संघ और भाजपा में क्या है संबंध?

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सभी  बातों की बारीकियों को समझे बगैर न तो आरएसएस को समझा जा सकता है, न भारतीय जनता पार्टी को समझा जा सकता है और न दोनों संगठनों के संबंधों को समझा जा सकता है। बहुत अच्छा संयोग है जो संघ प्रमुख ने भी अपने व्याख्यानों से भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया है तो संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने भी समस्त भ्रांतियों को दूर किया है। आशा है कि इससे आरएसएस और भाजपा को समझने की दृष्टि स्पष्ट होगी।

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ यानी आरएसएस की स्थापना के एक सौ वर्ष पूरे हुए हैं। यह अवसर इस सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी संगठन के विचारों के प्रसार के साथ साथ इसके बारे में बनी अनेक प्रकार की भ्रांतियों को दूर करने का भी है। मोहन भागवत स्वंय देश के अलग अलग क्षेत्रों में एक व्याख्यान शृंखला के तहत संघ के उद्देश्यों से लेकर इसके कार्य करने की तरीके और भारतीय जनता पार्टी के साथ इसके संबंधों के बारे में बनी भ्रांतियों को दूर कर रहे हैं। उन्होंने बहुत स्पष्ट शब्दों में कहा है कि आरएसएस को भाजपा की दृष्टि से देखने वाले प्रायः गलती कर जाते हैं।   ने कहा है कि आरएसएस कोई पैरामिलिट्री फोर्स नहीं है और इसका उद्देश्य किसी का विरोध करना या किसी से लड़ना नहीं है। आरएसएस राष्ट्र निर्माण और लोगों को जोड़ने का काम करता है। इसी बात को एक व्यापक दृष्टि के साथ भाजपा के संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने देश के सामने प्रस्तुत किया है। आरएसएस के मुखपत्र ‘पांचजन्य’ को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने भाजपा के कामकाज के तौर तरीके, निर्णय प्रक्रिया, नेतृत्व की भूमिका, संगठन के विस्तार, संगठन व सरकार के साथ समन्वय और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के साथ संबंधों की व्याख्या की है। यह उनका संभवतः पहला विस्तृत साक्षात्कार है। उन्होंने जिस स्पष्टवादिता के साथ सभी प्रश्नों के उत्तर दिए हैं वह समकालीन राजनीति में एक दुर्लभ गुण है।

यह साक्षात्कार कई दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे कई प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं और संघ व भाजपा की दूरदृष्टि दिखाई देती है। उदाहरण के तौर पर देश के लोग जानना चाहते हैं कि राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर नितिन नबीन का चयन कैसे हुआ। बीएल संतोष से पूछा गया कि भाजपा अपने निर्णयों से अब तक देश को चौंकाती रहती थी क्या अब वह स्वंय को चौंका रही है? उन्होंने एक बहुत ही अच्छे रूपक के साथ इस प्रश्न का उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि किसी परिवार में कन्या के विवाह के लिए वर का नाम जब लोगों को बताया जाता है तभी पता चलता है कि कन्या का विवाह किसके साथ होना निर्धारित हुआ है। परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि वर का चयन उसी समय हुआ हो। चयन की प्रक्रिया चल रही होती है और जिस दिन नाम बताया जाता है उस दिन सबको पता चलता है। इसको चौंकाना नहीं कहते हैं।

ऐसे ही राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया है। उन्होंने बताया कि सात से आठ महीने पहले इस पर विचार मंथन की प्रक्रिया शुरू हुई। असल में भाजपा के अंदर संगठन के चुनाव की व्यापक प्रक्रिया है। पहले जिला और प्रदेशों में चुनाव होते हैं और उसके बाद राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव होता है। इसी प्रक्रिया के तहत नितिन नबीन का चयन हुआ। परंतु यह नहीं समझना चाहिए कि जिस दिन उनके नाम की घोषणा हुई उसी दिन उनका नाम तय हुआ या उसी दिन उनका चयन हुआ। ध्यान रहे जेपी नड्डा का कार्यकाल 2023 में समाप्त हो रहा था परंतु उस वर्ष कई राज्यों के चुनाव थे और अगले साल लोकसभा का चुनाव होना था इसलिए उनको कार्यकाल का विस्तार दिया गया। फिर एक के बाद एक चुनावों की वजह से उनका कार्यकाल बढ़ता गया। पिछले वर्ष दिल्ली विधानसभा का चुनाव संपन्न होने के कुछ समय बाद चुनावों की प्रक्रिया शुरू हुई और लंबे विचार विमर्श के बाद नितिन नबीन का नाम तय हुआ।

