अमेरिका से व्यापार करार में भारत हित क्या?

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समझौते के मुताबिक अमेरिका बादाम, सोयाबीन तेल, कपास और डेयरी निर्यात बढ़ाएगा। डेयरी में, वर्तमान 60% टैरिफ कम होने से कीमतें 15% गिर सकती हैं, जिससे किसानों को 1.03 लाख करोड़ का वार्षिक नुकसान हो सकता है। आयात 25 मिलियन टन बढ़ सकता है, 1-2 गाय वाले छोटे किसानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। अमूल जैसे कोऑपरेटिव भी प्रभावित होंगे।

केंद्रीय बजट के बाद जिस तरह से सोने-चाँदी में भारी गिरावट दिखाई दी, उससे निवेशक अभी संभले भी नहीं थे कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौते की घोषणा ने अटकलबाजी पैदा कर दी। सोशल मीडिया पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई घोषणा के अनुसार, भारत से आयातित वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ 50% से घटाकर 18% किया गया है, जबकि भारत ने अमेरिकी उत्पादों को बिना टैरिफ के भारत आने देने और कम रूसी तेल खरीद का वादा किया है। यह समझौता भारत की अर्थव्यवस्था के लिए मिश्रित परिणाम ला सकता है, जहां निर्यात को बढ़ावा मिलेगा लेकिन कृषि प्रधान देश भारत में, कृषि के क्षेत्र में चुनौतियां अवश्य सामने आएँगी।

समझौते के दावों के अनुसार भारत ने अमेरिकी ऊर्जा, रक्षा, कृषि उत्पादों पर 500 अरब डॉलर की खरीद का वचन दिया है, जिसमें पेट्रोलियम, डेयरी और नट्स शामिल हैं। हालांकि, पूर्ण विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया है, केवल सोशल मीडिया पोस्ट और अधिकारियों के बयानों पर ही तमाम ख़बरें और विश्लेषण आ रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि यह समझौता भारत के निर्यात को बढ़ावा अवश्य दे सकता है। खासकर वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग उत्पादों में। अर्थशास्त्रियों के अनुसार, अमेरिकी बाजार में प्रवेश से भारत की जीडीपी में 0.6% वृद्धि से 7.4% तक पहुंच सकती है। सीईए वी. अनंता नागेश्वरन के अनुसार यह समझौता निवेशकों का भरोसा बढ़ाएगा और रुपये को स्थिर भी कर सकेगा। हालांकि, अमेरिकी आयात बढ़ने से व्यापार अधिशेष कम हो सकता है और ऊर्जा आयात बिल बढ़ सकता है क्योंकि रूसी तेल सस्ता था। कुल मिलाकर, लघु अवधि में सकारात्मक लेकिन दीर्घकालिक असंतुलन का खतरा है।

फ़िलहाल सरकार ने इस समझौते को लेकर किसी भी तरह की औपचारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की है, जिससे सवाल उठ रहे हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा की, जबकि पीएम मोदी ने केवल धन्यवाद दिया। विपक्ष का आरोप है कि संवेदनशील रियायतें, जैसे कि कृषि बाजार खोलना, छिपाई जा रही हैं ताकि किसान आंदोलन न भड़के। यह पारदर्शिता की कमी राष्ट्रीय हितों पर सवाल खड़े करती है, क्योंकि व्यापार संधियों में आमतौर पर पूर्ण खुलासा किया जाता है। जानकारों के अनुसार, यह रणनीतिक गोपनीयता लगती है लेकिन वहीं ये लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर करती है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे ‘सरेंडर 2.0’ कहा। उन्होने और आरोप लगाया कि मोदी सरकार दबाव में झुकी और किसानों के हित बेचे। उन्होंने संसद में चर्चा रोकने का आरोप लगाया, जबकि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने विपक्ष पर हंगामा करने का इल्जाम लगाया। विपक्ष का मुख्य मुद्दा असमानता है: अमेरिका भारतीय उत्पादन पर 18% टैरिफ वसूले और भारत जीरो टैरिफ पर अमेरिकी सामान आने दे तो यह साफ़ तौर पर  ट्रंप के आगे सरेंडर है।

जानकार मानते हैं कि इस समझौते के कुछ संकेत स्पष्ट हैं। 2025 में 50% टैरिफ से भारत के निर्यात में गिरावट आई। अगस्त में 6.86 अरब डॉलर से अक्टूबर में 6.30 अरब। ट्रंप की ‘आर्थिक ब्लैकमेल’ नीति ने रूसी तेल खरीद को निशाना बनाया। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘भारी कीमत चुकाने को तैयार’ होने का जुमला बोला। सरकार को सेवानिवृत अफसरों ने सलाह दी कि बुरा समझौता न करें।

समझौते को लेकर अर्थशास्त्री विभाजित हैं। ब्लूमबर्ग के अनुसार, निर्यात 64% बढ़ सकता है, लेकिन अगर समझौता विफल होता है तो जीडीपी पर 0.7% नुकसान संभव है। आशावादी अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जीडीपी  7.4% तक बढ़ सकती है। लेकिन वजाहत हबीब जैसे विशेषज्ञ असमानता पर सवाल उठाते हैं: 0 बनाम 18% टैरिफ, किस दृष्टि से सही है? एक रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि डेयरी को 1.03 लाख करोड़ का नुकसान हो सकता है। कुल मिलाकर देखा जाए तो विनिर्माण को फायदा लेकिन कृषि को खतरा संभव है इसलिए संतुलित सुधार जरूरी हैं।

गौरतलब है कि भारत जैसे देश में कृषि क्षेत्र सबसे संवेदनशील है। समझौते के मुताबिक अमेरिका बादाम, सोयाबीन तेल, कपास और डेयरी निर्यात बढ़ाएगा। डेयरी में, वर्तमान 60% टैरिफ कम होने से कीमतें 15% गिर सकती हैं, जिससे किसानों को 1.03 लाख करोड़ का वार्षिक नुकसान हो सकता है। आयात 25 मिलियन टन बढ़ सकता है, 1-2 गाय वाले छोटे किसानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। अमूल जैसे कोऑपरेटिव भी प्रभावित होंगे। पूर्व व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि इससे किसान का विरोध भड़क सकता है। वहीं सकारात्मक पक्ष इस बात का दावा भी कर रहे हैं कि प्रोसेस्ड एग्री निर्यात बढ़ सकता है, लेकिन इस क्षेत्र में संरक्षण जरूरी है। यह आम नागरिकों की आजीविका को जोखिम में डालता सकता है, जहां 80% कृषि छोटे किसानों पर निर्भर।


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