ब्रिक्स+ बदलाव का एक प्रतीक है। इसलिए इसके महत्त्व को कम-से-कम श्रमिक वर्ग को अवश्य समझना चाहिए। … भारत सरकार इस मामले में जो भी रुख अपनाए, भारत के मेहनतकश तबकों को इसके महत्त्व को अवश्य समझना चाहिए। भारत सरकार ब्रिक्स+ के महत्त्व के मुताबिक इसके शिखर सम्मेलन को अहमियत दे, इसके लिए उन्हें दबाव बनाना चाहिए। इसकी वजह यह है कि ब्रिक्स+ मौजूदा विश्व व्यवस्था के साम्राज्यवादी ढांचे के लिए एक चुनौती बन कर उभरा है।
नये साल में भू-राजनीति के लिहाज से भारत के लिए सबसे बड़ा मौका ब्रिक्स+ समूह के शिखर सम्मेलन की मेजबानी के रूप में आएगा। लेकिन भारत सरकार इसे कितनी अहमियत देगी और किस प्रोफाइल के साथ इसका आयोजन करेगी, इस बारे में पूरे भरोसे के साथ कुछ भी कहना कठिन है। इसलिए कि वैसे तो आम तौर पर भारत के पूरे शासक वर्ग, लेकिन खासकर मौजूदा केंद्र सरकार का स्वाभाविक झुकाव अमेरिका की तरफ रहता आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पश्चिमी देशों के नेताओं के साथ बैठ कर खुद को ऊंची मेज पर महसूस करते आए हैं।
इसकी एक मिसाल 2023 में देखने को मिली थी, जब एक साथ भारत को जी-20 और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) दोनों समूहों की अध्यक्षता मिली थी। जहां जी-20 शिखर सम्मेलन को नई दिल्ली में अधिकतम संभव धूम-धड़ाके के साथ आयोजित किया गया, वहीं एससीओ शिखर सम्मेलन का प्रोफाइल गिराते हुए भारत सरकार ने उसका ऑनलाइन माध्यम से आयोजन किया। ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन के प्रोफाइल को लेकर अंदेशा इसलिए भी गहरा है, क्योंकि इसे अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने खास निशाना बना रखा है।
बहरहाल, भारत सरकार इस मामले में जो भी रुख अपनाए, भारत के मेहनतकश तबकों को इसके महत्त्व को अवश्य समझना चाहिए। भारत सरकार ब्रिक्स+ के महत्त्व के मुताबिक इसके शिखर सम्मेलन को अहमियत दे, इसके लिए उन्हें दबाव बनाना चाहिए। इसकी वजह यह है कि ब्रिक्स+ मौजूदा विश्व व्यवस्था के साम्राज्यवादी ढांचे के लिए एक चुनौती बन कर उभरा है। हालांकि इस समूह के देशों ने खुलेआम नव-उदारवाद को चुनौती नहीं दी है, लेकिन इस समूह ने जिस बहु-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था की उम्मीद जगाई है, वह एक ऐतिहासिक घटनाक्रम का परिणाम है। इससे नव-उदारवाद के खिलाफ विमर्श के लिए अनुकूल स्थितियां बनी हैं।
श्रमिक अधिकारों के ऐतिहासिक अनुभव एवं विश्लेषण से यह साफ है कि नव-उदारवाद की व्यवस्था को जब तक खत्म नहीं किया जाता, मेहनतकश तबके वे अधिकार वापस नहीं पा सकेंगे, जो उन्होंने एक दौर में हासिल हुए थे। नव-उदारवाद की व्यवस्था का स्वरूप असल में अंतरराष्ट्रीय है। इस व्यवस्था से जुड़ने की वजह से राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर संबंधित देश के शासक वर्गों को मजदूर अधिकारों के हनन का अनुकूल मौका मिला। चूंकि आर्थिक विकास की नीतियां राष्ट्र के संप्रभु दायरे में नहीं रह गईं, अतः पूंजीवादी राष्ट्रों के संप्रभु दायरे में मजदूरों के लिए अपने अधिकारों को संरक्षित रखना या वापस पाना भी कठिन हो गया है।
