नरेंद्र भाई की काशी में मां गंगा के आंसू

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वाराणसी के सौंदर्यीकरण और विकास की धुन में वहां के सैकड़ों मंदिरों और शिवलिंगों को पहले ही तोड़ा जा चुका है और अब अर्वाचीन महिमा का धनी मणिकर्णिका घाट भी नरेंद्र भाई की इस झोंक में तिरोहित हो गया।… जब यह सब हो रहा है तो मणिकर्णिका घाट के जीर्णोद्धार में सब से अहम भूमिका निभाने वाली अहिल्याबाई होलकर के 300 वें जयंती वर्ष में मणिकर्णिका के इतिहास और उस से जुड़ी आस्था को ठेंगा दिखाना नरेंद्र भाई की हक़ूमत के लिए कौन-सी बड़ी बात है?

नरेंद्र भाई मोदी ने आज से ठीक 4282 दिन पहले देशवासियों को सब से पहली बार काशीवासियों को बताया था कि न मैं यहां आया हूं, न मुझे किसी ने भेजा है, मुझे तो मां गंगा ने बुलाया है। 24 अप्रैल 2014 को वाराणसी से लोकसभा की उम्मीदवारी का नामांकन भरने के फ़ौरन बाद कही गई उन की इस बात पर गंगा की लहरें उमंग से उछलीं या नहीं, मालूम नहीं, मगर काशीवासी ज़रूर थिरक उठे। नरेंद्र भाई को वाराणसी ने 3 लाख 71 हज़ार 784 मतों से जिता कर लोकसभा में भेजा और वे प्रधानमंत्री बन गए। 2019 में अगला चुनाव आया तो गंगा मैया के बुलावे पर गुजरात छोड़ कर वाराणसी आए नरेंद्र भाई को वहां के लोगों ने 4 लाख 79 हज़ार 505 वोट से जीत दिलाई।

फिर आया 2024 का लोकसभा चुनाव। नरेंद्र भाई ने अपना नामांकन दाखिल करने के बाद कहा कि अब तो मुझे लगता है कि मां गंगा ने मुझे गोद ले लिया है। मां गंगा तब तक अपनी गोद में बहते हज़ारों कोरोनाकालीन शवों पर विलाप कर चुकी थीं। सो, इस चुनाव के शुरुआती चरणों की मतगणना में कांग्रेस से काफी पीछे रहने के बाद नरेंद्र भाई अंततः महज़ 1 लाख 52 हज़ार 513 मतों की टूटी-फूटी जीत ले कर संसद में पहुंचे। लोकसभा में उन की भारतीय जनता पार्टी को भी सरकार बनाने लायक स्पष्ट बहुमत में 32 सीटों का टोटा पड़ गया। मगर नरेंद्र भाई, नरेंद्र भाई ठहरे। उन्होंने नए नेता के चयन की औपचारिकता पूरी करने तक के लिए भाजपा संसदीय दल की बैठक बुलाने की ज़हमत नहीं उठाई सिंहासनारूढ़ हो गए।

तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद 586 दिन बीतते-बीतते नरेंद्र भाई के वाराणसी में गंगा मैया का मणिकर्णिका घाट धूलधूसरित हो गया। टूटे मंदिर और फूटे शिवलिंग काशीवासियों के साथ-साथ देशवासियों की आंखें भी नम किए हुए हैं। 4282 दिन पहले ‘मान न मान, मैं तेरा मेहमान’ मुद्रा में हुए आगमन को ‘निमंत्रण‘ घोषित कर देने का तब प्रतिकार न करने पर गंगा मैया पश्चात्ताप कर रही होंगी। जबरन उन की गोद में आ बैठी संतान के हाथों अनादि काल के अनवरत मोक्ष-स्थल को विकास के बहाने ज़मींदोज़ होता देख मां गंगा के आंसू भी शायद ही थम रहे हों।

मणिकर्णिका घाट के बारे में पुराणों में कहा गया है कि  ‘‘मरणं मंगलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम्, कौपीनं यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते।’’ यानी  जो व्यक्ति काशी में अपने प्राण त्यागता है, वह जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति पा जाता है। मणिकर्णिका घाट पर अंतिम संस्कार के बाद जब चिता की राख ठंडी होने लगती है तो उस पर 94 का अंक लिख दिया जाता है। ऐसी मान्यता है कि व्यक्ति के कुल 100 गुण होते हैं, लेकिन मृत्यु के बाद उसकी अगली यात्रा पर सिर्फ 6 गुण ही उसके साथ जाते हैं। 1 गुण मन का होता है और बाकी 5 ज्ञानेंद्रियों के होते हैं। शास्त्र बताते हैं कि 94 प्रकार के अच्छे और बुरे गुण मनुष्य के हाथ में होते हैं और बाकी 6 प्रकार के गुण ब्रह्मा जी के हाथ में हैं।

