भारत की एकमात्र “अनलूटेबल” संपत्ति वह पतली परत है—अंग्रेज़ी-फ्लुएंट, विश्लेषणात्मक रूप से प्रशिक्षित दिमाग़ों की—जिसे मैकाले ने जन्म दिया था। बाकी कोयला, खनिज, नदियाँ—हमने ही चुरा लिए, बर्बाद किए, या लाल फ़ीते में कसकर बांध दिए। इतना सब होने के बावजूद हमने इसके साथ क्या किया? लगभग कुछ नहीं—बल्कि उल्टा किया।
एक असहज सच है, जिसे बोलते ही या लिखते ही कथित “देशभक्त” व्हाट्सऐप ग्रुप का दरवाज़ा बंद हो जाएगा। पर सच से आँख चुराने का कोई फ़ायदा नहीं है। आधुनिक भारत आज भी उसी ईंधन पर चल रहा है, जिसे 1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकाले ने हमारी नसों में उतारा था। यह कोई अकादमिक तर्क नहीं, यह जमीन की वह कठोर हकीकत है।
और यह हकीकत बताती है कि आईटी एक्सपोर्ट से लेकर फार्मा पेटेंट तक, रिज़र्व बैंक से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं से लेकर वैश्विक स्टार्ट-अप बोर्डरूम तक—भारत की जो भी आधुनिक मशीनरी चल रही है, उसका अस्सी फ़ीसदी इंजन उसी अंग्रेज़ी शिक्षा और विश्लेषणात्मक प्रशिक्षण से पनपा जिसे मैकाले ने अपने “मिनट”या कि नोट में दर्ज किया था।
मैकाले तब महज़ 34 साल का था, भारत में चार साल भी पूरा नहीं काट पाया, फिर भी उसने कॉलोनी को बदल देने वाली वह अवधारणा गढ़ दी जिसने आगे चलकर पूरे राष्ट्र, भारतीयों के के बौद्धिक खाके को आकार दिया।
मैकाले ने साफ कहा था कि उसे ऐसी प्रशासकीय जाति चाहिए जो “खून और रंग से भारतीय भले हो पर स्वाद, विचार, चरित्र और बुद्धि से अंग्रेज़।” उसने जो माँगा, इतिहास ने वैसा ही बना दिया। आज हमारे बौद्धिक पिरामिड की ऊपर की 15–20 प्रतिशत परत—जिसे आप चाहें तो “मैकाले के बच्चे” कह लें वह भारत का सबसे ज़्यादा टैक्स उत्पन्न करती है, ज़्यादातर फॉरेन एक्सचेंज कमाती है, विज्ञान और प्रौद्योगिकी की लगभग सारी उपलब्धियों को आकार देती है, और दुनिया में भारत की साख का सबसे बड़ा जनक है।
बाकी 80 प्रतिशत मेहनतकश भारत पर इसका कोई मान नहीं; यह उस आर्थिक सच्चाई का नाम है जिसमें हम अभी भी रहते हैं। वह सच्चाई यह है कि भारत की प्रति व्यक्ति आय आज भी बोत्सवाना और गैबन जैसे देशों से कम है—वे देश जो तेल, हीरों और प्राकृतिक संपदा के महासागरों पर टिके हैं, जबकि हम दुनिया की सबसे कम उपयोग की गई मानवीय प्रतिभा पर टिके हैं।
मैकाले के आलोचक सदैव रहे—गांधी की पीढ़ी से लेकर आज की सत्ता तक। और वे एक बिंदु बिल्कुल ठीक उठाते हैं: यह शिक्षा-प्रणाली नवोन्मेषी दिमाग़ नहीं बनाती, बल्कि एक क्लर्की जाति बनाती थी और है। यह भारतीय भाषाओं की प्रतिभा को दबा गई; इसने शिक्षा को ज्ञान की बजाय सामाजिक प्रतिष्ठा का टोकन बना दिया; और पीढ़ियों को पश्चिमी मान्यता के लिए लालायित कर दिया।
यह सब सच है। लेकिन आलोचक यहीं रुक जाते हैं, जबकि वाक्य अधूरा इसी वजह से रह जाता है कि वे यह नहीं कहते कि—यदि यह ढांचा न होता तो क्या होता?
