वह जंगल राज था या यह जंगल राज?

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जंगल राज जिसे कहते हैं मोदी रोज हर भाषण में उसमें गरीब को घर में बंद करने की बात कभी किसी ने कही थी? जिसे जंगल राज कहते हैं वह गरीब का सिर उठाकर खड़ा हो जाना था। सामंत, सामाजिक ताकतें कहती थीं घर से मत निकलने दो। मगर सरकारें इन फरमानों को स्वीकार नहीं करती थी। वह गरीब के साथ खड़ी हो जाती थी। इसीलिए वह जंगल राज था? और आज मंत्री खुद कहता है कि इन्हें घरों में बंद कर दो तो यह सुशासन है!

केंद्रीय मंत्री ललन सिंह का यह बयान वायरल हो रहा है कि चुनाव के दिन गरीबों को घर से मत निकलने दो। मतलब उनका वोट भी खुद जाकर डाल आओ। फिर कहते हैं ज्यादा हाथ पांव ज्यादा जोड़ें तो अपने साथ लेकर जाओ और वोट डलवाकर अपने साथ ही वापस लाकर फिर घर में बंद कर दो।

उनके समर्थक यह सुनकर हर्ष ध्वनि करते हैं। पुलिस और प्रशासन के लोग वहां साथ खड़े होते हैं।

अब इसे क्या कहेंगे? चुनाव आयोग कहता है सरकारें कहती हैं कि लोग घर से निकलें मतदान करें। और इधर केन्द्र में मंत्री राज्य में मुख्यमंत्री की पार्टी के पुलिस प्रशासन के साथ अपने समर्थकों को खुले आम कह रहे हैं इन कमजोर, गरीब, दलित, अति पिछड़ों, पिछड़ों को घर से मत निकलने देना।

11 साल केन्द्र में और 20 साल राज्य में अगर गरीब के लिए कुछ करते तो यह नहीं कहना पड़ता कि उन्हें वोट डालने मत जाने दो। वोट डालने से रोकते हैं और कहते हैं कि सुशासन है!

प्रधानमंत्री मोदी पूरे चुनाव में जिसके पहले फेज का चुनाव प्रचार बंद हो गया है और गुरूवार जब आप यह आलेख पढ़ रहे होंगे वोट डाले जा रहे होंगे में सबसे ज्यादा एक ही बात बोलते रहे – जंगल राज . . . जंगल राज! आज मीडिया में है इतना दम कि प्रधानमंत्री मोदी से पूछ सके कि यह आपका मंत्री खुले आम लोगों को घर में बंद करने की बात कह रहा है यह जंगल राज है कि नहीं?

प्रधानमंत्री छोड़िए जनता से हाथ पांव जुड़वाने की बात कर रहे केंद्रीय मंत्री ललन सिंह से भी नहीं पूछ सकता कि आप अपने समर्थकों से कानून हाथ में लेने की बात कैसे कर रहे हैं?एक पत्रकार ने इससे पहले ललन सिंह से पूछा कि आपकी पार्टी ने इतने अपराधों के आरोपी अनंत सिंह को मोकामा से टिकट क्यों दिया तो जवाब देने के बदले वे पत्रकार पर ही आरोप लगाने लगे कि आप किसलिए ऐसा पूछ रहे हैं हमें मालूम है।

उल्टा पत्रकार पर आरोप लगा दो। जनता पर अगर शक है कि हमारे नौकरी रोजगार न देने से दुखी होकर वह इस बार हमारे खिलाफ वोट कर देगी तो उसे वोट डालने के लिए घर से बाहर मत निकलने दो। आजकल फोन सबके पास हैं। मंत्री बोलता है तो वीडियो बनते ही हैं। वह वीडियो वायरल हो गया। चुनाव आयोग को शर्मा- शर्मी ललन सिंह को नोटिस देना पड़ा। एफआईआर दर्ज करना पड़ी।

चुनाव आयोग की परीक्षा है यह अगर खुद को निष्पक्ष और स्वतंत्र साबित करना चाहती है तो ललन सिंह के चुनाव प्रचार पर पाबंदी लगाए। 14 नवंबर मतगणना तक उनको बिहार से बाहर रखे। बहुत बड़ा अपराध है यह। आईपीसी 171 सी के अन्तर्गत दंडनीय अपराध है। गैर जमानती।

मगर फिलहाल चुनाव आयोग कोई कार्रवाई करने के बदले उनसे उनका पक्ष पूछ रही है। जो उन्होंने कह दिया कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई है।

बहुत सिम्पल सवाल है। आजकल टेक्नोलाजी के दौर में फैक्ट चेकिंग में कितना समय लगता है? यह काम चुनाव आयोग को खुद करना चाहिए। और फौरन कि वीडियो सही है या गलत।