संगठन चुनाव की प्रक्रिया समझाने के बाद उन्होंने बहुत ही विस्तार से संघ और भाजपा के संबंधों की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि भाजपा अपने विस्तार में, अपनी निर्णय प्रक्रिया में और अपने कामकाज में अनेक शुभचिंतकों से विचार विमर्श करती है और उनकी सलाह लेती है। आरएसएस उसके सबसे बड़े शुभचिंतकों का समूह है। इसके बाद उन्होंने दोनों के संबंधों की व्याख्या करने के लिए जो रूपक गढ़ा वह अद्भुत है। उन्होंने कहा कि आरएसएस तो भाजपा का मायका है। मायका यानी मां का घर है। इस एक वाक्य से उम्मीद करनी चाहिए कि तमाम भ्रांतियां दूर होंगी और सभी प्रश्नों के उत्तर मिलेंगे। आरएसएस की कोख से भाजपा का जन्म हुआ है तो वहां की सलाह ली ही जाएगी। परंतु इसी जगह पर उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि भाजपा अपनी निर्णय प्रक्रिया के लिए स्वतंत्र है। आरएसएस एक प्रेरणा के तौर पर है और प्रेरणा असीमित होती है। इस तरह सारी अस्पष्टता को दूर करते हुए कहा कि आरएसएस से भाजपा को प्रेरणा मिलती है, समय समय पर परामर्श मिलता है लेकिन भाजपा का निर्माण इस तरह से हुआ है कि वह अपने निर्णय करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है।

ऐसे ही प्रायः सत्ता, संगठन और विचारधारा को लेकर प्रश्न उठते हैं। इस प्रश्न का भी बेहद सधा हुआ उत्तर संगठन महामंत्री ने दिया। उन्होंने कहा कि विचारधारा के मूल से कोई समझौता नहीं हो सकता है लेकिन सत्ता प्राप्त करना भी राजनीति का उद्देश्य होता है। इसका अर्थ है कि विचारधारा की मूल अवधारणा से समझौता किए बगैर सत्ता प्राप्त करना भाजपा का उद्देश्य है। यह उद्देश्य क्यों है इसे भी उन्होंने विस्तार से समझाया। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर सत्ता नहीं होती तो हम अनुच्छेद 370 को हाथ भी नहीं लगा सकते थे। हम अनुच्छेद 35ए को हाथ भी नहीं लगा सकते थे। उन्होंने कहा कि सिर्फ भाषण देने या प्रदर्शन करते रहने से कुछ नहीं बदलता है।

आप जिन संवैधानिक या व्यवस्थागत खामियों का विरोध करते रहे हैं उनके ठीक करने के लिए आपको सत्ता की आवश्यकता होगी। इसलिए भाजपा को सत्ता प्राप्त करने की राजनीति करने में कोई हिचक नहीं है। उन्होंने यहां स्पष्ट किया कि सत्ता एक साधन की तरह है। वह भोग करने के लिए नहीं है। उसका प्रयोग जन आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किया जाना चाहिए। संगठन मंत्री बीएल संतोष ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 12 वर्षों में सत्ता का प्रयोग भोग के लिए नहीं, बल्कि कई खामियों को दूर करने और जन आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए किया है।

