बिहार के अंतःप्रवाह में तेजस्वी की उलटबांसी

Categorized as लेख

अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं, कुल्हाड़ी पर ही अपना पैर मार लेने की इन तमाम महागठबंधनीय-कोशिशों के बावजूद मैं अपने सपनों की दुनिया इस उम्मीद के भरोसे क़ायम रखना चाहता हूं कि राहुल-तेजस्वी की संयुक्त जनसभाओं के बाद महागठबंधन के प्रति मतदाताओं के भाव की अंतर्धारा और दृढ़ होती जाएगी और वह मोशा’-एनडीए की डोली को इस बार बिहार से विदा कर देगी।

मैं जानता हूं कि अगर मैं यह कहूंगा कि बिहार के ज़मीनी कैनवस पर नीतीश कुमार के लिए सायोनारा-संगीत बज रहा है, नरेंद्र भाई मोदी और अमित भाई शाह के लिए पूरी मज़बूती से असहमति में उठे हुए हाथ हैं और तेजस्वी यादव-राहुल गांधी के लिए सोहर गाए जा रहे हैं तो आप मेरे माथे पर चाटुकारिता वग़ैरह की श्यामल इबारत लिखी चिप्पी चिपकाने में भिड़ जाएंगे। मगर बावजूद इस जोख़िम के मैं आप को खुल कर बताना चाहता हूं कि बिहार के विधानसभा चुनाव की आबोहवा इस वक़्त यही है।

फिर भी मुझे मुस्तैद ‘मोशा’ की भारतीय जनता पार्टी और अर्द्धोन्मत्त नीतीश के यूनाइटेड जनता दल के सामने दर्शनशास्त्री राहुल की कांग्रेस और आत्मलीन तेजस्वी के राष्ट्रीय जनता दल की सरकार बिहार में आसानी से बनती दिखाई नहीं दे रही है। आप को मेरी बात अजीब लगेगी, मगर मुझे पूरा शक़ है कि तेजस्वी ख़ुद ही इस बार मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री बनने की अपनी संभावनाओं को कांग्रेस के साथ हुए सीट बंटवारे के अंकगणित के भीतर मौजूद बीजगणित की वज़ह से ख़ुद ही कम कर लिया है। सो, बिहार का सियासी अंतःप्रवाह भी महागठबंधन की जीत शायद सुनिश्चित न कर पाए।

राजद और कांग्रेस के बीच हुए सीट बंटवारे का अंकगणित तो कहता है कि कांग्रेस 61 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। मगर बीजगणित इस के ठीक उलट है। इन 61 में से 9 सीटों पर तो महागठबंधन के सहयोगी दलों के बीच ही दोस्ताना संघर्ष हो रहा है। इन निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस के उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ भाजपा या जदयू के प्रत्याशी तो लड़ ही रहे हैं, राजद और वाम दल भी मैदान में हैं। तो इन 9 विधानसभा क्षेत्रों में तो कांग्रेस समेत महागठबंधन के किसी भी राजनीतिक दल की जीत की आस जिन्हें लगानी हो, लगाएं, मैं तो इतना साहसी हूं नहीं।

तो कांग्रेस के खाते में लड़ने को बचीं 52 सीटें। बिहार में निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन होने के बाद से लोकसभा और विधानसभा के सात चुनाव हुए हैं। इन 52 सीटों में से 23 ऐसी हैं, जिन पर सातों चुनावों में महागठबंधन के राजनीतिक दलों में से कोई भी एक भी बार नहीं जीता है। न राजद, न कांग्रेस, न कोई और। इन 52 में 38 सीटें ऐसी भी हैं, जिन पर महागठबंधन के दलों में से कोई भी या तो कभी नहीं जीता है या सात चुनावों में से सिर्फ़ एक बार जीता है।

52 में से 23 निर्वाचन क्षेत्रों में अगर कांग्रेस क्या, महागठबंधन का कोई भी राजनीतिक दल, पिछले सात चुनाव नहीं जीता है तो इस बार ही ऐसा कौन-सा चमत्कार हो जाएगा कि गले मढ़ दी गई इन सीटों पर कांग्रेस कुछ जलवा दिखा दे? मतलब यह हुआ कि 52 में सिर्फ़ 29 सीटें ऐसी हैं, जहां कांग्रेस की जीत की कोई संभावना है। तो कांग्रेस 61 नहीं, 52 भी नहीं, दरअसल महज़ 29 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इन में से वह कितनी जीत जाएगी?

