इस तरह बिखरा मोदी का मायाजाल

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विडंबना ही कहा जाएगा कि जिन दो शिखर सम्मेलनों से प्रधानमंत्री की वैश्विक या विश्व-गुरु की छवि चमकाने की कोशिश हुई, वे दोनों ही मौके विपरीत परिणाम देने वाले साबित हुए। ऐसा क्यों हुआ, इसे समझना महत्त्वपूर्ण है। मगर उसके पहले इस पर ध्यान देना उचित होगा कि आखिर ये मायाजाल था क्या और इसे कैसे निर्मित किया गया था।

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस पर हुआ नई दिल्ली शिखर सम्मेलन नरेंद्र मोदी के तिलिस्म के बिखराव की पुष्टि का अवसर बना- पश्चिमी मीडिया के कवरेज और नई दिल्ली से लौटे टेक क्षेत्र की अनेक शख्सियतों की प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रतिक्रियाओं से यह बात साफ हो गई है। इस तरह जो प्रक्रिया 2023 में जी-20 शिखर सम्मेलन के तुरंत बाद नजर आई थी, वह अब अधिक ठोस हकीकत के रूप में हमारे सामने है। इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जिन दो शिखर सम्मेलनों से प्रधानमंत्री की वैश्विक या विश्व-गुरु की छवि चमकाने की कोशिश हुई, वे दोनों ही मौके विपरीत परिणाम देने वाले साबित हुए।

ऐसा क्यों हुआ, इसे समझना महत्त्वपूर्ण है। मगर उसके पहले इस पर ध्यान देना उचित होगा कि आखिर ये मायाजाल था क्या और इसे कैसे निर्मित किया गया था।

तिलिस्म यही था कि भारत में आखिरकार एक ऐसे नेता का उदय हुआ है, जिसके पास हर समस्या का समाधान है। जिसमें निर्णय एवं नेतृत्व की ऐसी क्षमता है कि वह पलक झपकते ही जटिल प्रश्नों के उत्तर ढूंढ लेता है। कहानी यह गढ़ी गई कि इसी क्षमता की बदौलत मोदी ने गुजरात का कायाकल्प किया और वैसा ही करिश्मा दिखाने के लिए राष्ट्रीय क्षितिज पर उनका आगमन हुआ है। और अगर भारत जैसे विशाल, विभिन्नता-पूर्ण, विकासशील, एवं समस्याओं से ग्रस्त देश में कोई नेता सचमुच चमत्कारी उपलब्धियां हासिल कर सकता है, उसमें दुनिया की दिलचस्पी बनना लाजिमी माना जाएगा। यह अंदाजा लगाया जाएगा कि उस व्यक्ति के पास निश्चित रूप से दुनिया को सिखाने के लिए काफी कुछ होगा!

इसी तिलिस्म के आधार पर मोदी की मीडिया टीम भारत में “सत्तर साल में कुछ ना होने” का कथानक प्रचारित करने में सफल रही।

यह कहानी भी खूब बिकी कि भारत अब “दब्बूपन” के दौर से निकल कर “लाल आंखे दिखाने” के दौर में प्रवेश कर गया है। इस बीच जब भारत की राष्ट्रीय राजनीति में मोदी का उदय हुआ, उस समय पश्चिम भी अपने कारणों से भारत की ऐसी कथा को गले लगाने को तैयार था।

वरना, यह यूं ही नहीं था कि जिस मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री रहने के बावजूद अमेरिका ने एक दशक तक वीजा देने से इनकार कर रखा था, उनके प्रधानमंत्री बनने के आठ महीनों के अंदर उनकी नई बनी स्वीकार्यता का एलान करने खुद अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा 2015 में गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बन कर भारत आए। यह भी ध्यानार्थ है कि ओबामा डॉनल्ड ट्रंप की तरह धुर-दक्षिणपंथी एजेंडे वाले नेता नहीं थे, जिनका मोदी की सियासत से स्वाभाविक मेल हो। बल्कि ओबामा ने अपनी तमाम राजनीतिक पूंजी अपनी लिबरल और प्रगतिशील छवि से बनाई थी।

