भंडार में डॉलर को रखना सभी देशों की अनिवार्यता बन गई।

     समझौता सरल थाः अमेरिका पश्चिम एशियाई देशों को अपना सुरक्षा कवरेज देगा। वहां के शासकों को वह किसी अन्य देश के आक्रमण एवं अपनी जनता के विद्रोह से बचाएगा। बदले में वे तेल और गैस सिर्फ डॉलर में बेचेंगे।

     सहमति यह भी बनी थी कि तेल-गैस की बिक्री से होने वाली अतिरिक्त आमदनी का निवेश उस क्षेत्र के देश अमेरिकी वित्तीय संपत्तियों (बॉन्ड, शेयर, रियल एस्टेट) में करेंगे। इस तरह डॉलर का चक्र स्थापित हुआ। अमेरिका डॉलर छाप कर दुनिया में फैलाने लगा, जो घूम-फिर कर फिर अमेरिका पहुंचने लगे।

     इस तरह मूल्य का संकेद्रण अमेरिका में हुआ। यह उसकी वित्तीय समृद्धि का आधार रहा है। इससे वह दुनिया भर में फैले 750 से अधिक सैन्य अड्डों का खर्च उठाने में सक्षम बना रहा है।

     उसी सैन्य क्षमता के जरिए अमेरिका सुनिश्चित करता रहा है कि विश्व में जल मार्ग खुले रहें। इसके लिए अनेक देश खुद को अमेरिका पर निर्भर मानते रहे हैं।

अब ध्यान देने की बात है कि मौजूदा युद्ध कैसे ईरान इन सभी खंभों को कमजोर करता जा रहा हैः

  • अमेरिका-इजराइल के साझा हमले के कुछ घंटों के अंदर ही ईरान ने खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिका के सैनिक ठिकानों पर जवाबी हमले शुरू कर दिए। बाद में उसने उन देशों के ऊर्जा एवं वित्तीय केंद्रों को भी निशाना बनाया। अमेरिकी कवच इन हमलों से बहरीन, कुवैत, कतर, यूएई, सऊदी अरब, ओमान आदि की रक्षा करने में नाकाम रहे हैं।
  • इस तरह ईरान ये संदेश देने में कामयाब हुआ है कि अमेरिकी सुरक्षा कवरेज हिफाजत की गारंटी नहीं है। यह नई सच्चाई उन देशों को सोचने पर मजबूर करेगी (ऐसा होने के संकेत अभी से मिल रहे हैं) कि आखिर अमेरिका से बंधे रहने से उन्हें क्या हासिल हुआ? इजराइल को बचाने की प्राथमिकता के तहत उनमें से कुछ देशों से बचाव तंत्र को हटाकर अमेरिका ने उन देशों में छले जाने का भाव भी पैदा किया है।
  • हाल के वर्षों में पश्चिम एशिया की ऊर्जा एवं धन की बड़ी भूमिका अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के विकास में बनी है। पिछले साल राष्ट्रपति पद संभालने के बाद डॉनल्ड ट्रंप ने जब खाड़ी देशों की यात्रा की, तो उनके साथ मैग्निफिशेंट सेवेन कही जाने वाली एआई क्षेत्र की सात प्रमुख कंपनियों के अधिकारी भी वहां गए थे। वहां एआई विकास के एक खास मॉडल पर सहमति बनी। इसके तहत अमेरिकी तकनीक से खाड़ी की ऊर्जा एवं वित्त, तथा भारत के मानव श्रम को जोड़ कर इस क्षेत्र में अमेरिकी वर्चस्व बनाए रखने की योजना बनी।
  • अब ईरान ने खाड़ी देशों के ऊर्जा एवं वित्तीय केंद्रों को निशाना बना कर इस मॉडल के भविष्य को अधर में लटका दिया है। यूएई से पूंजी के पलायन की खबरें इन दिनों सुर्खियों में हैं। कुवैत, कतर, सऊदी अरब, यूएई, बहरीन आदि में तेल एवं गैस का उत्पादन रोकना पड़ा है, जिन्हें दोबारा चालू करने में काफी वक्त एवं पूंजी लगेगी। नतीजा यह है कि अमेरिकी कंपनियों एवं अर्थव्यवस्था के लिए सबसे जरूरी सप्लाई शृंखला फिलहाल टूट गई है।
  • इसी तरह होरमुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण हासिल करने में सफल होकर ईरान ने जल मार्गों को सुरक्षित रखने की अमेरिका क्षमता को संदिग्ध बना दिया है। इसका दूरगामी असर होगा। बहरहाल, यह भी गौरतलब है कि ईरान ने होरमुज मार्ग को उन जहाजों के लिए खुला रखने का एलान किया है, जो चीन की मुद्रा युवान में भुगतान कर वहां से जा रहे होंगे। इस तरह ईरान ने पेट्रो-डॉलर की जगह पेट्रो-युवान का विकल्प दुनिया के सामने रखा है।

स्पष्ट है, ईरान इस युद्ध को बहुत बड़े परिदृश्य पर लड़ रहा है। वह अपनी ताकत के बिंदुओं पर खेल रहा है। सैन्य युद्ध में शानदार विजय हासिल करना उसके वश में नहीं है, इसे वह जानता है। तो, वह उन जगहों पर प्रहार कर रहा है, जो अमेरिकी वर्चस्व का आधार हैं। ऐसा करने की क्षमता तथा उसे रोकने में अमेरिकी अक्षमता को जग-जाहिर कर उसने दूरगामी धारणाएं बनाई हैं। लोगों की सोच में उसने यह सवाल डाला है कि अगर ईरान जैसी कमजोर शक्ति ऐसा कर सकती है, तो चीन और रूस जैसी महाशक्तियों से मुकाबला करना अमेरिका के लिए कितना कठिन होगा? ऐसे सवालों और ऐसी धारणाओं का दुनिया को बदलने में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। इसीलिए यह समझ बनी है कि इस युद्ध में जो हो रहा है, उसका युगांतकारी परिणाम निकल सकता है।


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