सचाई यह है कि यदि मैकाले की वह प्रशासनिक रीढ़ न होती, तो 1947 में 28 रियासतों और 565 जागीरों वाला यह उपमहाद्वीप एक गणराज्य के रूप में एकसाथ खड़ा ही नहीं हो पाता। हमारे पास “बॉम्बे प्लान” जैसी औद्योगिक कल्पना लिखने वाले अभियंता नहीं होते, 1974 में परमाणु परीक्षण करने वाले वैज्ञानिक नहीं होते, और 1991 में अपने ही संकट से जूझते हुए आईएमएफ को ठोस अंग्रेज़ी तर्कों के साथ यह मनाने वाले अर्थशास्त्री नहीं होते कि भारत को सांस लेने दीजिए, हम अपनी अर्थव्यवस्था को खोलेंगे।
गणतंत्र दिवस पर जिस भी उपलब्धि का हम झंडा उठाते हैं, उसकी कहानी को ध्यान से पढ़िए—आप पाएँगे कि उसके लेखक, उसके तकनीकी दिमाग, उसके मुख्य संचालक, वे ही थे जिन्हें मैकाले ने कभी अपनी “प्रशासकीय जाति” के लिए कल्पना किया था।
ज़रा दुनिया के नक्शे में एक और उदाहरण देखिए। अफ्रीका में भारत के मुकाबले दस गुना अधिक खनिज-संपदा है, दो गुना ज़मीन है, और वहाँ उपनिवेशी भाषाई दखल भी भारत जितना गहरा नहीं था। फिर भी उप-सहारा अफ्रीका की प्रति व्यक्ति आय भारत से अधिक है। क्यों? क्योंकि खनिज और प्राकृतिक संपदा को तानाशाह और ताकतवर लूट सकते हैं; मानव पूंजी को कोई नहीं लूट सकता।
भारत की एकमात्र “अनलूटेबल” संपत्ति वह पतली परत है—अंग्रेज़ी-फ्लुएंट, विश्लेषणात्मक रूप से प्रशिक्षित दिमाग़ों की—जिसे मैकाले ने जन्म दिया था। बाकी कोयला, खनिज, नदियाँ—हमने ही चुरा लिए, बर्बाद किए, या लाल फ़ीते में कसकर बांध दिए।
इतना सब होने के बावजूद हमने इसके साथ क्या किया? लगभग कुछ नहीं—बल्कि उल्टा किया। पिछले अट्ठहत्तर वर्षों में हमारा शिक्षा बजट 4.6 प्रतिशत जीडीपी के आसपास मँडराता है; उसमें से भी ज़्यादातर पैसा इमारतों और वेतनों में डूब जाता है, सीखने-सिखाने में नहीं। देश के पाँच प्रतिशत बच्चों को भी दुनिया-स्तरीय शिक्षा नहीं मिलती।
हमारे पास गुणवत्तापूर्ण विश्वविद्यालयों से ज्यादा विश्वविद्यालय नियामक हैं। और हर कुछ साल में एक नया नेता राजनीतिक लाभ के लिए घोषणा करता है—“हम मैकाले की आत्मा को दफ़ना देंगे।” लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि—क्या हमने वह वैकल्पिक ढांचा बनाया है जो मैकाले की जगह ले सके?
यदि प्रधानमंत्री मोदी सचमुच मैकाले को “दफ़नाना” चाहते हैं, तो पहले यह साबित करना होगा कि जो प्रणाली वह नापसंद करते हैं, उससे बेहतर प्रणाली वे गढ़ सकते हैं। मैकाले की मशीनरी—जिसे 180 साल से अवमानना, कम फंडिंग, और राजनीतिक बाधाओं का सामना करना पड़ा—फिर भी चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाला देश बना गई, और दुनिया के आधे सिलिकॉन वैली को चलाने वाला भारतीय दिमाग़ पैदा कर गई। लेकिन हम स्वतंत्र भारत में 78 साल में यह भी सुनिश्चित नहीं कर पाए कि हमारे आधे बच्चे कक्षा 5 तक सामान्य स्तर की साक्षरता हासिल कर लें।
इसलिए जारी रही नाम बदलने की रस्में, इतिहास-पुस्तकों को दुबारा लिखने की कवायदें, और राष्ट्रवादी सीने ठोकने की परंपरा। पर हर बार याद रखिए—जब कोई भारतीय कंपनी ब्रिटेन का फुटबॉल क्लब खरीदती है, जब कोई भारतीय-अमेरिकी किसी अमेरिकी राज्य का गवर्नर बनता है, जब कोई भारतीय वैक्सीन अफ्रीका के बच्चे को बचाती है—तब मैकाले कब्र में हँस रहा होता है। और जब हम एक भी विश्वविद्यालय को वैश्विक शीर्ष 100 में नहीं पहुँचा पाते, जब हर वर्ष एक नई आईआईटी की प्रतिभा कैलिफोर्निया उड़ जाती है क्योंकि अपने देश में उसके दिमाग़ की भूमि नहीं—तब मैकाले जीत रहा होता है।
असल चुनाव मैकाले बनाम किसी खोई हुई “पवित्र भारतीय” शिक्षा प्रणाली का नहीं है। चुनाव यह है कि क्या भारत अब वह साहस जुटाएगा कि मैकाले को उसकी ही जमीन पर मात दे—उत्कृष्टता को लोकतांत्रिक बनाकर, विश्व-स्तरीय शिक्षा को कश्मीर से कन्याकुमारी और किबिथू तक हर बच्चे का अधिकार बनाकर, या फिर सदियों तक उसके पुतले जलाते हुए और अपने बच्चों को उन्हीं कोचिंग फैक्टरियों में भेजते हुए जहाँ वही सिखाया जाता है जो मैकाले चाहता था—दुनिया से बेहतर सोचना, उसी भाषा में जो उसने दी।
जब तक हम यह चुनाव नहीं करते, तब तक कृपया “एंटी-मैकाले” प्रवचन किसी और के लिए बचा कर रखिए। हकीकत यह है कि मैकाले के बच्चे ही आज भी भारत के बिल भर रहे हैं—और हम सब, चाहे वाम हों या दक्षिण, भगवा हों या तिरंगा, उस बौद्धिक पूंजी पर जिंदा हैं जिसे हमने कभी फिर से भरा ही नहीं। यह दोष मैकाले का नहीं। यह दोष हमारा है।
