युद्ध का भारत पर होगा प्रभाव

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लंबे समय तक चलने वाला युद्ध भारत की रसद लागत और प्रेषण को प्रभावित करेगा। ऐसे में भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है, और मुद्रास्फीति बढ़ने से आम आदमी पर बोझ पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें पहले ही बढ़ी हुई हैं, जिससे परिवहन और कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।

दुनिया एक नए युद्ध की चपेट में है जो न केवल मध्य पूर्व को हिला रहा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति को भी प्रभावित कर रहा है। 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए अमेरिका और इज़राइल के ईरान पर हवाई हमलों ने इस संघर्ष को एक पूर्ण युद्ध का रूप दे दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलों और नौसेना को नष्ट करने का ऐलान किया है, जबकि ईरान ने जवाबी कार्रवाई में अमेरिकी ठिकानों और इज़राइल पर मिसाइलें दागी हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने से तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका है।

सवाल उठता है कि क्या यह युद्ध केवल अमेरिका की अहंकारपूर्ण कूटनीति का परिणाम है, जहां वह वैश्विक प्रभुत्व स्थापित करना चाहता है और तेल तथा खनिज बाजार पर कब्जा जमाना चाहता है? या यह एक आवश्यक रक्षात्मक कदम है जो ईरान के परमाणु महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए उठाया गया है? एक स्वतंत्र दृष्टिकोण से देखें तो यह युद्ध अमेरिकी कूटनीति की विफलता का प्रतीक है, जहां वार्ता के बजाय सैन्य शक्ति पर जोर दिया गया। ट्रं

प प्रशासन ने ईरान पर अधिकतम दबाव की नीति अपनाई, लेकिन इससे ईरान और अधिक आक्रामक हो गया। रक्षा विशेषज्ञ जो कोस्टा का कहना है कि यह युद्ध अमेरिकी सैन्य तैयारियों को कमजोर कर रहा है, खासकर चीन के खिलाफ। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह तेल बाजार पर कब्जे की लड़ाई है, लेकिन इससे अमेरिका की वैश्विक स्थिति कमजोर हो सकती है।

भारत, जो अपनी 90% से अधिक कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, इस युद्ध से सबसे अधिक प्रभावित देशों में से एक है। होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल की आपूर्ति बाधित हो गई है, जिससे भारत का आयात बिल बढ़ गया है। टीएस लोम्बार्ड की अर्थशास्त्री शुमिता देवेश्वर कहती हैं कि लंबे समय तक चलने वाला युद्ध भारत की रसद लागत और प्रेषण को प्रभावित करेगा। ऐसे में भारत का व्यापार घाटा बढ़ सकता है, और मुद्रास्फीति बढ़ने से आम आदमी पर बोझ पड़ेगा। पेट्रोल और डीजल की कीमतें पहले ही बढ़ी हुई हैं, जिससे परिवहन और कृषि क्षेत्र प्रभावित हो रहे हैं।

रणनीतिक रूप से यह युद्ध भारत की विदेश नीति को जटिल बना रहा है। भारत ने ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह परियोजना में निवेश किया है, जो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच प्रदान करता है। लेकिन युद्ध से यह परियोजना खतरे में आ गई है। वहीं, भारत-अरब-इज़राइल-यूरोप गलियारा (आईएमईसी) अब अधिक महत्वपूर्ण हो गया है, क्योंकि ईरान की अस्थिरता से चाबहार का विकल्प सीमित हो गया है। रैंड के अर्थशास्त्री रफीक दोसानी कहते हैं कि अगर अमेरिका और इज़राइल जीतते हैं, तो आईएमईसी इज़राइल की प्राथमिकता बनेगा।

इसके अलावा, मध्य पूर्व में रहने वाले लाखों प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ गई है। प्रेषण, जो भारत की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, प्रभावित हो सकता है। हाल ही में ‘द हिंदू’ के एक संपादकीय में कहा गया है कि यह युद्ध भारत पर अपेक्षा से अधिक प्रभाव डालेगा और पड़ोसी क्षेत्र को और जटिल बनाएगा। भारत को अमेरिका के साथ घनिष्ठ संबंध बनाए रखते हुए ईरान के साथ संतुलन बनाना होगा, जो एक कूटनीतिक चुनौती है।

