राजनीति का नीतीश युग समाप्त हुआ

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

यह सिर्फ कहने की बात या सिर्फ औपचारिकता नहीं है कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने के साथ ही बिहार में राजनीति के एक युग का अंत हो रहा है। वैसे वे राज्यसभा सदस्य बन गए हैं और खुद भी कह रहे हैं कि बड़े दिनों के बाद दिल्ली आए हैं तो दिल्ली में राजनीति करेंगे और बिहार को भी मार्गदर्शन देंगे। लेकिन सबको पता है कि उनकी जैसी सेहत है उसमें वे बहुत कुछ करने की स्थिति में नहीं है। दूसरी बात यह है कि 37 साल के बाद बिहार की राजनीति की कमान दिल्ली के हाथ में आ गई है। यह सही है कि बिहार में नए मुख्यमंत्री का चयन नीतीश कुमार की पसंद और सहमति से हुआ है लेकिन उस पर अंतिम मुहर दिल्ली की है।

सो, बिहार की राजनीति में नीतीश युग समाप्त होने के साथ सबसे बड़ा बदलाव यह हो रहा है कि क्षेत्रीय पार्टियों के वर्चस्व की राजनीति पर विराम लग जाएगा। साथ ही लालू प्रसाद के साथ शुरू हुए मंडल की राजनीति पर भी परदा गिर जाएगा।

ध्यान रहे बिहार में 1990 के बाद से राजनीतिक फैसले पटना में होते थे। मुख्यमंत्री कौन होगा, सरकार क्या फैसले करेगी, कैसे उसे लागू करेगी यह सब बिहार से तय होता था। अब इसमें दिल्ली की भी राय शामिल होगी। पिछले कुछ बरसों को छोड़ दें तो शुरू के दिनों में नीतीश कुमार जब भाजपा के साथ सरकार में होते थे तब भी सारे फैसले वे खुद करते थे और भाजपा उनके फैसलों में दखल नहीं देती थी। यही स्थिति लालू प्रसाद के समय भी थी। वे कांग्रेस के साथ होते थे तब भी सारे फैसले उनके होते थे। आखिरी बार बिहार का मुख्यमंत्री 1989 में दिल्ली से तय हुआ था। डॉक्टर जगन्नाथ मिश्रा को कांग्रेस आलाकमान ने सीएम बनाया था। 1990 में कांग्रेस के हार कर सत्ता से बाहर होने के बाद प्रादेशिक पार्टियों ने मुख्यमंत्री तय किए।

बहरहाल, नीतीश कुमार की अपनी एक राजनीतिक शैली रही है। स्वाभाविक रूप से वे एक विनम्र, मृदुभाषी और समावेशी राजनेता हैं। यह उनका स्वाभाविक गुण था। लेकिन उन्होंने इसे एक राजनीतिक अस्त्र के रूप में बेहतर ढंग से विकसित किया क्योंकि उनको खुद को लालू प्रसाद के कंट्रास्ट के रूप में प्रस्तुत करना था। उनको पता था कि लालू प्रसाद को हराने के लिए उन्हीं के जैसी राजनीति नहीं की जा सकती है। ताकत की राजनीति से लालू प्रसाद को नहीं हराया जा सकता है। इसलिए नीतीश कुमार ने कभी भी प्वाइंट ऑफ स्ट्रेंग्थ यानी अपनी शक्ति के प्रदर्शन के साथ राजनीति नहीं की।

इसके उलट उन्होंने प्वाइंट ऑफ वीकनेस से राजनीति की। इसका लाभ यह हुआ कि वे बिहार की सबसे कमजोर जातियों को अपने साथ जोड़ने में कामयाब हुए। उन्होंने पिछड़ी जातियों में अति पिछड़ा और दलित जातियों में महादलित को अलग समूह के रूप में स्थापित किया और उनका समर्थन हासिल किया। कोएलिशन ऑफ एक्सट्रीम यानी एक ऐसा गठबंधन बनाया, जिसमें बिहार की सबसे ताकतवर अगड़ी जातियां शामिल हुईं तो सबसे कमजोर जातियां भी शामिल हुईं।

लालू प्रसाद की भदेस राजनीति के बरक्स सम्भ्रांत राजनीति का चेहरे दिखाना नीतीश कुमार का एक बड़ा दांव साबित हुआ। इसे उन्होंने जंगलराज के नैरेटिव के साथ पेश किया और करीब एक दशक के संघर्ष के बाद सत्ता पाने में कामयाब हुए। इसके बाद उन्होंने शासन का एक नया मॉडल तैयार किया, जिसे न्याय के साथ विकास का नाम दिया। इससे वे सुशासन बाबू के रूप में लोकप्रिय हुए। इसके लिए बहुत काम करने की जरुरत नहीं थी। बिहार में कानून व्यवस्था, विकास, प्रशासन आदि का पैमाना इतना नीचे आ गया था कि उसमें जरा सा भी सुधार बहुत बड़ा दिखाई देता।

