मानसून सत्र संख्या पूरी करने की चुनौती

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

सरकार ने इस बार संसद का सत्र छोटा रखा है। आमतौर पर मानसून सत्र एक महीने का होता है, जो जुलाई के तीसरे हफ्ते से शुरू होकर अगस्त के तीसरे हफ्ते तक चलता है। इस बार संसद का मानसून सत्र स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त से दो दिन पहले समाप्त हो रहा है। तीन हफ्ते का सत्र है, जिसमें 19 बैठकें होंगी। अगर अभी चल रही चर्चाओं को मानें तो सरकार 130वां और 131वां संविधान संशोधन विधेयक इस सत्र में पास कराने की कोशिश कर सकती है। 130वां संशोधन विधेयक प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को किसी गंभीर मामले में गिरफ्तारी और 30 दिन तक लगातार जेल में रखने पर उनको पद से हटाने का है। 131वां संविधान संशोधन विधेयक नारी शक्ति वंदन कानून में बदलाव का है।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने संसद की नई इमारत में पहला कानून नारी शक्ति वंदन का पास किया था। लेकिन इसे तत्काल लागू करने की बजाय इसमें प्रावधान किया गया कि जनगणना और परिसीमन के बाद सीटों की संख्या बढ़ेगी तब महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षित की जाएंगी। यह कानून लागू नहीं हो सका है और सरकार इसे बदलना चाह रही है। इसके साथ ही परिसीमन का बिल भी पेश किया जाएगा, जिसमें हर राज्य में सीटों की संख्या 50 फीसदी बढ़ा कर लोकसभा के सदस्यों की कुल संख्या साढ़े आठ सौ ले जाने का प्रस्ताव है। संविधान संशोधन के इन दोनों कानूनों के लिए सरकार को दोनों सदनों में अलग अलग दो तिहाई बहुमत की जरुरत है।

सरकार ने अप्रैल में तीन दिन का विशेष सत्र बुला कर 131वां संशोधन विधेयक पास कराने का प्रयास किया था। उस समय सरकार की ओर से विपक्षी सांसदों से अंतरात्मा की आवाज पर वोट डालने की अपील की गई थी। लेकिन ऐसा लग रहा है कि इस बार सरकार इसे संयोगों के सहारे नहीं छोड़ने जा रही है। साथ ही सरकार विपक्षी सांसदों की अंतरात्मा को झकझोरने वाले कुछ दूसरे उपाय भी करने जा रही है। इसके बावजूद सवाल है कि क्या सरकार संख्या पूरी कर लेगी? इसी से जुड़ा सवाल यह भी है कि अगर संख्या नहीं पूरी होती है तब भी क्या सरकार पिछली बार की तरह विधेयक पेश करेगी और संयोगों के सहारे पास कराने की कोशिश करेगी। इस बार ऐसा नहीं होने वाला है। सरकार संख्या पूरी करने की कोशिश कर रही है। हालांकि यह बहुत चुनौती वाला काम है।

असल में 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने ही सरकार को प्रेरित किया है कि वह यथास्थिति तोड़े क्योंकि उसके बगैर अगला चुनाव जीतना मुश्किल है और 2024 के नतीजे ने ही भाजपा को ऐसी स्थिति में ला दिया कि वह यथास्थिति तोड़ने के काम में सफल नहीं हो पा रही है। अगर 2024 में भाजपा बहुमत से 32 सीट पीछे नहीं रह गई होती तो 2029 के चुनाव से पहले परिसीमन और नारी शक्ति वंदन कानून की जरुरत ही नहीं पड़ती। इसे तो भाजपा ने 2034 के चुनाव के लिए रखा था। अब सरकार को लग रहा है कि 2029 जीतना होगा तभी 2034 में कोई दांव काम आएगा। सो, परिसीमन और नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन हर हाल में करना है।

