ओह! संसद में भी प्रधानमंत्री भयाकुल, डरा हुआ!

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कितनी गजब बात है। क्या दुनिया के किसी देश, किसी संसद में ऐसा हुआ जो पहली बात सदन के नेता को स्पीकर बोले कि आपको भाषण नहीं देना है। और प्रधानमंत्री डर कर राष्ट्रपति अभिभाषण का भी धन्यवाद न करे! इससे भी बड़ा वैश्विक रिकॉर्ड तो देश का प्रधानमंत्री चंद महिला सांसदों के शोर, उनके घेरने को अपने जीवन पर खतरा माने? राहुल गांधी से आंखे मिलाकर अपने समय के ही सेनापति की पुस्तक को लेने से घबराए!

और इससे भी अधिक शर्मनाक की राज्यसभा में विपक्ष की खाली बेंचों के आगे प्रधानमंत्री दहाड़े। राहुल गांधी के खानदान के कोसे, उन्हें गांधी के नाम का चोर बताए। अपने समर्थकों की गली में दहाड़ना और विपक्ष से भरी गली से दुबकना, भागना तो वैश्विक ताकत याकि चीन के शी जिनपिंग और अमेरिका के ट्रंप के आगे या तो घिग्घी बंधना, जबरदस्ती गले लगना या मौन रहना, अपमान सहना!

ओह! हिंदू राष्ट्र। भला क्यों 140 करोड़ लोगों का प्रधानमंत्री और एक सौ करोड़ हिंदुओं का रक्षक इतना डरा हुआ! फिर भी नगाड़ा मैं देश और हिंदुओं का रक्षक। मुझे ही विश्वास नही हुआ कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चार फरवरी को लोकसभा में इसलिए भाषण नहीं दिया क्योंकि उनको लग रहा था कि कुछ अप्रत्याशित घटित हो सकता है। और अपने मुंह से सीधा नहीं बोला। स्पीकर ने बोला कि उन्हें जो जानकारी मिली थी उस आधार पर उन्होंने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया कि वे चार फरवरी को शाम पांच बजे लोकसभा में भाषण देने नहीं आएं। सो, प्रधानमंत्री ने जवाब नहीं दिया और उनके भाषण के बगैर, उनकी गैरहाजिरी में लोकसभा में राष्ट्रपति अभिभाषण का धन्यवाद प्रस्ताव पास हुआ। भारत का नया रिकॉर्ड बना।

सवाल है क्या स्पीकर को ऐसी सूचना मिली कि महिला सांसद या विपक्ष के दूसरे सांसद प्रधानमंत्री पर हमला कर सकते हैं? आखिर क्या अप्रत्याशित घट सकता था? इसकी निश्चित रूप से जांच होनी चाहिए। आखिर विपक्ष के चुने गए सांसदों पर बहुत गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। अगर इसमें सचाई है तो जांच करके कार्रवाई करनी चाहिए नहीं तो यह माना जाएगा कि सरकार विपक्ष के सांसदों की साख खराब करने की कोशिश कर रही है।

सोचें, अगर प्रधानमंत्री भाषण देने आ जाते और उनको भाषण देने से रोक दिया जाता तो क्या हो जाता? जैसे राहुल गांधी 46 मिनट तक बोलने की कोशिश करते रहे और नहीं बोल पाए वैसे प्रधानमंत्री भी नहीं बोल पाते। लेकिन वे लोकसभा में जाकर सदन का सामना करते तो उनकी 56 इंच की छाती प्रमाणित होती। वे तो इसकी बजाय लोकसभा छोड़ कर राज्यसभा में चले गए। वहां उन्होंने विपक्षी के वाकआउट के बीच डेढ़ घंटे तक भाषण दिया।

सोचें, प्रधानमंत्री की सुरक्षा पर देश पांच सौ करोड़ रुपए से ज्यादा हर साल खर्च करता हैं। मतलब हर महीने 40 करोड़ रुपए से ज्यादा। यह स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप यानी एसपीजी का बजट है। पहले एसपीजी पूर्व प्रधानमंत्रियों के परिवार की सुरक्षा भी करती थी। लेकिन अब पूर्व प्रधानमंत्रियों के परिवार की एसपीजी सुरक्षा हटा दी गई है। एसपीजी अब सिर्फ प्रधानमंत्री की सुरक्षा करती है। एक व्यक्ति की सुरक्षा पर इतना रुपया खर्च होता है। फिर भी वह व्यक्ति अपने ही देश में, अपनी ही संसद में असुरक्षित महसूस करता है या खतरे से घबरा कर मैदान छोड़ देता है तो इसे क्या कहा जाएगा? क्या संसद में प्रधानमंत्री को सुरक्षित महसूस कराने के लिए वहां भी एसपीजी की तैनाती कराई जाए? क्या स्पीकर सदन के अंदर एसपीजी तैनात करें, प्रधानमंत्री की कुर्सी के पास बुलेटप्रूफ केबिन बनवाएं या विपक्ष के सांसदों को बाहर निकाल कर हर बार प्रधानमंत्री का भाषण कराया जाए?

याद करें कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच जनवरी 2022 को पंजाब के दौरे पर थे और फिरोजपुर के कार्यक्रम में शामिल हुए बैगर वे वापिस लौटे थे। प्रधानमंत्री हुसैनीवाला शहीद स्मारक पर जाने के लिए निकले थे। मौसम खराब होने की वजह से वे सड़क के रास्ते जा रहे थे। एक फ्लाईओवर पर लोगों की भीड़ ने जाम लगा रखा था। वहां थोड़ी देर रूकने के बाद प्रधानमंत्री मोदी वापस लौट आए थे और बठिंडा हवाईअड्डे पर उन्होंने पंजाब के अधिकारियों से कहा था, अपने ‘सीएम को थैंक्स कहना कि मैं बठिंडा एयरपोर्ट तक जिंदा लौट पाया’। सोचें, पंजाब के किसानों की नाराजगी थी और वे प्रदर्शन कर रहे थे। अपने ही लोगों के प्रदर्शन से घबरा कर प्रधानमंत्री वापस लौटे और ऐसा प्रकट किया, जैसे भीड़ उनकी जान लेने के लिए इकट्ठा थी। और वे किसी तरह से जान बचा कर बठिंडा हवाईअड्डे तक पहुंचे।

सोचें, इतने मजबूत सुरक्षा बंदोबस्तों के बाद भी वे अपनी जान की रक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं हैं तो देश के 140 करोड़ नागरिकों और एक सौ करोड़ हिंदुओं की रक्षा कैसे करेंगे? नरेंद्र मोदी ने बारह वर्षों में भारत के नागरिकों को, विपक्ष को, अपनी पार्टी-अपनी जमात को तरह तरह से डराकर कौम को डरपोक, कायर बनाया तो उससे इतनी हिम्मत तो बननी चाहिए कि वे अपनी ही लोकसभा में विपक्ष के आगे हिम्मत दिखाएं, आलोचना सुनें, प्रदर्शन-घेराबंदी को लोकतंत्र का हिस्सा मानें। यह तो न करें कि स्पीकर की आड़ ले कर संसद की भी कर्तव्य पालना न करें।


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