नागरिकता को निरंतर विवाद में रखना ठीक नहीं

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

भारत में ही नहीं, दुनिया में भी नागरिकता का मामला पिछले कुछ समय से विवादित होता जा रहा है। दुनिया के वैश्विक गांव बनने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवासन बढ़ा साथ साथ देशों के अंदर गृहयुद्ध और युद्धों व आर्थिक हालात की वजह से भी प्रवासन में बढ़ोतरी हुई। तभी अमेरिका से लेकर यूरोप तक के देश अवैध प्रवासियों के संकट से जूझ रहे हैं और इससे निपटने के उपाय कर रहे हैं।

इसके बावजूद किसी भी देश ने अपने नागरिकों की नागरिकता को निरंतर विवाद का विषय नहीं बनाया। दुर्भाग्य से भारत में लगातार कई चीजों को विवाद का विषय बनाया जा रहा है। भारत दुनिया का पहला बड़ा मुल्क था, जिसने अपनी मुद्रा को विवाद का विषय बनाया और उस समय की प्रचलित 90 फीसदी मुद्रा को विवादित बता कर उसे मार्केट से हटा लिया था। उस फैसले के आठ साल बाद तक देश उसके असर को महसूस कर रहा है।

इसी तरह भारत में नागरिकता को स्थायी रूप से विवाद का विषय बना दिया गया है। जैसे नोटबंदी के बाद भारत की मुद्रा हर देश में संशय का विषय बन गई उसी तरह नागरिकता का मुद्दा पूरी दुनिया के लिए संशय का मुद्दा बना है। जिस दिन भारत के विदेश मंत्रालय की ओर से कहा गया कि पासपोर्ट नागरिकता प्रमाणित करने वाला दस्तावेज नहीं है। वह निर्णायक दिन था।

इससे पहले दूसरे किसी भी दस्तावेज के मुकाबले पासपोर्ट को नागरिकता का ज्यादा वैध दस्तावेज माना जाता था। उस पर साफ साफ पासपोर्टधारक की नागरिकता भारतीय लिखी होती है। पासपोर्ट बनाने से पहले जितनी तरह की छानबीन होती है वह दूसरे किसी दस्तावेज के लिए नहीं होती है। जन्मस्थान से लेकर रहने के स्थान तक पुलिस छानबीन करती है और उसके बाद पासपोर्ट जारी करती है। इसलिए पासपोर्ट को नागरिकता प्रमाणित करने वाला दस्तावेज नहीं मानने के विदेश मंत्रालय के बयान पर सबको हैरानी हुई।

विदेश मंत्रालय के इस बयान की टाइमिंग भी बहुत अहम है। ध्यान रहे इस समय देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का काम चल रहा है और उसमें नागरिकता का मुद्दा बार बार उठ रहा है। इस क्रम में यह कई बार कहा गया कि आधार या पैन कार्ड या वोटर आईडी किसी व्यक्ति की नागरिकता तय करने वाले दस्तावेज नहीं हैं। सोचें, चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है। उसे संदिग्ध नागरिक का मामला केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजना होता है ताकि उसकी नागरिकता तय हो। लेकिन मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा नागरिकता की रही। पश्चिम बंगाल में तो चुनाव आयोग ने तार्किक विसंगति की एक नई श्रेणी बना कर 27 लाख लोगों के नाम काट दिए। खैर वह अलग मामला है।

इस पूरे मामले में टाइमिंग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केंद्र सरकार घुसपैठ रोकने के नाम पर नए नए अभियान की रूप रेखा तैयार कर रही है। यानी एक तरफ एसआईआर तो दूसरी ओर घुसपैठ रोकने के नाम पर केंद्र का अभियान और इसके बीच विदेश मंत्रालय का यह कहना ही पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाण नहीं है। इसी बीच गुवाहाटी हाई कोर्ट का एक मामला सामने आया, जिसमें अमीनुल हक नाम के एक व्यक्ति ने अपने को भारत का नागरिक साबित करने के लिए 16 दस्तावेज पेश किए फिर भी अदालत ने उसे भारत का नागरिक नहीं माना।