यह युद्ध अमेरिका की वैश्विक स्थिति को दोधारी तलवार की तरह प्रभावित कर रहा है। एक ओर, अमेरिका ने ईरान की नौसेना और मिसाइल क्षमताओं को काफी नुकसान पहुंचाया है, जो उसके सैन्य प्रभुत्व को दर्शाता है। अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने कहा कि हमलों ने ईरान की नौसेना को ‘लड़ाई अक्षम’ बना दिया है। लेकिन लंबे समय में, यह युद्ध अमेरिकी संसाधनों को खींच सकता है। चैथम हाउस के विशेषज्ञों के अनुसार, लंबा युद्ध वैश्विक जीडीपी पर सीमित प्रभाव डालेगा, लेकिन उभरती अर्थव्यवस्थाओं को ऊर्जा कीमतों से नुकसान होगा।

वैश्विक स्तर पर, यह युद्ध अमेरिका की कूटनीति की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है। यूरोप और एशिया में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, जैसे एथेंस में हजारों लोगों का अमेरिकी दूतावास की ओर मार्च। चीन और रूस ईरान का समर्थन कर रहे हैं, जो बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत कर रहा है। अटलांटिक काउंसिल के विशेषज्ञों का कहना है कि चीन इस संघर्ष से फायदा उठा रहा है, क्योंकि ईरान उसका रणनीतिक साझेदार है।

आर्थिक रूप से, अमेरिका ऊर्जा निर्यातक होने से कम प्रभावित है, लेकिन वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान से मंदी का खतरा है। जेपी मॉर्गन के अर्थशास्त्री जोसेफ लुप्टन कहते हैं कि यह संघर्ष व्यापार युद्ध पर और दबाव डालेगा। अगर युद्ध क्षेत्रीय हो गया, तो तेल कीमतें 120 डॉलर तक पहुंच सकती हैं, जिससे अमेरिकी विकास दर नकारात्मक हो सकती है।

दुनिया भर के अधिकतर जानकारों का यह मत है कि यह युद्ध मुख्य रूप से अमेरिकी कूटनीति की विफलता है। ट्रंप ने ईरान को परमाणु समझौते से बाहर निकालकर दबाव बढ़ाया, लेकिन इससे ईरान की आक्रामकता बढ़ी। तेल और खनिज बाजार पर कब्जे की महत्वाकांक्षा साफ दिखती है, क्योंकि होर्मुज का नियंत्रण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को नियंत्रित करता है। लेकिन यह अहंकारपूर्ण दृष्टिकोण है, क्योंकि हवाई हमले सरकार नहीं गिरा सकते। रक्षा विशेषज्ञ रॉब जॉनसन कहते हैं कि अमेरिका ईरान की वायु रक्षा को नष्ट कर सकता है, लेकिन लंबी अवधि में वैश्विक ऊर्जा स्थिरता प्रभावित होगी।

कूटनीतिक विशेषज्ञ जेफरी फेल्टमैन और माइकल ओ’हैनलॉन का मानना है कि इस युद्ध के प्रभाव ईरान, मध्य पूर्व और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ेंगे। ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुश्ताक हामी ने होर्मुज को बंद रखने की धमकी दी है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को हिला सकती है।

यह युद्ध न केवल ईरान की संप्रभुता का मुद्दा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का भी। भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी चाहिए, जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान देना। अमेरिका को वार्ता की ओर लौटना चाहिए, वरना यह संघर्ष विश्व युद्ध का रूप ले सकता है। स्वतंत्र रूप से देखा जय तो, यह युद्ध अनावश्यक है और इससे सभी पक्ष हारेंगे। वैश्विक नेताओं को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि शांति बहाल हो सके।


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