अपने साक्षात्कार में बीएल संतोष ने इन प्रश्नों के उत्तर भी दिए हैं कि भाजपा के संगठन का विस्तार कैसे हुआ, संगठन में निर्णय कैसे होते हैं, क्या भाजपा में निर्णय की प्रक्रिया केंद्रीकृत हो गई है और भाजपा व्यक्ति केंद्रित है या संगठन केंद्रित।संगठन महामंत्री ने संगठन प्रक्रिया के बारे में बताते हुए एक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि एक बहुत छोटा निर्णय होना था, जो एक व्यक्ति कर सकता था। परंतु उन्होंने इसके लिए 17 अलग अलग लोगों से विचार विमर्श किया और उनकी राय को टाइप करके राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा को भेजा। इसके बाद भी राष्ट्रीय अध्यक्ष ने उनको फोन करके पूछा कि इस पर उनकी क्या राय है। उसके बाद निर्णय किया गया। इस तरह उन्होंने बताया कि भाजपा में निर्णय की प्रक्रिया कितनी लोकतांत्रिक है और कितनी विकेंद्रित है। वहां हर निर्णय के पीछे अनेक लोगों की राय होती है और निर्णय उस पर आधारित होता है। इसका अर्थ है कि भाजपा में ऊपर से निर्णय थोपे जाने की जो बात करते हैं उनको इसके कामकाज के बारे में कोई जानकारी नहीं होती है।

भाजपा नेतृत्व के व्यक्ति केंद्रित होने के आरोप भी विपक्षी पार्टियों की ओर से अक्सर लगाए जाते हैं। परंतु भाजपा में ऐसा बिल्कुल नहीं है। हां, यह अवश्य है कि प्रधानमंत्री या अध्यक्ष हैं तो उनको श्रेय मिलेगा या उनकी बात महत्वपूर्ण होगी परंतु सारे फैसले वे नहीं करते हैं।   राष्ट्रीय महामंत्री ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे पूर्व उप राष्ट्रपति   वेंकैया नायडू की एक वन लाइनर के जरिए इसकी व्याख्या की।   वेंकैया नायडू अक्सर कहा करते थे कि ‘प्रेसिडेंट प्रिजाइड, पार्टी डिसाइड’। इसका अर्थ है कि पार्टी का अध्यक्ष निर्णय प्रक्रिया की बैठकों की अध्यक्षता करेगा लेकिन निर्णय पार्टी करेगी। यह भाजपा की सबसे बड़ी शक्ति है, जिसका मुकाबला कोई दूसरी पार्टी नहीं कर सकती है। इसकी बारीकी में जाएं तब इस बात का महत्व समझ में आता है।

उन्होंने यह भी कहा कि सिद्धांत तय करने की प्रक्रिया केंद्रीकृत है लेकिन उस सिद्धांत पर अमल की प्रक्रिया विकेंद्रित और पूरी तरह से लोकतांत्रिक है। इसका भी उन्होंने उदाहरण दिया और कहा कि भाजपा के 16 हजार मंडल हैं। इसको लेकर एक सिद्धांत तय हुआ कि मंडल अध्यक्ष 45 वर्ष से ज्यादा आयु का नहीं होगा। यह सिद्धांत तय होने के बाद राष्ट्रीय नेतृत्व की भूमिका समाप्त हो गई। इसके बाद किस मंडल का अध्यक्ष कौन होगा यह बिल्कुल जमीनी स्तर पर पार्टी तय करेगी। उस प्रदेश के मुख्यमंत्री की भी इसमें कोई भूमिका नहीं होती है। इसी तरह भाजपा के संगठन विस्तार की जानकारी देते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा ने 14 करोड़ सदस्य बनाए हैं और यह काम पार्टी का शीर्ष नेता नहीं कर रहा था।

इसमें पार्टी के 57 लाख नेता और कार्यकर्ता लगे। सबने पांच या 10 या उससे ज्यादा सदस्य बनाए, तब भाजपा दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनी। इन सब बातों की बारीकियों को समझे बगैर न तो आरएसएस को समझा जा सकता है, न भारतीय जनता पार्टी को समझा जा सकता है और न दोनों संगठनों के संबंधों को समझा जा सकता है। बहुत अच्छा संयोग है जो संघ प्रमुख ने भी अपने व्याख्यानों से भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास किया है तो संगठन महामंत्री बीएल संतोष ने भी समस्त भ्रांतियों को दूर किया है। आशा है कि इससे आरएसएस और भाजपा को समझने की दृष्टि स्पष्ट होगी। (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)


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