ब्रिक्स+ में शामिल अधिकांश देशों में शासन उन्हीं राजनीतिक शक्तियों के हाथ में है, जो अंतरराष्ट्रीय पूंजी से जुड़ाव में फायदा देखने वाले पूंजीपति/ शासक वर्ग की नुमाइंदगी करती हैँ। मगर आज वैश्विक पूंजीवाद उस मुकाम पर है, जहां पश्चिम नियंत्रित बहुराष्ट्रीय पूंजी और विकासशील देशों के शासक वर्गों के हितों में सीमित अंतर्विरोध पैदा हुए हैं। इन्हीं कारणों से इन देशों की सरकारें ब्रिक्स+ से जुड़ी हैं या जुड़ने के लिए विभिन्न देशों की कतार लगी है। श्रमिक वर्ग के नजरिए से यह स्वागतयोग्य घटनाक्रम है।
इसी वजह से ब्रिक्स+ एक नई विश्व व्यवस्था की ओर ले जाने का उपक्रम बनता दिखा है। वैसे शंघाई सहयोग संगठन, यूरेशियन इकॉनमिक यूनियन, अफ्रीका में साहेल देशों का मंच- Alliance of Sahel States, लैटिन अमेरिका में ALBA (Bolivarian Alliance for the Peoples of Our America) आदि भी ऐसे मंच हैं, जो अपने ढंग से कथित एक-ध्रुवीय व्यवस्था को चुनौती दे रहे हैं, मगर चूंकि ब्रिक्स+ में उभरती अर्थव्यवस्था वाले सबसे बड़े देश शामिल हैं, इसलिए इसकी खास भूमिका बनी है।
ब्रिक्स+ की खूबी यह भी है कि उसने मौजूदा विश्व आर्थिक ढांचे का विकल्प तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इस रूप में कहा जा सकता है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद उपनिवेशवाद से आजाद हुए देशों ने 1955 में इंडोनेशिया के बांगडुंग में सम्मेलन कर जिस नई विश्व व्यवस्था की आवाज बुलंद की थी, ब्रिक्स+ उसे कार्यरूप देने की ओर बढ़ा है। समझ यह है कि उस समय नव-स्वतंत्र देशों के पास उपनिवेशवाद- विरोधी विचार की ताकत तो थी, लेकिन उनके पास अपनी आर्थिक शक्ति नहीं थी। अब यह शक्ति उनके पास है, जिसके जरिए वे नई विश्व व्यवस्था बनाने का इरादा दिखा रहे हैँ।
यह परिघटना सफल होती है, तो अर्थव्यवस्था में उत्पादक क्षमता, संप्रुभ विकास, एवं राष्ट्र की सीमा के भीतर नीति निर्माण फिर से संभव हो सकेगा। तब बहुराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के साथ अपना हित जोड़ चुके विकासशील देशों के शासक वर्गों को अभी प्राप्त अंतरराष्ट्रीय संरक्षण कमजोर पड़ेगा। उससे मजदूर वर्ग के लिए अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ने एवं उस संघर्ष में सफल होने की अधिक अनुकूल स्थितियां बनेंगी। इसलिए ब्रिक्स+ की सफलता के साथ मजदूर वर्ग का हित जुड़ा हुआ है।
