उन्होंने देश, धर्म और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सिखों को संगठित किया और उन्हें सैनिक परिवेश में ढाला। मान्यता है कि धर्म और न्याय की प्रतिष्ठा के लिए गुरु गोविंद सिंह का अवतरण हुआ था। इसी उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था — “मुझे परमेश्वर ने दुष्टों का नाश करने और धर्म की स्थापना के लिए भेजा है।”
5 जनवरी – गुरु गोविंद सिंह जयंती
सिख धर्म के सर्वाधिक वीर योद्धा और निर्बलों को अमृतपान कर शस्त्रधारी बनाकर उनमें वीर रस भरने वाले सिख समुदाय के दसवें और अंतिम धर्मगुरु (सतगुरु) गुरु गोविंद सिंह (22 दिसम्बर, 1666 ई. — पटना, बिहार; 7 अक्टूबर, 1708 ई. — नांदेड़, महाराष्ट्र) न केवल सिखों के सैनिक संगति और ख़ालसा के सृजन के लिए प्रसिद्ध हैं, बल्कि वे उस ऐतिहासिक निर्णय के लिए भी लोकप्रसिद्ध हैं कि अब सिख पंथ में देहधारी गुरु की परंपरा समाप्त हो और गुरु ग्रंथ साहिब ही सर्वमान्य गुरु हो।
गुरु गोविंद सिंह ने सर्वप्रथम खालसा पंथ में “सिंह” उपनाम लगाने की शुरुआत की। उन्होंने आदेश दिया कि आगे से कोई भी देहधारी गुरु नहीं होगा — गुरु की वाणी और गुरु ग्रंथ साहिब ही सिखों के लिए गुरु की भूमिका रखेंगे। एक प्रवीण कवि के रूप में गुरु गोविंद सिंह ने समय के अनुकूल योगियों, पंडितों और संतों के लिए बाणी की रचना की, जिसे बाद में “बेअंत बाणी” कहा गया।
ऐसे महान योद्धा और गुरु का जन्म मुग़ल शासन के समय पौष शुदी सप्तमी संवत 1723 (तदनुसार 22 दिसम्बर, 1666) को पटना शहर में गुरु तेग बहादुर और माता गुजरी के घर हुआ। उनका नाम गोविंद राय रखा गया। उनके जन्म पर पूरे शहर में उत्सव मनाया गया।
बचपन में गोविंद को खिलौनों से खेलना पसंद था, लेकिन वे तलवार, कृपाण, धनुष‑बाण से खेलने में भी रुचि रखते थे। बाल्यकाल से ही वे अत्यंत शरारती थे, परन्तु दूसरों को कष्ट नहीं देते थे। एक किस्सा प्रसिद्ध है कि वे सूत काटने वाली एक निसंतान वृद्धा के साथ शरारत करते थे — उसकी सूत की पूनियाँ बिखेर देते थे। जब वृद्धा उनके माता‑पिता के पास शिकायत लेकर जाती थी, तो माता गुजरी पैसे देकर उसे खुश कर देती थीं। एक बार माता गुजरी ने गोविंद से कारण पूछा कि तुम वृद्धा को तंग क्यों करते हो? गोविंद ने सहज भाव से कहा कि वह उसकी गरीबी दूर करना चाहता है — क्योंकि अगर मैं उसे परेशान नहीं करूंगा, तो उसे पैसे कैसे मिलेंगे?
गोविंद राय को सैन्य जीवन का लगाव अपने दादा गुरु हरगोबिन्द सिंह से मिला था और उन्हें महान बौद्धिक संपदा भी विरासत में मिली थी। बहुभाषाविद गुरु गोविंद सिंह को फ़ारसी, अरबी, संस्कृत और पंजाबी भाषाओं का अच्छा ज्ञान था। उन्होंने सिख क़ानून को सूत्रबद्ध किया, काव्य रचना की, और सिख ग्रंथ दसम ग्रंथ (दसवाँ खंड) लिखकर प्रसिद्धि पाई।
उन्होंने देश, धर्म और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए सिखों को संगठित किया और उन्हें सैनिक परिवेश में ढाला। मान्यता है कि धर्म और न्याय की प्रतिष्ठा के लिए गुरु गोविंद सिंह का अवतरण हुआ था। इसी उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा था — “मुझे परमेश्वर ने दुष्टों का नाश करने और धर्म की स्थापना के लिए भेजा है।” यही कारण है कि आज भी गुरु गोविंद सिंह के जन्म उत्सव को गुरु गोविंद जयंती के रूप में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस शुभ अवसर पर गुरुद्वारों में भव्य कार्यक्रमों के साथ गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ होता है और अंत में सामूहिक भंडारा यानी लंगर का आयोजन होता है।
नवीन मत के अनुसार 2026 में गुरु गोविंद सिंह जयंती 5 जनवरी को मनाई जाएगी। खालसा पंथ में विशेष महत्त्व रखने वाले इस अवसर पर उनके जन्म स्थल पटना साहिब तथा आनंदपुर साहिब (गुरुद्वारा केशगढ़ साहिब) और अन्य स्थानों पर जयंती अत्यधिक धूमधाम से मनाई जाती है।
अपने पिता गुरु तेग बहादुर की बलिदान के बाद, जब वे केवल 9 वर्ष के थे, तो बालक गोविंद राय को गुरु गद्दी संभालनी पड़ी। गुरु की गरिमा बनाए रखने के लिए उन्होंने अपना ज्ञान बढ़ाया और संस्कृत, फ़ारसी, पंजाबी और अरबी भाषाएँ सीखीं। उन्होंने धनुष‑बाण, तलवार, भाला आदि हथियार चलाने की कला भी सीखी। उन्होंने अन्य सिखों को भी अस्त्र‑शस्त्र चलाना सिखाया। सिखों को अपने धर्म, जन्मभूमि और अपनी रक्षा के लिए संकल्पबद्ध किया और उन्हें मानवता का पाठ पढ़ाया। उनका नारा था — सत श्री अकाल।
