प्रकृति गुस्सा दिखा रही है

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हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और फिर जम्मू-कश्मीर, पंजाब व हरियाणा में लगातार हो रही भारी बारिश के कहर ने भयावह दृश्य दिखाए है। पहाड़ का सरकना, भूस्खलन का फैलना, सैलाब का आचानक उफनना और डूबते-बहते घरों का दिखना भी आमजन देख रहा हैं। जानमाल की हानि के अलावा जो जनजीवन का नुकसान हो रहा है उससे निपटने में बरसों लग सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इसका कारण विकास की अंधाधुंध नीतियां हैं।

देश भर में मानसून का कहर आमजन पर बरस रहा है। पहाड़ों पर बादल फट रहे हैं। तो जमीन पर नदियां उफान पर हैं। शानदार बारिश भी होती है और भयावह बाढ़ भी लाती है। उफनती नदियां अपने साथ घर के घर बहाए लिए जा रही है। बाढ़ के हालात से इन शहरों की हालत देख कर दिल दहला उठता है। क्या प्रकृति अपना नैसर्गिक संतुलन बना रही है? या हमें अपनी संप्रभुता के दर्शन करा रही है?

वर्षा का तांडव आए दिन अपन अपने टीवी सेट पर देख रहे हैं। घर के अपने ड्राइंग रूम में हम असमंजस में बैठे हैं कि शानदार बरसात का आनंद लें या दिखाए जा रहे बहते, डूबते घरों को देख कर डरे, सहमे व दुखी हों? अपन सभी जानते हैं कि मानसून की वर्षा से अपनी अर्थव्यवस्था, संस्कृति और पर्यावरण पर गहन प्रभाव पड़ता है। जहां खेती-किसानी के उत्पादन को बढ़ावा मिलता है और जल संसाधन की आपूर्ति होती है, वहीं बाढ़ और खराब उपज का खतरा भी मंडराता है।

मज़बूत मानसून ग्रामीण आय और सकल घरेलू उत्पाद को भी बढ़ावा देता है। जबकि कमज़ोर या अनियमित मानसून वर्षा आधारित खेती पर निर्भर जनसंख्या के लिए जल संकट, खाद्यान्न संकट और आर्थिक संकट भी लाता है। मानसून जीवनशैली को भी आकार-प्रकार देता है। हर तरह के व्यापार से होने वाले विकास को प्रभावित भी करता है। जलवायु और पर्यावरण के संतुलन को भी प्रभावित करता है।

पहले हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और फिर जम्मू-कश्मीर, पंजाब व हरियाणा में लगातार हो रही भारी बारिश के कहर ने भयावह दृश्य दिखाए है। पहाड़ का सरकना, भूस्खलन का फैलना, सैलाब का आचानक उफनना और डूबते-बहते घरों का दिखना भी आमजन देख रहा हैं। जानमाल की हानि के अलावा जो जनजीवन का नुकसान हो रहा है उससे निपटने में बरसों लग सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार इसका कारण ‘भी’ विकास की अंधाधुंध तेज रफ्तार की नीतियां ही रही हैं।

जल को सहेजने के बजाए जलाशयों को बांधने की नीतियों से जलप्रवाह का रूकना भी एक कारण है। फिर पहाड़ों पर कई लेन के राजमार्ग बनाना, लगातार पेड़ काटने से भी जलनिकासी के संसाधनों पर रोक लगती है। जिसके कारण बारिश का जल पहाड़ों के भीतर बहता है और फिर सब कुछ तोड़-ताड़ के अचानक सैलाब लाता है। इसी डर से बांध से जल छोड़ा जाता है तो नदियां खतरे के निशान से ऊपर बहने लगती हैं। इस सब का कारण सत्ता द्वारा विकास की निरंकुश रफ्तार है। और एक बड़े मध्यवर्गीय जनता की देश को विदेश बनाने की लालसा भी रही है।

प्रकृति हर कुछ वर्षों में जनजीवन अस्तव्यस्त करती है और सत्ता व जनता को आगाह करती है। सत्ता और स्वार्थी जनता इसकी अनदेखी करते हैं। और एक विशाल जनसंख्या भयावह दुष्प्रभावों से प्रताड़ित होती है। इसलिए बाढ़ भी अकेले नहीं आती है। बाढ़ से पहले बुरे काम और बुरे विचार की बाढ़ भी आती है। अपन अपनी प्रकृति और अपने पर्यावरण में रह कर ही न्यायपूर्ण, स्वतंत्र व सामाजिक व्यवस्था गढ़ सकते हैं। अच्छे काम व अच्छे विचार से ही सुदृढ़ विकास का स्थिर हाईवे बनाया जा सकता है।

सभी जानते हैं महात्मा गांधी ने भी प्रकृति के साथ जीवन जीने का आग्रह दोहराया था। सिर्फ स्वार्थ के, लालसा के ही जीवन से सत्ता और जनता को आगाह किया था। स्वतंत्र भारत में सेवा, और समर्पण के भाव को जाग्रत करने की आशा जगाई थी। आज इस पर विवाद करने व नफरत फैलाने वाले कई भक्त मिल जाएंगे लेकिन गांधीजी के विचार उस हर पहलू पर रहे हैं जिससे समाज का अर्थपूर्ण, रचनात्मक विकास हो सके।

यह सत्ता के खेल का भी नतीजा है। कांग्रेस अपने आंदोलन की विरासत को, और गांधी को भूल गयी है। और भाजपा खुद की सत्ता-विकास का इतिहास रचने के चक्कर में गांधी को भुला देना चाहती है। चुनावी वादों में ही गांधी भी याद आते हैं। गीता प्रवचन में संत विनोबा ने जीवन में ‘भी’ के सिद्धांत की पारदर्शिता दर्शाई थी। जनता को भी गांधी-विनोबा विचार को सत्ता के विरुद्ध लाठी बनाना होगा।


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