ब्रिक्स की स्थापना ब्राजील, रूस, भारत और चीन के सहयोग से हुई, जिसमें बाद में दक्षिण अफ्रीका भी जुड़ गया। अभी कुछ वर्ष पहले तक इस समूह की भूमिका दुनिया के मंच पर उतनी प्रखर नहीं थी। फिर भी इसके तहत उभरती अर्थव्यवस्था वाले पांच देश ना सिर्फ वैश्विक आर्थिक ढांचे में परिवर्तन की मांग रख रहे थे, बल्कि वे मौजूदा ढांचे का विकल्प बनाने की दिशा में भी बढ़ रहे थे। 2015 में इन देशों ने न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थापना की, जिसे बोलचाल में ब्रिक्स बैंक के नाम से भी जाना जाता है। आम समझ है कि इसकी स्थापना विश्व बैंक के विकल्प के रूप में हुई है। ब्रिक्स देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का विकल्प निर्मित करने का मुद्दा भी चर्चा में रहा है, जो अभी तक ठोस रूप नहीं ले सका है।
फरवरी 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से परिदृश्य तेजी से बदला है। जब अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों ने रूस पर कठोरतम प्रतिबंध लगा दिए और उसे अपनी वित्तीय व्यवस्था से बाहर कर दिया, तो वैकल्पिक व्यवस्था बनाने का मुद्दा ब्रिक्स देशों की चर्चा में केंद्रीय स्थल पर आ गया। इसी दौर में विश्व कारोबार पर डॉलर का वर्चस्व खत्म करने की चर्चा ने जोर पकड़ा है। हालांकि ब्रिक्स+ के मंच पर अभी इस बारे में सैद्धांतिक बातें ही ज्यादा हुई हैं, मगर विभिन्न देशों के बीच आपसी मुद्रा में कारोबार की प्रवृत्ति पर व्यावहारिक रूप ले चुकी है। चूंकि चीन आज सबसे बड़ी उत्पादक अर्थव्यवस्था है, इसलिए इस प्रक्रिया को ठोस रूप देने में उसकी प्रमुख भूमिका है। इस प्रक्रिया को de-dollarization के रूप में जाना जा रहा है। इस दौर में ब्रिक्स का विस्तार भी हुआ है। इसमें छह और देश शामिल हो चुके हैँ। इसीलिए अब इसे ब्रिक्स+ या ब्रिक्स-11 के नाम से जाना जाता है।
श्रमिक वर्ग के लिए इस घटनाक्रम का क्या महत्त्व है, इसे समझने के लिए नव-उदारवादी दौर में जो हुआ, उस पर हमें ध्यान देना चाहिए। भारत में 1991 में कथित ढांचागत समायोजन (structural adjustment) के साथ अपनाई गई नव-उदारवादी अर्थव्यवस्था (जिसके तहत निजीकरण, उदारीकरण एवं भूमंडलीकरण की नीतियां लागू की गईं) असल में उसके पहले अमेरिका एवं ब्रिटेन में चलन में आ चुकी थी। उसके पहले चिली जैसे देशों में इसका आरंभिक प्रयोग किया गया था। बाद में विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और अमेरिका के वित्त मंत्रालय ने इससे संबंधित नीतियों को सूत्रबद्ध किया, जिसे Washington Consensus के नाम से जाना जाता है। 1990 के दशक के मध्य में इन नीतियों से संबंधित नियमों को तय करने और उन पर अमल की निगरानी के लिए विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) का गठन किया गया।
पूंजी को नियंत्रण-मुक्त करना इस नीति का केंद्रीय पहलू है। इस सोच के तहत श्रमिक अधिकार एक किस्म की रुकावट हैं। निवेशक श्रमिक अधिकारों की चिंता से मुक्त रहते हुए वैश्विक स्तर पर कारोबार कर सकें, Washington Consensus के तहत यह सर्व-सहमत नीति है। भारत में आज बात श्रम संहिताओं को लागू करने तक पहुंची है, तो यह इन नीतियों पर अमल का स्वाभाविक परिणाम है। दरअसल, भारत या किसी अन्य देश में श्रमिकों के वैधानिक अधिकारों के लागू होने का हमेशा ही वैश्विक संदर्भ रहा है। इसे समझने के लिए हमें श्रमिक अधिकार की अवधारणा के उदय एवं उसकी विकास यात्रा पर ध्यान देना चाहिए।