जाति‑भेद और सम्प्रदायवाद को जड़ से समाप्त करने हेतु गुरु गोविंद सिंह ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया। देश के अलग‑अलग भागों तथा समाज के विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों से आए पांच प्यारे — जिन्हें पंच प्यारे के नाम से जाना जाता है — को एक ही कटोरे में अमृत पिला कर एक किया गया। इस क्रांति के बीज से उन्होंने जाति भेद तथा सम्प्रदायवाद को मिटाया।
परंपरा के अनुसार, पंजाब में फ़सल की कटाई पहली बैसाख को ही शुरू होती है और देश के अन्य हिस्सों में भी इसी दिन फ़सल कटाई का त्योहार मनाया जाता है। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि बैसाखी दिवस को गुरु गोविंद सिंह के जीवन के आदर्शों को देश, समाज और मानवता की भलाई के लिए प्रेरणा मानकर श्रद्धापूर्वक मनाने से आतंकवाद तथा हमलावरों का सामना किया जा सकता है।
गुरु गोविंद सिंह ने सिखों में युद्ध की भावना तथा जीवन का उत्साह बढ़ाने के लिए अनेक कदम उठाए। उन्होंने वीर काव्य और संगीत का सृजन किया और सिखों में लौह कृपा अर्थात कृपाण के प्रति प्रेम विकसित किया। खालसा को पुन: संगठित सिख सेना का मार्गदर्शक बनाकर उन्होंने दो मोर्चों पर शत्रुओं के खिलाफ क़दम उठाए — पहला मुग़लों के खिलाफ फ़ौज, और दूसरा विरोधी पहाड़ी जनजातियों के खिलाफ युद्ध। उनकी सैन्य टुकड़ियाँ सिख आदर्शों के प्रति पूरी तरह समर्पित थीं और सिखों की धार्मिक तथा राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार थीं। लेकिन गुरु गोविंद सिंह को इस स्वतंत्रता की भारी कीमत चुकानी पड़ी। अंबाला के पास एक युद्ध में उनके चारों बेटे मारे गए।
गुरु गोविंद सिंह ने धर्म, संस्कृति एवं राष्ट्र की आन‑बान‑शान के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। उनके सामने पहाड़ी राजाओं की ईर्ष्या पहाड़ जैसी ऊँची थी। दूसरी ओर औरंगज़ेब की धार्मिक कट्टरता की आँधी लोगों के अस्तित्व को लील रही थी। ऐसे समय में गुरु गोविंद सिंह ने समाज को एक नया दर्शन दिया। उन्होंने आध्यात्मिक स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए तलवार धारण की।
गौरतलब है कि गुरु गोविंद सिंह और मुगल बादशाह बहादुर शाह I मित्र भी थे। गुरु जी ने अपने सैनिकों के साथ जांजू की लड़ाई में बहादुर शाह का साथ दिया, जिससे 8 जून 1707 को आगरा के पास बहादुर शाह की विजय हुई। प्रसन्न होकर बादशाह ने गुरु जी को आगरा बुलाया और उन्हें एक बड़ी कीमती सीरोपायो (सम्मान के वस्त्र) तथा एक धुकधुकी (गर्दन का गहना) भेंट की, जिसकी कीमत लगभग 60,000 रुपये थी। मुगल सरकार के साथ एक पुराने मतभेद का समाधान संभव दिखाई दे रहा था। इसी बातचीत के दौरान बहादुर शाह ने कछवाहा राजपूतों के विरुद्ध कार्यवाही हेतु दक्षिण की ओर कूच किया। उनके भाई कामबख़्श ने बग़ावत कर दी। बग़ावत दबाने हेतु बादशाह दक्षिण की ओर चला गया और गुरु जी को भी साथ ले गया। इस सम्पूर्ण घटनाक्रम में गुरु जी का संघर्षरत रहना उनके महान कर्मयोगी होने का प्रमाण है।
उन्होंने खालसा का मार्ग देश की अस्मिता, भारतीय विरासत और जीवन मूल्यों की रक्षा के लिए अपनाया। वे सभी प्राणियों को आध्यात्मिक स्तर पर परमात्मा का ही रूप मानते थे। धर्म और समाज की रक्षा के लिए गुरु गोविंद सिंह ने 1699 ई. में शुद्ध, निर्मल और बिना किसी मिलावट वाले व्यक्तियों का समूह बनाया, जिसे खालसा कहा गया। प्रत्येक परिस्थिति में ईश्वर का स्मरण करते हुए स्वकर्म को स्वधर्म मानकर जुल्म और जालिम से लोहा लेने के लिए तत्पर खालसा हमारी मर्यादा और भारतीय संस्कृति की पहचान है।
गुरु गोविंद सिंह ने एक नया नारा दिया —
“वाहे गुरु जी का खालसा, वाहे गुरु जी की फतेह।”
गुरु जी द्वारा स्थापित खालसा का पहला धर्म यह है कि वह देश, धर्म और मानवता की रक्षा के लिए तन‑मन‑धन सब न्यौछावर कर दे। निर्धनों, असहायों और अनाथों की रक्षा के लिए सदैव आगे रहे।