अगर सही है तो तत्काल एक्शन लेना चाहिए और गलत है तो पुलिस में रिपोर्ट करना चाहिए कि वह मालूम करे कि किसने केन्द्रीय मंत्री के साथ यह हरकत की है। खुद मंत्री ललन सिंह को भी चुनाव आयोग से यह कहने के साथ कि वीडियो गलत है साइबर क्राइम में भी रिपोर्ट दर्ज करना चाहिए।

लेकिन इन सब बातों से अलग आम जनता को यह सोचना चाहिए कि 11 साल में उसे सांप्रदायिकता का नशा करवाकर उसके दिमाग की क्या हालत कर दी है कि वह कुछ सोचने समझने लायक ही नहीं रहा।

घुसपैठिए निकालना है! निकालो! उसका विधानसभा चुनाव से क्या ताल्लुक? यह तो केन्द्र सरकार का काम है। प्रधानमंत्री मोदी और केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह का। मगर वह बिहार में रोज भाषण दे रहे हैं। यह नहीं बता रहे कि हैं कितने?

चुनाव आयोग ने कहा था वह बिहार में विशेष गहन पुनरिक्षण ( एसआईआर ) इसलिए कर रही है। हो गया पूरा। क्या नतीजे आए। करीब साढ़े सात करोड़ मतदाताओं में से केवल 390 लोग घुसपैठिए मिले। इस पर टीवी कोई विशेष प्रोग्राम, डिबेट नहीं करता है, अख़बार आर्टिकल छापना, संपादकीय लिखना तो बड़ी बात खबर भी नहीं देते हैं कि इन 390 में से भी बांग्लादेशी, रोहिंग्या कितने मिले?

यह खबरों को छुपाना और झूठा माहौल बनाना ही मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इन 390 में से केवल 76 मुस्लिम हैं। बाकी नेपाल और दूसरी जगह के हिन्दू। लेकिन अगर यह बता देंगे तो हिन्दू मुसलमान की इनकी सारी राजनीति फेल हो जाएगी। इसलिए घुसपैठिए घुसपैठिए चिल्लाते रहो मगर नाम और आंकड़े मत बताओ।

11 साल में घुसपैठ को रोकने के लिए क्या किया यह मत बताओ! मगर जहां चुनाव हो वहां घुसपैठिए घुसपैठिए करते पहुंच जाओ। अभी झारखंड में चुनाव था तो वहां घुसपैठिए थे, उससे पहले जिस दिल्ली का बार्डर किसी विदेश के आसपास तक नहीं है वहां के चुनाव में भी घुसपैठिए थे। अभी बिहार में चल रहे हैं। 11 नवंबर को फाइनल मतदान हो जाएगा तो घुसपैठिए बंगाल चले जाएंगे!  वहां चुनाव हैं।

जनता जब तक हिन्दू-मुसलमान के नशे से उबरेगी नहीं उसे यही सब सुनना होगा। नौकरी रोजगार की बात कहीं नहीं। अभी घोषणा पत्र में लिखना पड़ी क्योंकि महागठबंधन विशेष रूप से सरकारी नौकरी की ही बात कर रहा है। घोषणा पत्र में तो लिखा ही है। भाषणों में भी हर जगह सरकारी नौकरी, अनुबंध वालों को परमानेंट नौकरी की ही बात है।

उधर मोदी जी कह रहे हैं विकास के लिए वोट दो। अच्छा 2020 में जो विकास के लिए वोट दिया था उसका क्या हुआ? मीडिया पूछता नहीं है। 20 साल से बिहार में नीतीश और भाजपा की सरकार है। 11 साल से केन्द्र में मोदी की। मगर अभी भी कह रहे हैं कि विकास करना है।

अभी तक क्यों नहीं किया? हालत तो यहां तक ले आए कि डर लग रहा है कि गरीब वोट नहीं देगा। तो साफ कह रहे हैं कि उन्हें घर से मत निकलने दो।

यह कौन सा राज है?  जंगल राज नहीं? जंगल राज जिसे कहते हैं मोदी रोज हर भाषण में उसमें गरीब को घर में बंद करने की बात कभी किसी ने कही थी? जिसे जंगल राज कहते हैं वह गरीब का सिर उठाकर खड़ा हो जाना था। सामंत, सामाजिक ताकतें कहती थीं घर से मत निकलने दो। मगर सरकारें इन फरमानों को स्वीकार

नहीं करती थी। वह गरीब के साथ खड़ी हो जाती थी। इसीलिए वह जंगल राज था? और आज मंत्री खुद कहता है कि इन्हें घरों में बंद कर दो तो यह सुशासन है!


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