अब यह नाइंसाफ़ी कांग्रेस के साथ तेजस्वी ने क्यों की कि उसे 29 ही ऐसी सीटें दी हैं, जो जीतने लायक हैं, यह तेजस्वी जानें। और, राहुल के बिहार-दूत क्यों ये सारी सड़ी-गली सीटें लेने को तैयार हो गए, वे जानें। मैं तो इतना जानता हूं कि अगर तेजस्वी के मन में सचमुच राजद-कांग्रेस की सरकार लाने की इच्छा होती तो वे कतई ऐसा नहीं करते कि जीत की सब से ज़्यादा संभावनाओं वाली सभी सीटें तो ख़ुद की झोली में डाल लें और हारने वाली सारी सीटें कांग्रेस के गले में बांध दें।

टिकट बंटवारे में कांग्रेस को जानबूझ कर हाशिए पर डालने की तेजस्वी-गाथा का एक और आयाम आप को बताता हूं। आंकड़ों के विज्ञान में आधार-रेखा प्रतिशत निकालने की एक प्रणाली होती है। बिहार में 2009 से 2024 के बीच महागठबंधन के दल जिन विधानसभा क्षेत्रों में सातों बार जीते हैं, उन का आधार-रेखा प्रतिशत 23.82 है। कांग्रेस को इन में से इस बार जो सीटें मिली हैं, उन का आधार-रेखा प्रतिशत 17.59 है। यानी जो समूचे प्रदेश का औसत प्रतिशत है, उस से 6.23 प्रतिशत कम। राजद ने जो 143 सीटें ली हैं, उन का आधार-रेखा प्रतिशत 27.39 है। यानी प्रदेश के औसत से 3.57 प्रतिशत ज़्यादा। कुछ आया समझ में आप की? राजद ने कांग्रेस की जीत की संभावनाओं को ख़ुद से दस सीढ़ी नीचे तो सीट-चयन में ही धकेल दिया।

अब आइए स्ट्राइक रेट पर। कांग्रेस को जो सीटें दी गई हैं, उन में से ज़्यादातर लोअर स्ट्राइक रेट ज़ोन में हैं। राजद ने जो सीटें ली हैं, वे हायर स्ट्राइक रेट ज़ोन में हैं। कांग्रेस को लड़ने के लिए मिली सीटों का अधिकतम हिस्सा 2.7 प्रतिशत के सर्वोच्च स्ट्राइक रेट ज़ोन में है। यानी इन निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस की जीत मुमक़िन ही नहीं है। राजद की मुट्ठी में गई सीटों का मोस्ट कॉमन पीक स्ट्राइक रेट ज़ोन 14.9 प्रतिशत वाला है। दोनों के स्ट्राइक रेट परिसरों के औसत को भी मैं ने गहराई से समझने की कोशिश की। पाया कि कांग्रेस के लिए यह औसत 14.3 प्रतिशत का है और राजद के लिए 28.6 प्रतिशत का। आंकड़ेबाज़ी की भूलभुलैया में तलहटी तक गोता लगाने के बजाय मोटे तौर पर यह समझ लीजिए कि आरजेडी ने जो सीटें चुनी हैं, वो जीत के लिहाज़ से कांग्रेस से दुगनी संभावनाओं वाली हैं।

अगर सीट बंटवारे का मक़सद महागठबंधन की जीत के अवसरों को बढ़ाना होता तो होना तो यह चाहिए था कि राजद और कांग्रेस को वे निर्वाचन क्षेत्र भी लड़ने के लिए मिलते, जहां उन की जीत की एकदम पक्की संभावनाएं हैं और वे सीटें भी दी जातीं, जहां मेहनत कर के वे जीत सकते थे। यह निष्पक्ष मिश्रण दोनों की जीत के अवसरों को अच्छा-ख़ासा बढ़ा देता। लेकिन किया यह गया कि कांग्रेस को तो पारंपरिक पराजय वाले निर्वाचन क्षेत्रों की पोटली थमा दी गई और पारंपरिक विजय वाले चुनाव क्षेत्रों की गठरी ले कर राजद हवा हो गया। सो, महागठबंधन अगर मेले में भटका होता तो कोई उसे घर पहुंचा भी जाता। अब जब वह घर के भीतर ही भटक गया है तो कैसे ठौर-ठिकाने आएगा?