सो, नीतीश कुमार ने कानून व्यवस्था में सुधार के लिए जरूरी उपाए किए। अभियोजन में तेजी लाकर आरोपियों को जेल भेजने और सजा दिलाने का मॉडल लोगों में तत्काल लोकप्रिय हुआ। इसका लाभ नीतीश कुमार को 2010 के विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश के रूप में मिला था। उन्होंने विकास के बुनियादी काम यानी सड़क, बिजली और पानी का काम किया साथ में कानून व्यवस्था ठीक होने की धारणा बनवाई और इस दम पर 20 साल राज किया। सोचें, धारणा कितनी प्रबल होती है कि विकास के हर पैमाने पर बिहार सबसे नीचे है। टिकाऊ विकास यानी सस्टेनेबल डेवलपमेंट का जो लक्ष्य नीति आयोग ने बनाया है उसमें हर पैमाने पर बिहार सबसे नीचे है। फिर भी नीतीश कुमार विकास पुरुष कहे गए और बिहार में 20 साल राज किया।

हालांकि भले आर्थिक पैमाने पर या वित्तीय गतिविधियों में बिहार बहुत अच्छा नहीं कर सका लेकिन सामाजिक स्तर पर नीतीश कुमार की उपलब्धियां मामूली नहीं हैं। उन्होंने बिहार के लोगों के मन में सुरक्षा की भावना पैदा की और साथ ही एक सेंस ऑफ ऑनरशिप विकसित की। लालू प्रसाद और राबड़ी देवी के राज में जो पलायन शुरू हुआ था वह इस वजह से रूका और लोगों का वापस लौटना शुरू हुआ। जिस समय नीतीश कुमार ने बिहार की कमान संभाली थी उस समय बिहार में जातीय दंगे बहुत आम थे। जातीय नरसंहार भले थम गए थे लेकिन गांवों और कस्बों में तनाव कम नहीं हुआ था।

नीतीश कुमार ने अपनी राजनीति से सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा दिया। उन्होंने जातियों के बीच तनाव कम किया और उन्हें साथ मिल कर काम करने के लिए प्रेरित किया। यह नीतीश कुमार के 20 साल के शासन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है कि उन्होंने जातीय हिंसा और तनाव को खत्म किया और सामाजिक सद्भाव सुनिश्चित किया। सोचें, नीतीश ने जाति गणना कराई, जिससे समाज जातिगत स्तर पर ज्यादा विभाजित हुआ फिर भी नीतीश की मौजूदगी के कारण वह विभाजन सामाजिक स्तर पर नहीं दिखा। हां, राजनीति में जरूर जातियों का विभाजन दिखा लेकिन उसका सामाजिक असर नहीं हुआ। इसका अर्थ है कि चुनाव के समय जाति का मामला चलता है, समाज में नहीं।

नीतीश युग की राजनीति की एक खास बात यह भी रही कि भाजपा के साथ होते हुए भी उन्होंने बिहार में सांप्रदायिक तनाव नहीं पैदा होने दिया। नीतीश ने सांप्रदायिक आधार पर विभाजन को रोका। मुस्लिम समाज को अलग थलग नहीं होने दिया। सामाजिक विकास की प्रक्रिया में नीतीश कुमार ने उनको शामिल किया। आज पूरे देश में पसमांदा मुस्लिम की बात होती है। इसे सबसे पहले नीतीश कुमार ने बिहार में पहचाना और उनकी तरक्की के लिए काम किया।

वे पहले मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने स्थानीय निकायों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दिया। महिला को एक स्वतंत्र, जातिविहीन मतदाता समूह के रूप में विकसित करने का भी काम सबसे पहले नीतीश कुमार ने ही किया। उन्होंने पोशाक और साइकिल योजना से बालिकाओं की स्कूली शिक्षा को बढ़ावा दिया। उसके साथ ही महिलाओं को स्थानीय निकाय में आरक्षण और अब डोमिसाइल नीति के तहत सरकारी नौकरियों में भी महिलाओं को 35 फीसदी आरक्षण दिया है। राजस्व का नुकसान उठा कर शराबबंदी की नीति लागू करना भी महिला सुरक्षा की राजनीति का ही हिस्सा था।

नीतीश कुमार ने बिहार में संगठित अपराध को खत्म किया। इसका राजनीतिक लाभ यह हुआ कि बिहार की सबसे कमजोर जातियां और समूह पूरी निष्ठा के साथ उनके साथ जुड़े। इसी तरह नीतीश ने सांस्थायिक भ्रष्टाचार को कम करने का ईमानदार प्रयास किया। इतने लंबे समय तक शासन में रहने के बावजूद उनके ऊपर किसी तरह का दाग नहीं लगा। अभी तक वे निजी रूप से परिवारवाद की राजनीति से भी दूर रहे थे।

ऐसी बहुत सारी चीजें हैं, जो नीतीश कुमार को अपने समकालीन नेताओं से अलग करती है। आने वाले दिनों में उनके लंबे राजनीतिक जीवन के अलग अलग पहलुओं का विश्लेषण होगा। बिहार जैसे जाति में बंटे समाज और राज्य में तीन फीसदी आबादी वाली जाति से आने वाले नीतीश कुमार ने कैसे सामाजिक समीकरण और राजनीति को साधा कि दो दशक से ज्यादा समय तक राजनीति को अपने हिसाब से संचालित करते रहे, यह हमेशा राजनीति के छात्रों के लिए अध्ययन का विषय रहेगा। बिहार की भाजपा की पहली सरकार की चुनौतियों पर कल बात करेंगे। (जारी)


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