बिहार की नई सरकार की चुनौतियां

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

बिहार में भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार बन गई है। सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री बने हैं। पहली नजर में यह नीतीश कुमार की बनाई राजनीतिक व्यवस्था की निरंतरता प्रतीत होता है। कहा भी यही जा रहा है। खुद नीतीश कुमार ने भी कहा कि वे सरकार का मार्गदर्शन करते रहेंगे और नए मुख्यमंत्री ने भी कहा कि जैसे अब तक एनडीए की सरकार चलती रही है उसी तरह से आगे भी चलेगी। बार बार दोहराया गया कि नीतीश कुमार के सात निश्चय को लागू किया जाएगा। यह भी कहा जा रहा है कि पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का सम्मान रखने के लिए राज्य में शराबबंदी लागू रहेगी। नीतियों से लेकर प्रशासनिक कामकाज के स्वरूप में निरंतरता के संकेत दिए जा रहे हैं। वैसे भी पिछले करीब ढाई साल उप मुख्यमंत्री रहते हुए सम्राट चौधरी डी फैक्टो सीएम के तौर पर ही काम कर रहे थे। इसलिए अगर वे कामकाज की नीतीश शैली को अपनाते हैं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बना कर राजनीतिक निरंतरता कायम रखी गई है और सामाजिक समीकरण को भी जस का तस रखा गया है। उनके पिता शकुनी चौधरी और नीतीश कुमार ने 1994 में लव कुश समीकरण बनाया था। उस समीकरण को बनाए रखा गया है। असल में बिहार में एनडीए की राजनीति इसी बुनियाद पर टिकी है। गैर यादव पिछड़ी जातियों में सबसे मजबूत और संख्या के लिहाज से सबसे बड़ा जातीय समूह कोईरी, कुर्मी और धानुक का है, जिसे लोकप्रिय शब्दावली में लव कुश समीकरण कहते हैं। इसका 10 फीसदी वोट आधार है। इसमें दो जातियां कोईरी और कुर्मी राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक रूप से सशक्त हो चुकी हैं। इसलिए गैर यादव पिछड़ी जाति का सामाजिक समीकरण बनाए रखने के लिए जरूरी था कि उसी समुदाय से किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाया जाए। इससे नीतीश कुमार की सोशल इंजीनियरिंग की निरंतरता भी कायम रहती है। सम्राट चौधरी बिल्कुल नीतीश की तरह अपने गैर यादव पिछड़े वोट के साथ अति पिछड़ी जातियों, दलित और सवर्ण को जोड़ कर आगे चलने की राजनीति करेंगे। इससे वे राजनीतिक चुनौतियों का सामना सफलतापूर्वक कर सकते हैं।

परंतु क्या राजकाज के नीतीश कुमार मॉडल से बिहार का काम चल पाएगा? इसका जवाब आसान नहीं है। राजकाज का नीतीश मॉडल बिहार को अब कहीं नहीं ले जा रहा है। बिहार अपनी जगह पर ठहर कर कदमताल कर रहा है। 21 साल पहले नीतीश कुमार को जैसा बिहार मिला था उसको उन्होंने निश्चित रूप से बेहतर किया। लेकिन उस समय हर कसौटी पर बिहार की इतनी बुरी दशा थी कि नीतीश ने जो किया वह अद्भुत हो गया। उन्होंने कानून व्यवस्था ठीक की, उन्होंने संगठित अपराध को खत्म किया, उन्होंने बिजली, सड़क और पानी की बुनियादी सुविधाओं का विकास किया। उनके कार्यकाल में जातीय तनाव कम हुआ और सांप्रदायिक सद्भाव भी बेहतर हुआ। महिलाओं को सशक्त बनाने में उनकी जो भूमिका रही वह भी बहुत अच्छी है। लेकिन उसके आगे क्या? क्या नीतीश मॉडल के विकास से बिहार में पलायन या प्रवासन रूका? क्या औद्योगिक विकास हुआ? सरकारी नौकरियों के अलावा क्या नौकरी और रोजगार की व्यवस्था हुई? शिक्षा की व्यवस्था में क्या सुधार हुआ? चाहे प्रति व्यक्ति आय हो, स्कूलों में शिक्षकों का अनुपात हो, अस्पतालों में डॉक्टरों का अनुपात हो हर पैमाने पर बिहार सबसे पीछे है। मानव विकास सूचकांक और टिकाऊ विकास के लक्ष्य के कोई तीन दर्जन पैमाने हैं और लगभग हर पैमाने पर बिहार सबसे नीचे है।