श्रमिक अधिकारों की अवधारणा का समाजवाद की विचारधारा के अस्तित्व में आने से सीधा संबंध रहा है। 18वीं सदी से पहले ऊंच-नीच पर आधारित पर सामाजिक व्यवस्था में श्रमिकों के अधिकार की कोई अवधारणा नहीं थी। कुछ समाजों में श्रमिकों के लिए कल्याणकारी कार्यों के कायदे जरूर थे। मसलन, ब्रिटेन में 1351 श्रमिक अधिनियम के तहत ब्लैक डेथ जैसी महामारी से मृत मजदूरों के परिजन को सहायता देने का प्रावधान किया गया था। लेकिन इसे किसी रूप में अधिकार नहीं कहा जा सकता।
औद्योगिक क्रांति (18वीं सदी के अंत से 19वीं सदी) के आरंभिक दौर में कारखानों में कामकाज के ना तो घंटे तय थे, ना बाल मजदूरी पर रोक थी, ना खतरनाक हालात में काम लेने पर कोई प्रतिबंध था और ना ही न्यूनतम मजदूरी जैसी कोई सोच मौजूद थी।
इन्हीं परिस्थितियों के कारण श्रमिकों को अपने संगठन बनाने पर मजबूर होना पड़ा। लेकिन उन्हें भी गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। मगर हालत इतने खराब थे कि मजदूरों ने संघर्ष जारी रखा। तब जाकर ब्रिटेन में कारखाना अधिनियम (1802–1878) पारित हुआ, जिससे बाल श्रम को सीमित किया गया और बुनियादी सुरक्षा नियम निर्धारित किए।
इसी पृष्ठभूमि में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो (1848) में श्रमिकों को सर्वहारा वर्ग के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने बताया कि इस वर्ग का पूंजीवाद में किस तरह शोषण होता है। इससे मुक्ति के लिए उन्होंने वर्ग संघर्ष के जरिए राजसत्ता पर श्रमिक वर्ग के कब्जे की वकालत की। उनकी ही पहल पर फर्स्ट इंटरनेशनल (1864) का गठन हुआ, जिसने यूरोप भर में श्रमिक आंदोलनों को एकजुट किया। उन प्रयासों के फलस्वरूप 19वीं सदी के अंत से 20वीं सदी की शुरुआत के दौर में संगठित श्रमिक संगठनों का उदय हुआ। उसके परिणामस्वरूप ही ब्रिटेन का ट्रेड यूनियन अधिनियम (1871) और अमेरिका का क्लेटन एक्ट (1914) जैसे कानून बने, जिन्होंने यूनियनों के अस्तित्व और हड़ताल के अधिकार को मान्यता दी।
मगर मजदूरों को सबसे बड़ा बल रूस में 1917 की बोल्शेविक क्रांति से मिला। मानव इतिहास में पहली बार एक ऐसे राज्य की स्थापना हुई, जिसने अपने को श्रमिक वर्ग का शासन घोषित किया। इस घटना ने एक तरफ दुनिया भर के श्रमिकों में अपना राज कायम के सपने एवं उत्साह को जन्म दिया, तो दूसरी तरफ इससे पूंजीपति एवं पारंपरिक शासक वर्गों में अपना राज खोने का भय पैदा हुआ। दूसरे विश्व युद्ध के बाद पूर्वी यूरोप में साम्यवादी व्यवस्थाओं की स्थापना, चीन, उत्तर कोरिया, क्यूबा, वियतनाम आदि में कम्युनिस्ट क्रांति और बहुत से देशों में क्रांतिकारी संघर्षों के उभार ने इस परिघटना को मजबूती से और आगे बढ़ाया। इसका मुकाबला करने के लिए शासक वर्गों ने जो रणनीतियां अपनाईं, उनमें मजदूर वर्ग को कई तरह की रियायत देना भी शामिल था।