तिलिस्म की पृष्ठभूमि

वैसे मोदी के तिलिस्मी उदय के पीछे असल ताकत 1990 के दशक में उभरी राजनीतिक परिघटनाओं की मानी जाएगी। उस दशक में मार्केट (नव-उदारवादी नीतियों), मंडल (कथित सामाजिक न्याय) और मंदिर (हिंदुत्व) की परिघटनाओं ने भारतीय राजनीति को नए सिरे से परिभाषित किया। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने खुद को इन तीनों परिघटनाओं के प्रतिनिधि के रूप में पेश करने की सायास कोशिश की, जिसमें वे कामयाब रहे। उग्र मुस्लिम विरोधी रुख अपनाकर उन्होंने खुद को हिंदुत्व के सबसे बेहिचक चेहरे के रूप में स्थापित किया। पिछड़ी जाति से आने की उनकी पृष्ठभूमि ने भारतीय जनता पार्टी को सवर्ण पार्टी के रूप में चित्रित करने की सामाजिक न्याय समर्थक पार्टियों की रणनीति को भोथरा बनाया। लेकिन सबसे अहम पहलू बतौर मुख्यमंत्री निर्बाध पूंजी संचय का अवसर देने के लिए उनके उठाए गए कदम रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि नियम-कायदों से मुक्त होकर मोनोपॉली कायम करने के आकांक्षी पूंजीपति उनके पीछे लामबंद होने लगे।

यह यूं ही नहीं था कि इस सदी के आरंभिक दशक में वाइब्रेंट गुजरात आयोजनों में ना सिर्फ देश के सबसे बड़े पूंजपतियों का मज़मा जुटने लगा, बल्कि ये पूंजीपति उस मंच से मोदी को भावी प्रधानमंत्री घोषित करने लगे। इनमें मुकेश और अनिल अंबानी, रतन टाटा, कुमारमंगल बिरला और सुनील मित्तल जैसे नाम शामिल थे। गौतम अडाणी की तो खैर तब छोटी हैसियत थी, लेकिन उन्होंने गुजरात स्तर के पूंजीपतियों को मोदी के पक्ष में लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई थी। इन पूंजीपतियों ने तब इस संभावना को समझा था कि मोदी में रोजी-रोटी के सवालों से ध्यान हटाकर राजनीतिक कथानक बुनने और सत्ता के लिए आवश्यक बहुमत जुटाने की बेजोड़ क्षमता है। इस तरह वे ऐसे नेता हैं, जो सामाजिक एवं पर्यावरणीय एजेंडों को दरकिनार कर उनके बेलगाम मुनाफे का रास्ता खोल सकते हैं।

तो उन पूंजीपतियों ने अपना दांव मोदी पर लगाया। 2014 के आम चुनाव में उनके ही समर्थन और संसाधनों से यह संभव हुआ कि ‘गुजरात मॉडल’ के मायाजाल और ‘अच्छे दिन’ के खोखले वादे पर टिकी ‘अबकी बार मोदी सरकार’ की ऐसी मुहिम चली कि तमाम प्रतिस्पर्धी धराशायी हो गए। बाद में मोदी को पश्चिम में मिली स्वीकार्यता के पीछे इस घटनाक्रम का बड़ा रोल था। पश्चिमी सरकारें खुद वहां के उन पूंजीवादी स्वार्थों से प्रेरित और संचालित रही हैं, जिनका नव-उदारवादी दौर में भारतीय पूंजी से गठजोड़ बन रहा था। ऐसे में जब मोदी पर भारतीय पूंजी का दांव लगा, तो यह लाजिमी ही था कि पश्चिम के शासक भी मोदी की सफलता में अपना हित देखते।

इस पृष्ठभूमि में मोदी ने भारत की विशेषता के रूप में democracy, demography और demand का जुमला उछाला, तो उसे वहां काफी हद तक गंभीरता से लिया गया। मोदी के उदय से पहले ही भारत के संदर्भ में इन तीनों शब्दों की प्रासंगिकता स्थापित हो चुकी थी। भारत को लोकतंत्र के सफल प्रयोग के रूप में देखा जाता था, यहां की विशाल आबादी उत्तरोत्तर अधिक बड़ा बाजार उपलब्ध करा सकती है, जिससे पश्चिमी उत्पादों के लिए फायदेमंद बाजार मिलेगा, ऐसी कहानियां पहले से प्रचलित थीं। मोदी ने इनकी शब्दों की मार्केटिंग की, तो तब उसे ठोस जमीन पर टिका माना गया।

वैसे इस स्वीकार्यता का एक दूसरा पहलू भी था। 2011 आते-आते अमेरिका और यूरोपीय देश इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि पश्चिमी वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए चीन के उदय को रोकना होगा। इसी मकसद से 2011 में बराक ओबामा ने pivot to Asia नीति घोषित की थी। इस क्रम में चीन की ताकत को संतुलित करने के लिए भारत के इस्तेमाल की रणनीति अमेरिका ने तय की। जिस समय ये नीति आकार ग्रहण कर रही थी, तभी भारत में मोदी काल शुरू हुआ। तो मोदी को महत्त्व देना पश्चिम की स्वाभाविक प्राथमिकता बनी। जैसे-जैसे पश्चिम का चीन से टकराव बढ़ा, ये प्राथमिकता आगे बढ़ी।

