‘गांधी टॉक्स’: एक मौन क्रांति

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गांधी टॉक्स” दो समानांतर जीवन-रेखाओं पर चलती है। एक ओर है विजय सेतुपति का किरदार जो कि एक आम आदमी है और जिसकी ज़िंदगी संघर्ष, अपमान और जीवटता से बनी है। दूसरी ओर है अरविंद स्वामी का पात्र जो सत्ता, धन और नियंत्रण की दुनिया से आया व्यक्ति, जो धीरे-धीरे अपने ही बनाए ढांचे में ढहता है। इन दोनों के बीच कोई संवाद नहीं, कोई सीधा टकराव नहीं फिर भी पूरी फ़िल्म टकरावों से भरी है।

आज के ‘सिने-सोहबत’ में अभी अभी रिलीज़ हुई एक सायलेंट फ़िल्म ‘गांधी टॉक्स’ पर चर्चा  करते हैं। इस फ़िल्म ने भारतीय सिनेमा में एक बहुआयामी प्रयोग के रूप में दस्तक दी है जहां संवाद नहीं हैं, पर भावनाएं, वाद-विवाद और विचार उस से भी ज़्यादा ज़ोर से “बातें” करते हैं। ‘गांधी टॉक्स’ के लेखक-निर्देशक हैं किशोर पांडुरंग बेलेकर।

भारतीय सिनेमा को अक्सर संवादों, गीतों और वाचिक नाटकीयता का माध्यम माना गया है। हमारे यहां संवाद सिर्फ़ कहानी कहने का औज़ार नहीं, बल्कि स्टारडम, यादगार दृश्यों और जन-स्मृति का आधार भी रहे हैं। ऐसे में जब कोई फ़िल्म संवादहीन होने का साहस करती है, तो वह केवल एक सिनेमाई प्रयोग नहीं रहती बल्कि पूरे सिनेमा-बोध को चुनौती देती है।

साल 1987 में कमल हासन की ‘पुष्पक’ ने यह साहस किया था, जिसके लेखक-निर्देशक थे सिंगीतम श्रीनिवास राव। लगभग चार दशक बाद, ‘‘गांधी टॉक्स’ उसी मौन परंपरा को समकालीन भारत की बेचैन आत्मा के साथ दोबारा जगाती है। यह संयोग नहीं, बल्कि संकेत है कि शायद हमारा समय फिर से मौन को सुनने के लिए तैयार है।

‘पुष्पक’ भारतीय सिनेमा की उन दुर्लभ कृतियों में है, जिसने भाषा, क्षेत्र और संस्कृति की सीमाओं को पार कर लिया। बेरोज़गार युवक, अमीर आदमी की ज़िंदगी को कुछ समय के लिए जीता है। ‘पुष्पक’ की कहानी जितनी सरल थी, उतनी ही तीखी सामाजिक टिप्पणी भी।

कमल हासन ने वहां शरीर, चेहरे और टाइमिंग को भाषा बनाया। कोई संवाद नहीं, कोई सबटाइटल नहीं और फिर भी फ़िल्म दुनिया भर में समझी गई। ‘पुष्पक’ का मौन व्यंग्यात्मक था। वह सत्ता, पूंजी और वर्ग-भेद पर मुस्कुराते हुए चोट करता था। उसकी दुनिया थोड़ी फ़ेबल जैसी थी, प्रतीकात्मक थी, लगभग परीकथा सरीखी।

‘गांधी टॉक्स’ का मौन ‘पुष्पक’ से अलग है। यहां मौन हल्का नहीं, बल्कि भार लिए हुए है। यह वह मौन है जो महानगरों की भीड़ में दबा हुआ है, जहां हर कोई बोल रहा है, पर कोई सुन नहीं रहा।

“गांधी टॉक्स” दो समानांतर जीवन-रेखाओं पर चलती है। एक ओर है विजय सेतुपति का किरदार जो कि एक आम आदमी है और जिसकी ज़िंदगी संघर्ष, अपमान और जीवटता से बनी है। दूसरी ओर है अरविंद स्वामी का पात्र जो सत्ता, धन और नियंत्रण की दुनिया से आया व्यक्ति, जो धीरे-धीरे अपने ही बनाए ढांचे में ढहता है। इन दोनों के बीच कोई संवाद नहीं, कोई सीधा टकराव नहीं फिर भी पूरी फ़िल्म टकरावों से भरी है।

सबसे पहले इस फ़िल्म का शीर्षक अपनी ओर ध्यान खींचता है, ‘गांधी टॉक्स। यहां गांधी कोई पात्र नहीं हैं, कोई जीवनी नहीं है, कोई ऐतिहासिक पुनर्निर्माण नहीं है। गांधी यहां अनुपस्थित रहकर भी उपस्थित हैं। गांधी का नाम एक नैतिक प्रश्न की तरह फ़िल्म पर मंडराता रहता है कि क्या आज के भारत में गांधी अब भी “बोलते” हैं? या हमने उन्हें नोटों, मूर्तियों और भाषणों तक सीमित कर दिया है? फ़िल्म का मौन इस सवाल का जवाब नहीं देता बल्कि उसे और गहरा करता है।