वाराणसी के सौंदर्यीकरण और विकास की धुन में वहां के सैकड़ों मंदिरों और शिवलिंगों को पहले ही तोड़ा जा चुका है और अब अर्वाचीन महिमा का धनी मणिकर्णिका घाट भी नरेंद्र भाई की इस झोंक में तिरोहित हो गया। पिछले 11 बरस में देश भर में विकास के नाम पर तक़रीबन पौने दो करोड़ हरे-भरे पेड़ों को काटने की सरकारी इजाज़त दी जा चुकी है। पौने दो लाख हैक्टेयर से ज़्यादा वन-भूमि को औद्योगिक ज़मीन में तब्दील किया जा चुका है। यानी देश की राजधानी दिल्ली के क्षेत्रफल से क़रीब सवा गुनी ज़्यादा वन-भूमि कथित विकास कार्यों के हवाले हो चुकी है। ऐसे में मणिकर्णिका घाट की 30 हज़ार वर्गफुट भूमि की तो बिसात ही क्या है? पिछले एक दशक में देश भर के धर्म-स्थलों को जिस रफ़्तार से पर्यटन केंद्रों की शक़्ल दी गई है, उस ने हर तरह के बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं। मगर नरेंद्र भाई उन में से नहीं है, जो इन बातों की परवाह करें। उन्हें मां गंगा ने काशी बुलाया है तो वे अपनी गंगा मैया लिए वह सब करेंगे, जो कर सकते हैं।

भारत की प्राचीन विरासतों और ऐतिहासिक धरोहरों को जड़ से उखाड़ फेंकने का ऐसा जुनून पहले कभी नहीं देखा गया। शहरों के नाम बदले जा रहे हैं। सड़कों के नाम बदले जा रहे हैं। संसद की इमारत बदली जा रही है। प्रधानमंत्री का कार्यलय बदला जा रहा है। मंत्रियों के दफ़्तर बदले जा रहे हैं। क़ायदे बदले जा रहे हैं। क़ानून बदले जा रहे हैं। जब यह सब हो रहा है तो मणिकर्णिका घाट के जीर्णोद्धार में सब से अहम भूमिका निभाने वाली अहिल्याबाई होलकर के 300 वें जयंती वर्ष में मणिकर्णिका के इतिहास और उस से जुड़ी आस्था को ठेंगा दिखाना नरेंद्र भाई की हक़ूमत के लिए कौन-सी बड़ी बात है? विकास के नाम पर सांस्कृतिक पूंजी को इस तरह छिन्नभिन्न करने की ऐसा मिसालें पहले तो कभी नहीं देखी गईं!

प्रधानमंत्री बनने के चंद महीनों के भीतर ही नरेंद्र भाई ने दो योजनाएं लागू की थीं। पहली ‘हृदय’ और दूसरी ‘प्रसाद’। ‘हृदय’ के तहत 12 धार्मिक शहरों में प्राचीन विरासतों को विकसित करने का काम हाथ में लिया गया और ‘प्रसाद’ के तहत केदारनाथ, सोमनाथ, कामाख्या, तिरुपति, शिरडी और बोधगया के तीर्थों का विकास हुआ। देश भर के 25 राज्यों में अब तक ऐसे 41 शहरों और पवित्र स्थलों का सौंदर्यीकरण किया गया है। इन में से तक़रीबन सभी के बारे में यह राय बनी है कि अब वे स्थान पहले की तरह नहीं रहे। वे आस्था केंद्रों की जगह पर्यटन स्थलों की तरह विकसित किए गए हैं। उन सभी जगह पर्यटकों के आने की तादाद भले ही बढ़ती जा रही हो, मगर भक्तों के आने की संख्या कम होती जा रही है।

बहुत-से लोग मानते हैं कि धर्म धंधा बन गया है। मगर ऐसे लोग भी तो हैं, जो धर्म को आस्था का विशय मानते हैं। धर्म स्थलों का विकास होना चाहिए। धार्मिक शहरों का सौंदर्यीकरण भी होना चाहिए। मगर क्या इस चक्कर में उन्हें बाज़ारू बना देने को ठीक ठहराया जा सकता है? इस एक दशक में धर्म के प्रति आस्था बढ़ी है या उस के प्रति कट्टरता? धर्म के नाम पर धर्म मज़बूत हुआ है या धर्म का बाज़ार? संतई बढ़ी है या संतई का कारोबार? हमारे शास्त्रों में तो यही बताया गया है कि जिस देश का राजा सकारात्मकता के बजाय नकारात्मकता को पोषित करता हो, उस देश को तरह-तरह की विपदाओं का सामना करना पड़ता है। भारत पर राज करने वालों के पिछले एक दशक की कार्यशैली का आकलन करने पर आप को क्या लगता है? वे अपने राजधर्म का पालन कर रहे हैं या नहीं?


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