मगर इन पहलुओं के कायम रहने के बावजूद 2023 आते-आते इस परिघटना पर विराम लगने की शुरुआत हो गई। ऐसा क्यों हुआ? इस प्रश्न का उत्तर एक हद तक मोदी सरकार के अपने व्यवहार में छिपा है, तो उसके दूसरे हिस्से का संबंध बदली अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों से है।

शक्तिका अति-प्रदर्शन

नरेंद्र मोदी और करीबी सलाहकारों से गलती यह हुई कि उन्होंने अपनी शक्ति का अयथार्थ आकलन किया। और उस आकलन के आधार पर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी शक्ति का प्रदर्शन शुरू कर दिया। इससे भाजपा समर्थक प्रवासी भारतीयों में यह संदेश गया कि अब चूंकि उनके मूल देश में मजबूत सरकार है, इसलिए वे अन्य देशों में रहते हुए भी भारत के हिंदुत्ववादी समूहों जैसा ही व्यवहार कर सकते हैं।

मगर मोदी और उनके करीबी यह समझने में विफल रहे कि ‘लाल आंखें’ दिखाने और ‘मर्दाना विदेश नीति’ की कहानियों के जरिए भारतीय जन मानस में जोश भरना जितना आसान है, विदेशों में उस नीति पर सचमुच अमल करना उतना ही जोखिम से परे नहीं है। असल में अभी भारत की उतनी ताकत नहीं है कि पड़ोस में सभी दिशाओं में और पश्चिम देशों में भारत या भारतीय मूल के लोग hegemon (प्रभुत्वशाली) की तरह व्यवहार कर सकें। इसके बावजूद अपनी ताकत को overplay करने की कोशिश हुई, तो उसका विपरीत परिणाम निकलना ही था।

इन घटनाओं पर गौर करेः

     ऐसे इल्जाम पहले पास-पड़ोस में लगने शुरू हुए कि भारत की एजेंसियां अपनी सरहद से बाहर जाकर भारत में वांछित अपराधियों का सफाया कर रही हैं। इन धारणाओं को तोड़ने के बजाय सत्ताधारी दल के समर्थकों ने ऐसी चर्चाओं को घर में घुस कर मारने की होने वाली घोषणाओं से जोड़ कर देखा और उन्हें उसी रूप में पेश किया।

     पाकिस्तान जैसे देश के संदर्भ में ऐसी धारणाएं अंदरूनी राजनीति के लिहाज से लाभदायक हो सकती हैं। लेकिन जब ऐसे आरोप कनाडा, ब्रिटेन, और आखिरकार अमेरिका से लगे, तो उसके विपरीत परिणामों को संभालना आसान नहीं रहा।

     इसी बीच ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, और यहां तक कि अमेरिका में भारतीय मूल के कुछ समूहों ने हिंदुत्ववादी राजनीति का खुला प्रदर्शन शुरू किया। ब्रिटेन में तो उन समूहों का मुस्लिम समूहों के साथ हिंसक टकराव भी हुआ। इन घटनाओं ने पश्चिम में ये धारणा बनाई कि भारत सरकार अपनी “संप्रदाय आधारित राजनीति का निर्यात” वहां कर रही है।

     इस बीच ऐसे आरोप भी लगे कि कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो की भारत यात्रा के दौरान उन्हें लाल आंख दिखाई गई। यहां तक कि जी-20 समिट के दौरान जब अमेरिकी नेताओं ने कनाडा में सिख आतंकवादी की हत्या के पीछे भारत के कथित हाथ की चर्चा की, तो भारतीय अधिकारियों ने उन्हें सिरे से झटक दिया।

ये यूं ही नहीं था कि ट्रुडो के नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से लौटने के हफ्ते भर के अंदर कनाडा ने सिख चरमपंथी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या कराने का आरोप भारत सरकार पर मढ़ दिया। तब अपेक्षित यह था कि इस विवाद को कूटनीतिक कुशलता से निपटाया जाए। लेकिन भारत सरकार ने सख्त रुख दिखाया। बहरहाल, कुछ महीनों के बाद ही अमेरिका ने अपने नागरिक- सिख चरमपंथी गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की साजिश में भारतीय एजेंसियों के शामिल होने का आरोप लगाया, तब भारत सरकार प्रतिक्रिया काफी संयमित रही। ये सारा घटनाक्रम ऐसा है, जिसने पश्चिम में मोदी काल में भारत की छवि को बेहद बुरी तरह प्रभावित किया है।