इसलिए मेरे मन में यह सवाल खदबदा रहा है कि राहुल और उन की कांग्रेस भले ही तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनवाने के लिए तन-मन से लगी हो, क्या तेजस्वी इस बार मुख्यमंत्री बनना चाहते हैं? कहीं उन्हें यह तो नहीं लग रहा कि पांच बरस और विपक्ष में रहना ज़्यादा बेहतर विकल्प है? हो सकता है कि तेजस्वी को लग रहा हो कि अभी तो वे कुल जमा 35 बरस के हैं और जब तक 40 के होंगे, तब तक जदयू बिखर कर विलीन हो चुका होगा और कांग्रेस भी बिहार में हाशिए पर चली जाएगी। ऐसे में राजद और भाजपा सीधे-सीधे आमने-सामने रहा करेंगे। बिहार की तासीर चूंकि भाजपा से परहेज़ में यक़ीन रखने वाली है, सो, 2030 के बाद के दो-तीन दशक तेजस्वी को अपने खाते में अभी से दिखाई दे रहे हों तो हैरत मत कीजिए।

अपने पैर पर कुल्हाड़ी नहीं, कुल्हाड़ी पर ही अपना पैर मार लेने की इन तमाम महागठबंधनीय-कोशिशों के बावजूद मैं अपने सपनों की दुनिया इस उम्मीद के भरोसे क़ायम रखना चाहता हूं कि राहुल-तेजस्वी की संयुक्त जनसभाओं के बाद महागठबंधन के प्रति मतदाताओं के भाव की अंतर्धारा और दृढ़ होती जाएगी और वह ‘मोशा’-एनडीए की डोली को इस बार बिहार से विदा कर देगी।


Previous News Next News

More News

चुनाव से पहले संयोगों की भरमार

April 24, 2026

इसे संयोग ही कहेंगे कि गुरुवार, 23 अप्रैल को पश्चिम बंगाल में पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान होना था और उसके ठीक एक दिन पहले बुधवार, 22 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट में पश्चिम बंगाल से जुड़े एक अहम मामले की सुनवाई हुई, जिसमें सर्वोच्च अदालत ने मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता…

निशांत को संगठन में जगह नहीं मिली

April 24, 2026

नीतीश कुमार ने अपने बेटे को बिहार की नई सरकार में नहीं शामिल होने दिया। जब नीतीश ने सत्ता छोड़ी तब कहा जा रहा था कि उनके बेटे निशांत को उप मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। इसकी पूरी तैयारी भी हो गई थी। लेकिन ऐन मौके पर जनता दल यू ने दो दूसरे नेताओं को उप मुख्यमंत्री…

आरक्षण के भीतर आरक्षण का मुद्दा उठेगा

April 24, 2026

कांग्रेस के नेताओं ने सितंबर 2023 में नारी शक्ति वंदन कानन पास होने के समय जो नहीं कहा था वह अब कहना शुरू कर दिया है। इस बार जब विशेष सत्र बुला कर सरकार ने इस कानून में संशोधन का प्रयास किया तो एकजुट विपक्ष ने इसे विफल कर दिया। इस पर चर्चा के दौरान…

रोहित पवार को भी क्लीन चिट मिल गई

April 24, 2026

महाराष्ट्र में कमाल की राजनीति हो रही है। कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की शिव सेना को पता है कि शरद पवार की एनसीपी खुल कर भाजपा के साथ खेल रही है। फिर भी दोनों चुपचाप तमाशा देख रहे हैं। उलटे कांग्रेस और उद्धव ठाकरे ने मिल कर शरद पवार को फिर से राज्यसभा भेजा है।…

सीबीआई अफसर को सजा, जरूरी फैसला!

April 24, 2026

सीबीआई खुद को देश की प्रमुख जांच एजेंसी बताती है, जो भ्रष्टाचार और दुरुपयोग के खिलाफ लड़ती है। लेकिन जब उसके अपने वरिष्ठ अधिकारी ही ‘मालाफाइड रेड’, मारपीट और साजिश में शामिल हों, तो सवाल उठता है कि तब सीबीआई अपने भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं करती? दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में…

logo