संवादहीन सिनेमा में अभिनय सबसे बड़ा जोखिम होता है। एक भी अतिरिक्त भाव, एक भी गलत ठहराव किसी भी दृश्य को बनावटी बना सकता है। विजय सेतुपति इस जोखिम को अपने स्वभाविक अभिनय से साधते हैं। उनका चेहरा थका हुआ, उम्मीद से भरा, कभी अपमानित, कभी जिद्दी एक चलता-फिरता संवाद है। वे बिना बोले उस वर्ग की कहानी कहते हैं, जो अक्सर सिनेमा में बोल ही नहीं पाता।

अरविंद स्वामी का अभिनय इसके उलट ध्रुव पर है। संयमित, नियंत्रित, भीतर से टूटता हुआ। उनका पतन शोर नहीं करता, वह धीरे-धीरे रिसता है। यही इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त है। यह चीखती नहीं, यह रुककर देखती है।

आदिति राव हैदरी का किरदार संवेदनात्मक संतुलन बनाता है। उनकी आंखें कभी करुणा, कभी असहायता, कभी प्रेम फ़िल्म की मानवीय धुरी हैं।

कहानी में शहर की बात करें तो ‘पुष्पक’ का शहर अमूर्त था जो किसी भी देश का हो सकता था लेकिन ‘गांधी टॉक्स’ का शहर साफ़ तौर पर मुंबई है। हालांकि ‘गांधी टॉक्स’ का मुंबई चमकदार नहीं, रोमांटिक नहीं। यह वह मुंबई है जहां फुटपाथ, लोकल ट्रेन, झुग्गी और शीशे की इमारतें एक-दूसरे से टकराती हैं। यह शहर फ़िल्म में केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक मौन पात्र है, जो हर फ्रेम में मौजूद है।

इस फ़िल्म का एक ख़ास पक्ष इसमें ‘संगीत’ और ‘मौन’ के मध्य का द्वंद्व है। संवाद न होने पर संगीत का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यहां संगीत भावनाओं को दिशा देता है, कभी-कभी उन्हें थोड़ा ज़्यादा स्पष्ट भी कर देता है। कुछ जगहों पर लगता है कि अगर संगीत थोड़ा पीछे रहता, तो मौन और गहरा हो सकता था। ‘पुष्पक’ में मौन लगभग निर्विघ्न था लेकिन ‘गांधी टॉक्स’ में संगीत के सहारे मौन को अर्थ दिया गया है। यह फर्क़ दोनों फ़िल्मों के समय और दर्शक-मानसिकता को भी दर्शाता है।

अगर सवाल ये हो कि क्या यह फ़िल्म सबके लिए है? ईमानदारी से कहें तो, नहीं। यह फ़िल्म उस दर्शक से धैर्य मांगती है, जो सिनेमा को तेज़ कट्स, संवाद और त्वरित मनोरंजन से जोड़ता है। यह फ़िल्म देखी नहीं जाती, बल्कि महसूस की जाती है। साथ ही जिन दर्शकों के लिए सिनेमा विचार और आत्ममंथन का माध्यम है, उनके लिए ‘गांधी टॉक्स’ एक दुर्लभ अनुभव है।

इन दोनों सायलेंट फिल्मों, ‘पुष्पक’ और ‘गांधी टॉक्स’ के बीच लगभग चार दशक का फासला है, लेकिन दोनों एक अदृश्य पुल से जुड़ी हैं। ‘पुष्पक’ ने बताया था कि मौन सार्वभौमिक हो सकता है। ‘गांधी टॉक्स’ बताती है कि मौन राजनीतिक और नैतिक भी हो सकता है। जहां ‘पुष्पक’ व्यंग्य थी, वहां ‘गांधी टॉक्स’ प्रश्न है। जहां ‘पुष्पक’ मुस्कुराती थी, वहां ‘गांधी टॉक्स’ ठहरकर देखती है।

आज जब हर तरफ़ शोर है, टीवी डिबेट से लेकर सोशल मीडिया तक, ऐसे में ‘गांधी टॉक्स एक साहसिक विराम की तरह आती है। यह फ़िल्म हमें याद दिलाती है कि सिनेमा सिर्फ़ बोलने की कला नहीं, देखने और सुनने की भी कला है।

शायद यही वजह है कि यह फ़िल्म खत्म होने के बाद भी ख़त्म नहीं होती। उसका मौन देर तक हमारे भीतर बोलता रहता है। शायद, इसी मौन में कहीं, ‘गांधी’ अब भी बात कर रहे हैं।

आपके नज़दीकी सिनेमाघर में है। देख लीजिएगा।  (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और मशहूर यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़’ के होस्ट हैं।)


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