अमीनुल हक ने 1951 के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी में अपने माता, पिता का नाम होने की सत्यापित प्रति भी अदालत को दी। साथ ही किसी भारतीय नागरिक को मिलने वाला लगभग हर पहचान पत्र भी प्रस्तुत किया। लेकिन उसे भारत का नागरिक नहीं माना गया। अदालत की ओर से कहा गया कि, सिर्फ दस्तावेजों का ढेर लगाना या पिता द्वारा मौखिक गवाही देना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि नागरिकता कानून के तहत व्यक्ति को अपने पूर्वजों, जैसे पिता या दादा के साथ अपने वंश के कानूनी संबंधों को पुख्ता सबूतों से साबित करना होता है, जो अमीनुल नहीं कर पाए।

अब सवाल है कि यह कैसे होगा? अगर सरकारी दस्तावेजों के जरिए नहीं होगा तो कैसे पूर्वजों के साथ संबंध स्थापित होगा? क्या पूर्वजों के डीएनए खोज कर उनके साथ मिलान किया जाएगा?

यह बहुत हैरान करने वाला मामला है कि कोई भी व्यक्ति सरकारी दस्तावेजों के अलावा कैसे अपने पूर्वजों के साथ अपने संबंध स्थापित करेगा? यह ध्यान रखने की बात है कि विदेशी अधिनियम, 1948 के तहत नागरिकता साबित करने का पूरा भार उसी व्यक्ति के ऊपर होता है, जिस पर विदेशी होने का संदेह होता है या किसी प्राधिकरण की ओर से जिसकी नागरिकता पर संदेह जताया जाता है। सोचें, अगर किसी सरकारी प्राधिकरण की ओर से किसी व्यक्ति की नागरिकता पर संदेह जता दिया जाए और उसे सबूत जुटाने को कहा जाए तो वह कहां से, क्या सबूत जुटाएगा, जिससे अपनी नागरिकता प्रमाणित करेगा? यह सबसे चिंताजनक बात है।

अभी तो बड़ी संख्या में लोगों को यह लग रहा है कि पश्चिम बंगाल में या असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान की जा रही है, जिनके मुस्लिम होने की ज्यादा संभावना है। लेकिन अगर किसी हिंदू की नागरिकता पर संदेह पैदा हो तो वह भी अपने को कैसे नागरिक साबित करेगा? अगर प्राधिकरण की ओर से उसके प्रति लचीलापन दिखाया जाए तो अलग बात है लेकिन अगर प्राधिकरण ने लचीलापन नहीं दिखाया तो क्या होगा? यह तो देश के नागरिकों को पूरी तरह से नौकरशाही या देश के प्राधिकरण की मर्जी के अधीन कर देने जैसा है! इससे अधिकारियों को नागरिकों से उनकी नागरिकता प्रमाणित करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज मांगने का अधिकार मिल जाएगा।

अतिरिक्त दस्तावेज से भी अगर वह संतुष्ट नहीं होता है तो क्या होगा? ध्यान रहे संविधान प्रदत्त जितने भी अधिकार हैं उनमें से लगभग सभी अधिकार नागरिकों को मिलते हैं। अगर किसी की नागरिकता संदिग्ध हो जाए, ऑथोरिटी की तरफ से उस पर प्रश्नचिन्ह लग जाए तो उसे नागरिक अधिकारों से वंचित किया जा सकेगा। किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक देश में इसे आदर्श स्थिति नहीं मान सकते हैं। दुनिया में भी इससे भारतीय नागरिकों के प्रति संशय बढ़ेगा। विदेश में रहने और काम करने वाले भारतीयों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है, जो अब भी भारतीय नागरिक हैं। उन लोगों के साथ दुनिया के देश कैसा व्यवहार करेंगे, यह इस पर भी निर्भर करेगा कि भारत स्वंय अपने नागरिकों के साथ कैसा बरताव करता है।


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