दूसरे विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी देशों में श्रमिक वर्ग को ट्रेड यूनियन बनाने के कानूनी अधिकार मिले, जिससे वे अपने हित में सामूहिक सौदेबाजी करने में सक्षम हुए। इसी परिघटना को कल्याणकारी राज्य के रूप में जाना गया। पश्चिम के पूंजीवादी देशों ने यह संदेश देने की कोशिश की कि पूंजीवाद के अंदर भी श्रमिकों को अधिकार मिल सकते हैं। इन दौरान पूंजीवादी देशों में भी जो अधिकार मजदूरों को मिले, उनमें शामिल हैः
o 8-घंटे का कार्यदिवस
o वैतनिक अवकाश
o पेंशन और स्वास्थ्य बीमा
o कार्यस्थल पर सुरक्षा के मजबूत नियम, और
o सामूहिक सौदेबाजी के सिद्धांत के तहत ट्रेड यूनियन बनाने एवं हड़ताल के कानूनी अधिकार
मगर यह दौर 1970 के दशक में पूंजीवाद के तहत उत्पादकता एवं मुनाफा दर में निरंतर ह्रास, 1980 के दशक पूर्वी यूरोपीय व्यवस्थाओं के संकटग्रस्त होने और आखिरकार 1991 में सोवियत संघ के बिखराव के साथ खत्म हो गया। लगभग उसी समय शक्ति छिपाते हुए समय काटो (hide strength, bide time) की रणनीति के तहत चीन के अस्पष्ट (ambivalent) रुख अपना लेने से भी पूंजीवादी देशों के शासक वर्गों में यह भरोसा पैदा हुआ कि आखिरकार साम्यवाद की चुनौती को उन्होंने हरा दिया है। इस दौर में,
- धनी देशों के पूंजीपतियों ने अपने उद्यमों को कम मजदूरी वाले देशों में ले जाना शुरू किया। इसी क्रम में भारत जैसे कम मजदूरी वाले देशों को ट्रेड यूनियनों को कमजोर करने और श्रम कानूनों को ढीला या खत्म करने के लिए राजी या मजबूर किया गया।
- ब्रिटेन में मार्गरेट थैचर के शासनकाल और अमेरिका में रोनाल्ड रेगन के शासनकाल में ट्रेड यूनियन शक्ति को कम करने और सार्वजनिक उद्यमों का निजीकरण करने की प्रक्रिया तेजी से शुरू की गई। जल्द ही इन नीतियों पर तमाम शासकवर्गीय पार्टियों में आम सहमति बन गई।
- इस दौर में दुनिया भर में अंशकालिक (पार्टटाइम), अस्थायी (कैजुअल) और अनौपचारिक (informal) श्रम में वृद्धि हुई है और स्थायी नौकरी की सुरक्षाओं को कमजोर किया गया है।
- इस दौर में गिग इकोनॉमी और डिजिटल श्रम के उदय ने श्रमिक अधिकारों के लिए नई चुनौतियां भी पैदा की हैं। उबर और अमेज़ॅन जैसे प्लेटफार्म कंपनियों ने श्रमिकों को बिना कोई अधिकार संबंधी लाभ दिए ऐसी नौकरियां पैदा की हैं, जिनमें कर्मचारियों के लिए कोई सुरक्षा नहीं है। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के प्रचलन में आने से पूंजीवादी देशों में ऐसे हालात और बदतर होंगे।
यह तो साफ है कि श्रमिकों को अधिकार मिलने का वैश्विक संदर्भ है। भारत जिस समय आजाद हुआ, वह वही दौर था, जब दुनिया में सोशल डेमोक्रेसी प्रचलन में आई थी, जिसके तहत शासक वर्गों ने श्रमिकों के लिए रियायत की नीतियां अपनाईं। 1991 के बाद यह दौर दुनिया भर में बदल गया। उसके बाद के दौर में वो नीतियां चली हैं, जो Washington Consensus के तहत तैयार हुई थीं। मगर अब उनका दौर गुजर चुका है। ब्रिक्स+ इस बदलाव का एक प्रतीक है। इसलिए इसके महत्त्व को कम-से-कम श्रमिक वर्ग को अवश्य समझना चाहिए।
