मनोरंजन की पाठशाला: ‘थामा’

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कहानी बेहद दिलचस्प है और पूरी फ़िल्म में दर्शकों को हिलने तक नहीं देती है। इंटरवल के बाद तो ये फ़िल्म हिंदी सिनेमा में मौजूद मनोरंजन की सभी परिभाषाओं की पुनर्परिभाषित करती नज़र आती है। पूरी कहानी बता कर मैं अपने पाठकों को इस फ़िल्म का दर्शक बनने से रोकना नहीं चाहता।

सिने-सोहबत

आज के सिने-सोहबत में एक ऐसी ताज़ातरीन फ़िल्म की चर्चा करेंगे, जिसने हिंदी फ़िल्म उद्योग में मनोरंजन के कॉन्सेप्ट को रीडिफाइन करने की शानदार कोशिश की है। फ़िल्म का नाम है ‘थामा’, जिसकी कहानी लिखी है निरेन भट्ट, सुरेश मैथ्यू और अरूण फलारा ने, निर्देशक हैं आदित्य सरपोतदार और निर्माता हैं दिनेश विजन और अमर कौशिक।

मैडॉक फ़िल्म्स के बैनर तले बनी कई फ़िल्मों ने मिलकर एक हॉरर यूनिवर्स तैयार किया है जिनमें ‘स्त्री’, ‘भेड़िया’ और ‘मुंज्या’ शामिल हैं। इन सभी फ़िल्मों में जो बात कॉमन रही है वो है ‘डर’ और ‘लाफ़्टर’ का ज़बरदस्त संतुलन और साथ में एक ‘सामाजिक संदेश’। मगर इस बार मैडॉक फ़िल्म्स की क्रिएटिव टीम ने ‘थामा’ में ख़ुद के बनाए अब तक के अपने सभी प्रतिमानों से आगे जाकर एक लंबी लक़ीर खींची है। ‘थामा’ में डर और हंसी तो है ही लेकिन इस बार एक प्यारी सी प्रेम कहानी भी है। साथ ही मैसेज के तौर पर ये फ़िल्म एक बहुत बड़ी बात कह जाती है। इस फ़िल्म ने संदेश के तौर पर जिस बात को अंडरलाइन किया गया है वो ये है कि बेतालों ने इस वजह से इंसानों को मार कर खाना बंद कर दिया था क्योंकि दुनिया में सिर्फ़ इंसान ही ऐसा प्राणी है, जिसके ख़ून में सबसे ज़्यादा ज़हर है। इंसानी ख़ून इतना ज़हरीला है कि उसकी वजह से मन में आई अपनी बुरी नीयत, द्वेष और ईर्ष्या जैसे भाव भर से दूसरे इंसानों को जान से मार तक देता है। प्रकृति के बाक़ी सभी पशु सिर्फ़ अपने सर्वाइवल की लड़ाई लड़ते हैं लेकिन इंसान अपने दम्भ, अपने अहंकार की पुष्टि  के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।

‘थामा’ की कहानी शुरु होती है 323 बीसी से जब सिकंदर अपने साथियों के साथ जंगल में जा रहा होता है और उसी समय बेताल का शिकार बन जाता है। ये फिल्म की शुरुआत है और इसके ठीक बाद जैसे ही फिल्म वर्तमान में आती है पूरी कहानी ही बदल जाती है। रश्मिका मंदाना ताड़का बनी है जो एक बेताल है। एक दिन एक भालू की वजह से उसकी मुलाकात आयुष्मान खुराना से होती है जो कि जंगल में खोया एक पत्रकार है। दरअसल, आयुष्मान का किरदार अपने दो दोस्तों के साथ ‘जंगल में मंगल’ करने गया था और वहीँ वो पहले तो जानवरों का शिकार बनते बनते बच गया लेकिन बाद में उसे बचाया हमारी नायिका रश्मिका ने जो कि ख़ुद ‘बेताल’ है। बेचारे पत्रकार महोदय आसमान से गिरे खजूर में अटके।  कहानी बेहद दिलचस्प है और पूरी फ़िल्म में दर्शकों को हिलने तक नहीं देती है। इंटरवल के बाद तो ये फ़िल्म हिंदी सिनेमा में मौजूद मनोरंजन की सभी परिभाषाओं की पुनर्परिभाषित करती नज़र आती है। पूरी कहानी बता कर मैं अपने पाठकों को इस फ़िल्म का दर्शक बनने से रोकना नहीं चाहता। वैम्पायर की दुनिया और इंसानी संवेदनशीलता को जिस कन्विक्शन के साथ परदे पर उतारा गया है वो क़ाबिल ए ग़ौर ही नहीं है, बल्कि उसकी तो तारीफ़ होनी चाहिए।