इस बीच democracy, demography और demand की ताकत की असलियत भी देश- विदेश में खुलने लगी थी। भारतीय लोकतंत्र की प्रतिष्ठा पर ग्रहण तो खुद मोदी सरकार के फैसलों और कदमों से लगा, जबकि मोनोपॉली समर्थक उसकी आर्थिक नीतियों ने demography (यानी भारतीय आबादी) के समग्र एवं समन्वित विकास की संभावनाएं कुंद की हैं। जब समृद्धि का समान एवं समग्र बंटवारा demography के बीच नहीं होगा, तो जाहिर है कि कोई अर्थव्यवस्था व्यापक मांग पैदा नहीं कर सकती। यह आम समझ है कि मोनोपॉली नियंत्रित अर्थव्यवस्था K आकार ग्रहण कर लेती है, जिसमें ऊपर की मुट्ठी भर आबादी की मुट्ठी में धन का सबसे बड़ा हिस्सा जमा होता जाता है, जबकि विशाल आबादी की क्रय शक्ति गिरती चली जाती है।

वैसे तो मोदी काल में भारतीय अर्थव्यवस्था को शुरुआत से ही ये दिशा प्रदान कर दी गई थी, लेकिन कोरोना काल के बाद उसका स्वरूप जग-जाहिर होने लगा। आज सूरत यह है कि भारतीय कंपनियां अपनी उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग नहीं कर पा रही हैं, क्योंकि उतने उत्पादों के लिए बाजार में मांग नहीं है। जब यह स्थिति हो, तो विदेशी कंपनियां किस demand से आकर्षित होंगी? फिर बनी ये धारणा है कि भारत सरकार की नीतियां चंद मोनोपॉली घरानों के हित में तय होती हैं, अतः भारत में कारोबार करना जोखिम भरा है- इसलिए कि जैसे ही उन घरानों से हित टकराएंगे, सरकारी नीतियां विदेशी कंपनियों के लिए प्रतिकूल स्थिति बना देंगी।

इस बीच डॉनल्ड ट्रंप के दौर में अमेरिकी की प्राथमिकताएं बदली हैं। चीन को घेरना अभी भी उसका मकसद है, लेकिन इस कार्य में भारत की उपयोगिता कितनी है, इसका वहां पुनर्मूल्यांकन हुआ है। ट्रंप भारत को अमेरिकी खेमे में रखना चाहते हैं, लेकिन इसके बदले वे भारत को अतिरिक्त अहमियत नहीं देना चाहते। बल्कि अन्य देशों की तरह ही वे महत्त्व देने की कीमत भारत से ही वसूलना चाहते हैं।

इन घटनाक्रमों ने मोदीकालीन भारत के मायाजाल को पहले से क्षीण कर रखा था।

इसी बीच एआई क्षेत्र की ताकत बनने की बिना ठोस जमीन तैयार किए भारत सरकार ने अपने को एआई की विश्व शक्ति के रूप में पेश करने का दांव चला। यानी एक बार फिर अपनी ताकत को overplay किया गया। मगर 16 से 21 फरवरी के बीच नई दिल्ली में जो दिखा, उससे साफ है कि ये महत्त्वाकांक्षा बैकफायर कर गई। इससे भारत के लिए असहज स्थितियां उत्पन्न हुई हैं।

इन सबका सार है कि मोदी के तिलिस्म में अब दुनिया को भरोसा नहीं रहा। भारतवासियों का कितना भरोसा बचा है, यह सवाल भी प्रासंगिक है। बहरहाल, चूंकि हिंदुत्व के बेहिचक पैरोकार और खासकर मुसलमानों को सबक सिखाने में सक्षम नेता की उनकी छवि बरकरार है, इसलिए “अच्छे दिन” या विकास के “गुजरात मॉडल” के प्रणेता की छवि टूटने के बावजूद यह संभव है कि मोदी की वोट खींचने की क्षमता पर ज्यादा फर्क ना पड़े। यह संभव है कि वे अभी आने वाले कई चुनावों भाजपा को जीत दिलाने में सक्षम बने रहें- मगर यह धारणा तो अब विलीन हो गई है कि वे ऐसे “विकास पुरुष” हैं, जो दुनिया का मार्ग-दर्शक बन सकते हैं!


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