इसके लिए सरकार को लोकसभा में 360 और राज्यसभा में 160 सदस्यों के समर्थन की जरुरत होगी। लोकसभा में अभी सरकार के पास 324 सांसद हैं, जबकि राज्यसभा में संख्या 150 है और पश्चिम बंगाल की तीन सीटों पर उपचुनाव के बाद यह संख्या 153 हो जाएगी। राज्यसभा में सरकार को दो तिहाई बहुमत जुटाने में कोई समस्या नहीं है। उसे सात सांसदों का इंतजाम करना है या एक दर्जन सांसदों को गैरहाजिर करा देना है। दोनों काम हो सकते हैं। डीएमके, वाईएसआर कांग्रेस, बीजद और पार्टी से असंबद्ध मनोनीत सदस्यों की कुल संख्या 19 बनती है। सो, सरकार को वहां समस्या नहीं है। सरकार को असली समस्या लोकसभा में है, जहां तृणमूल कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की पार्टी के विभाजन के बावजूद एनडीए के सांसदों की संख्या 324 पहुंची है।

पिछली बार यानी 16 से 18 अप्रैल 2026 को हुए संसद के विशेष सत्र में कुल 528 लोकसभा सांसद वोटिंग में शामिल हुए थे। इनमें से 298 ने संविधान के 131वें संशोधन विधेयक के पक्ष में और 230 ने विरोध में वोट किया था। 528 सदस्यों की मौजूदगी के हिसाब से दो तिहाई वोट का आंकड़ा 352 वोट का बन रहा था। उस समय एनडीए के सदस्यों की संख्या 293 थी, जबकि उसे 298 वोट मिले। दूसरी ओर विपक्ष की संख्या 233 थी, लेकिन उसे 230 वोट मिले। उस समय बंगाल चुनाव की वजह से तृणमूल कांग्रेस के सात सांसद गैरहाजिर रहे थे। तब भी 230 वोट मिले। इसका अर्थ है कि दोनों गठबंधनों से दूरी रखने वाले 17 सांसदों में से कुछ ने सरकार के पक्ष में और कुछ ने विरोध में वोट किया।

अगर सांसद गैरहाजिर नहीं होते हैं तो दो तिहाई वोट का आंकड़ा 360 का होगा। इसका अर्थ है कि सरकार को 324 से ऊपर 36 वोट का इंतजाम करना होगा। अगर इतने वोट का इंतजाम नहीं होता है तो कम से कम 50 सांसदों को गैरहाजिर कराना होगा। यह ज्यादा मुश्किल काम दिख रहा है। अगर किसी तरह से सरकार डीएमके के 22 सांसदों का समर्थन हासिल कर लेती है तो उसकी संख्या 346 हो जाएगी। तब उसे 14 अतिरिक्त सांसदों की जरुरत होगी। ऐसे ही अगर शरद पवार की पार्टी के आठ सांसद सरकार के साथ आ जाते हैं तो आंकड़ा 354 हो जाएगा और तब सिर्फ छह अतिरिक्त सांसदों की जरुरत होगी। सिर्फ डीएमके साथ आए तो कम से कम 30 सांसदों को गैरहाजिर कराना होगा और अगर शरद पवार की पार्टी भी साथ आ जाए तो सिर्फ 12 सांसदों के गैरहाजिर होने से सरकार का काम चल जाएगा। दूसरी ओर विपक्ष को लग रहा है कि चाहे कुछ भी हो जाए परिसीमन के मसले पर डीएमके भाजपा के साथ जाने का जोखिम नहीं ले सकता है। इस बीच सत्तापक्ष की ओर से अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी में सेंध लगाने की खबरें प्रचारित कराई जा रही हैं तो राजद और झारखंड मुक्ति मोर्चा के सांसदों के टूटने की भी खबरें चल रही हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि कांग्रेस के कुछ सांसद भी गैर हाजिर हो सकते हैं।

सो, संसद का मानसून सत्र सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच जोर आजमाइश वाला बन गया है। विपक्ष राम मंदिर में चढ़ावा चोरी से लेकर नीट यूजी की परीक्षा के पेपर लीक और 12वीं बोर्ड परीक्षा की ऑनस्क्रीन मार्किग में गड़बड़ी के साथ साथ महंगाई का मुद्दा भी उठाएगा। लेकिन ‘इंडिया’ ब्लॉक की असली परीक्षा इसमें है कि वह डीएमके और शरद पवार की एनसीपी को अपने साथ जोड़े रख पाती है या नहीं। दूसरी परीक्षा अखिलेश यादव की है। अगर उनके सांसद इधर उधर नहीं होते हैं तो सरकार के लिए चुनौती ज्यादा मुश्किल हो जाएगी। विपक्षी गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के प्रबंधन की परीक्षा भी इस सत्र में होगी।


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