सो, नई सरकार यानी सम्राट चौथरी की सरकार की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह बिहार में बुनियादी ढांचे के विकास की अवधारणा से आगे बढ़े। यह सही है कि बिहार में विकास की संभावना की कई सीमाएं हैं। जैसे बिहार में खनिज नहीं है, बिहार लैंड लॉक्ड स्टेट है, आबादी के अनुपात में प्रति व्यक्ति लैंड होल्डिंग सबसे कम है, शिक्षा का स्तर निम्न है आदि आदि। इन सीमाओं के बीच कैसे औद्योगिक विकास हो यह नई सरकार की चुनौती है। कृषि आधारित उद्योग बिहार में सफल हो सकता है और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में बिहार तरक्की कर सकता है। इसके लिए नई नीतियों और राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरुरत होगी। बिहार में आईटी हब बने, आईटी व सॉफ्टवेयर पार्क बने, एआई के इनोवेशन का सेंटर बने यह बिल्कुल संभव है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस सेक्टर के लिए जो कच्चा माल चाहिए वह बिहार के पास है। ध्यान रहे भारत के सिलिकॉन वैली से लेकर अमेरिका के सिलिकॉन वैली तक बिहार के नौजवान पेशेवर काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार की मदद से राज्य सरकार चाहे तो न्यू एज इकोनॉमी का विकास हो सकता है।

बिहार की नई सरकार की एक बड़ी चुनौती बिहार में राजस्व की व्यवस्था करने की है। बिहार 14 करोड़ लोगों की आबादी वाला राज्य है। लेकिन पहली बार उसका बजट तीन लाख करोड़ रुपए से ऊपर गया है। बिहार की अर्थव्यवस्था 11 लाख करोड़ रुपए के करीब है। सोचें, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि राज्य इस होड़ में हैं कि कौन पहले एक ट्रिलियन डॉलर यानी 94 लाख करोड़ रुपए की अर्थव्यवस्था बनेगा और बिहार 11 लाख करोड़ की अर्थव्यवस्था वाला राज्य है। बिहार की अर्थव्यवस्था का आकार कैसे बढ़े, आर्थिक गतिविधियों में कैसे तेजी आए, बिहार का राजस्व कैसे बढ़े यह बहुत बड़ी चुनौती है। अगर अर्थव्यवस्था का आकार नहीं बढ़ेगा तो जमीन की रजिस्ट्री के शुल्क बढ़ा कर या पेट्रोल, डीजल पर शुल्क बढ़ा कर या सड़कों पर चालान काट कर राजस्व जुटाने से काम नहीं चलेगा। बिहार को एक बड़ी छलांग की जरुरत है। पिछले साल चुनाव के समय कहा जाता रहा कि नीतीश कुमार ने लॉन्च पैड तैयार कर दिया है। तो उस लॉन्च पैड से बिहार की उड़ान को टेकऑफ कराने की बड़ी चुनौती सम्राट सरकार के सामने है।

बिहार में चूंकि आर्थिक गतिविधियां सीमित हैं इसलिए पलायन बहुत है। भले लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के शासन की तरह नीतीश के शासन में लोग डर कर पलायन नहीं कर रहे थे लेकिन रोजगार की तलाश में पलायन जारी था। रोजगार भी ऐसा नहीं कि बहुत बड़ा अवसर मिलना था। 10 या 12 हजार रुपए की हाड़ तोड़ मेहनत वाली नौकरी के लिए बिहार से पलायन होता है। इसे रोकना बहुत बड़ी चुनौती है। इसी तरह बिहार में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति बहुत खराब है। कहा जाता है कि लालू प्रसाद ने शिक्षा व्यवस्था का हार्डवेयर खराब किया और नीतीश कुमार ने सॉफ्टवेयर खराब कर दिया। पंचायतों के जरिए नीतीश सरकार ने शिक्षकों की जो भर्ती की उससे बिहार में शिक्षा की पूरी व्यवस्था चौपट हो गई। यही हाल स्वास्थ्य व्यवस्था का भी है। इन दोनों कारणों से भी बिहार से बहुत पलायन होता है और बिहार की पूंजी भी बाहर जाती है। बाहर नौकरी या कामकाज करने वाले लोग जितना पैसा बिहार भेजते हैं उसी अनुपात में बिहार से शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च के लिए पैसा बाहर भी जाता है। ऐसे ही निवेश के लिए भी बिहार के कारोबारी बिहार के बाहर अवसर तलाशते हैं। इस पूंजी पलायन को रोकना भी नई सरकार के सामने बड़ी चुनौती है।

कह सकते हैं कि सम्राट चौधरी को फूलों की सेज नहीं मिली है, बल्कि कांटों का ताज मिला है। राजनीतिक समीकरण वे बहुत आसानी से साध लेंगे। लेकिन असली चुनौती प्रशासनिक कामकाज और आर्थिक विकास की है। उन्हें बिहार में कारखाने लगवाने हैं ताकि लोगों को रोजगार मिले और पलायन रूके। आर्थिक गतिविधियों में तेजी लानी है ताकि राजस्व के साधन बढ़ें। निवेश प्रोत्साहित करने वाली नीतियां बनानी हैं। उन्हें शिक्षा की व्यवस्था ठीक करनी है। स्वास्थ्य की व्यवस्था में बड़े सुधार करने हैं। कानून व्यवस्था को बिगड़ने नहीं देना है और सामाजिक व सांप्रदायिक सद्भाव को कायम रखना है।


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