कलाकारों  की बात करें तो सभी कलाकारों ने कमाल का काम किया है। आयुष्मान खुराना, रश्मिका मंदाना, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, परेश रावल और फैसल मालिक ने बखूबी दिखा दिया है कि उन्हें अपने अपने किरदार में उतरना आता है। नवाज़ुद्दीन के जैसा बेताल शायद ही देखने को मिले। उनकी डायलॉग डिलीवरी और फेशियल एक्सप्रेशन हंसाते भी हैं और खौफ भी पैदा करते हैं। रश्मिका मंदाना ने ताड़का का रोल भी यादगार तरीके से निभाया है, वह भी इस फ़िल्म का अहम हिस्सा बन गई हैं। आयुष्मान खुराना ने भी इस यूनिवर्स में मजबूती के साथ कदम जमाए हैं और फिर ‘भेड़िया’ के तौर पर वरुण धवन और ‘स्त्री’ के अभिषेक बनर्जी भी इसमें तड़का लगाने पहुच जाते हैं। कुल मिलाकर एक्टिंग के मोर्चे पर कोई निराश नहीं करता है। ‘पंचायत’ वेब सीरीज़ से घर घर के चहेते प्रह्लाद चा (फ़ैसल मलिक) ने भी ‘थामा’ में एक शानदार पारी खेली।

फ़िल्म के सभी पक्षों में मज़बूती और क्राफ़्ट का कौशल कमाल का है, फिर चाहे सिनेमेटोग्राफ़ी हो या फिर सचिन-जिगर का म्यूज़िक।

मैडॉक फिल्म्स का हॉरर यूनिवर्स मज़बूत होता जा रहा है और इसमें इसके लेखकों, डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स सबकी अहम भूमिका है। आदित्य सरपोतदार इससे पहले ‘मुंज्या’ बना चुके हैं। इस बार ‘थामा’ का हाथ थामा तो ऐसा छक्का लगा जैसे कि बॉल बाउंड्री के बाहर चली गई हो। निर्माताओं में से एक अमर कौशिक ख़ुद ही ‘स्त्री’ और ‘भेड़िया’ के निर्देशक रहे हैं। ज़ाहिर है उनके मार्गदर्शन में इस फ़िल्म में मैजिक मिस हो जाता तो उसे सिर्फ़ एक हादसा ही कह सकते थे। बेशक फिल्म में वह नवाजुद्दीन को थोड़ा मौका और दे सकते थे लेकिन ‘थामा’ का यह इंट्रोडक्शन है, इसलिए समझा जा सकता है कि ‘थामा’ के सीक्वल में वो अपना हिस्सा क्लेम कर ही लेंगे। मुझे ये भी महसूस हुआ कि बेतालों की जंग और ज्यादा होती तो वाकई क्या बात हो जाती। भेड़िया और बेताल का फाइट सीन फैन्स को खूब एंटरटेन करेगा।

‘थामा’ इंटरवल के बाद काफ़ी तेज़ चलती है। रहस्य और रोमांच की दुनिया और दिलचस्प हो जाती है। ‘थामा’ का क्लाइमैक्स होश उड़ा सकता है।

कहा जा सकता है कि ‘थामा’ के आ जाने से उन दर्शकों और समीक्षकों को बिलकुल सटीक जवाब मिल पा रहा है, जिन्हें ये शिकायत रही है कि हिंदी फिल्मोद्योग में दक्षिण की फिल्मों की तरह या फिर हॉलीवुड की बड़ी फिल्मों की तरह अपनी ऐसी ओरिजिनल फ़िल्में क्यों नहीं बनती जिनकी कहानी में नयापन हो, जो टेक्निकली सुपीरियर हों, जो इस कन्विक्शन से बन सकें कि मनोरंजन की परिभाषा को एक नई दिशा मिल सके, नूतन आयाम मिल सके।

‘आर्ट’ और ‘कॉमर्स’ के बीच संतुलन साध पाना मुश्किल है। आज के दौर में अपने अपने मोबाइल फ़ोन से चिपक कर रील से ही गुज़ारा कर लेने वाले, लगातार घटते अटेंशन स्पैन वाले दर्शकों को सिनेमाघरों तक ला पाना बच्चों का खेल नहीं है। ये देखना काफ़ी सुखद है कि ‘थामा’ पूरे परिवार के साथ जाने वाले दर्शकों को भी ज़बरदस्त तरीके से एंटरटेन करने के साथ साथ बॉक्स ऑफिस पर भी धमाल मचा रही है। फ़िल्म उद्योग में धूम धड़ाके वाली दिवाली के बाद की खामोश सुबहें मुस्कुरा रही हैं।  नज़दीकी सिनेमाघर में है। देख लीजिएगा।  (पंकज दुबे मशहूर बाइलिंग्वल उपन्यासकार और चर्चित यूट्यूब चैट शो “स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)


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