बिहार में नीतीश कुमार युग का अंत हो गया है। इसमें कोई हैरानी या दुख की बात नहीं है। हर नेता का युग आता है और समाप्त होता है। बिहार में ही जैसे लालू प्रसाद का युग खत्म हुआ वैसे ही नीतीश का भी खत्म हुआ। फर्क इतना है कि लालू प्रसाद चुनाव हार कर विदा हुए। बिहार की जनता ने उनको हराया और उनके युग का अंत किया तो दूसरी ओर नीतीश कुमार को बिहार की जनता ने भारी बहुमत से जिताया फिर भी उनकी विदाई हुई और दुर्भाग्य यह है कि नीतीश जैसे ब़डे नेता की विदाई उनकी अपनी शर्तों पर नहीं हुई। नीतीश कुमार इससे बेहतर विदाई के हकदार थे। उनका जितना बड़ा राजनीतिक कद रहा और उन्होंने जिस किस्म की राजनीति की उसमें ज्यादा सम्मान के साथ और अपनी शर्तों पर उनकी विदाई होनी चाहिए थी। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के मौजूदा नेतृत्व के दौर में उनका कोई भी सहयोगी नेता सम्मान के साथ विदा होने या अलग होने की नहीं सोच सकता है। बादल परिवार से लेकर चौटाला परिवार और भजनलाल परिवार से लेकर ठाकरे परिवार और नीतीश कुमार तक इसकी मिसाल हैं।
नीतीश की विदाई को लेकर बार बार इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि वे राज्यसभा जा रहे हैं। ऐसा लग रहा है, जैसे राज्यसभा की सीट से मुख्यमंत्री की कुर्सी का मोलभाव हुआ है। यह कितनी बेहूदा बात है! नीतीश कुमार जब चाहते तब राज्यसभा जा सकते थे। इस बार भी अपने विधायकों के दम पर उनको राज्यसभा की दो सीटें मिलेंगी। इसलिए वे किसी की कृपा से राज्यसभा नहीं जा रहे हैं। दूसरी बात यह है कि उन्होंने पिछले 25 साल में अनगिनत लोगों को राज्यसभा भेजा है। ऐसे लोगों को, जो कभी सोच भी नहीं सकते थे उनको नीतीश ने उच्च सदन में पहुंचाया। इसलिए मुख्यमंत्री पद से उनकी विदाई को राज्यसभा से जोड़ना मूर्खतापूर्ण काम है। इसी तरह इस तर्क का भी कोई अर्थ नहीं है कि भाजपा विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी है इसलिए उसका मुख्यमंत्री बनना चाहिए। यह बात पिछली विधानसभा में क्यों नहीं कही गई? पिछली विधानसभा में तो नीतीश कुमार के पास 43 और भाजपा के पास 74 विधायक थे।
तीसरी बात उनकी सेहत की है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनकी सेहत खराब है। वे मानसिक रूप से इस स्थिति में नहीं हैं कि राजनीति और शासन जैसे जटिल काम कर सकें। यह उनकी विदाई का आधार तो बनता है लेकिन ऐसी स्थिति में भी विदाई उनकी शर्तों पर होती। यानी सरकार की कमान उनकी पार्टी के हाथों में होती। अगर उनके चेहरे पर चुनाव लड़ा और जीता गया है तो मुख्यमंत्री तय करने का काम उनको करना चाहिए था। वह काम भारतीय जनता पार्टी कर रही है। इसी से पता चल रहा है कि इस पूरे प्रकरण में नीतीश कुमार के हाथ में कुछ भी नहीं है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जो पोस्ट लिखी है उसमें उनकी दयनीयता और झलक रही है। उन्होंने लिखा है कि वे चारों सदनों का सदस्य रहना चाहते थे इसलिए राज्यसभा जा रहे हैं। सोचें, बिहार में उपेंद्र कुशवाहा और नागमणि जैसे नेता चारों सदनों के सदस्य रहे हैं। क्या यह नीतीश कुमार जैसे नेता के कद के अनुरूप है कि वे ऐसी लचर दलील के साथ विदा हों?
असल में उनकी विदाई की पटकथा 14 नवंबर 2025 को आए नतीजों ने लिख दी थी। बिहार विधानसभा का आंकड़ा ऐसा बना, जिसने नीतीश की स्थिति को कमजोर कर दिया। इसकी शुरुआत सीटों के बंटवारे के समय हो गई थी। पहले जनता दल यू हमेशा बड़े भाई की तरह चुनाव लड़ती थी। विधानसभा चुनाव में उसकी सीटों की संख्या ज्यादा होती थी। इस बार जदयू को भाजपा की बराबरी पर लाया गया। उसके बाद तीन सहयोगी पार्टियों को 43 सीटें दी गईं। उसी समय यह स्पष्ट हो गया कि सहयोगियों के साथ भाजपा 143 और जदयू एक सौ सीटों पर लड़ रही है।
चुनाव नतीजों में भाजपा और तीन सहयोगी पार्टियों को मिल कर 117 सीटें आ गईं यानी बहुमत से सिर्फ पांच कम। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी पार्टी राजद की सीटें बहुत कम हो गईं। राजद को सिर्फ 25 और समूचे विपक्षी गठबंधन को 35 सीटें मिलीं। उसी समय नीतीश कुमार की विदाई तय हो गई थी, सिर्फ समय का इंतजार हो रहा था। असल में 2020 में नीतीश कुमार सिर्फ 43 सीटें जीत कर जितने मजबूत थे, 2025 में 85 सीटें जीत कर उतने ही कमजोर हो गए। 2020 में राजद 75 सीट वाली पार्टी थी और कांग्रेस व लेफ्ट की 32 सीटें थीं। सो, भाजपा की कभी नीतीश को आंख दिखाने की हिम्मत नहीं हुई। नीतीश ने अपनी मर्जी से भाजपा का साथ छोड़ कर राजद के साथ सरकार बनाई और फिर भाजपा के साथ भी मुख्यमंत्री बन कर लौटे। इस विधानसभा में वैसी स्थिति नहीं है। एक तो भाजपा इतिहास में पहली बार चुनाव जीत कर सबसे बड़ी पार्टी बनी और दूसरी ओर विपक्षी गठबंधन पूरी तरह से समाप्त हो गया।
इसके बावजूद अगर नीतीश कुमार की मानसिक और शारीरिक स्थिति अच्छी होती तो वे अपने हिसाब से बिहार की राजनीति को संचालित कर सकते थे। क्योंकि उनके पास लोकसभा में 12 सांसद हैं, जिनकी नरेंद्र मोदी सरकार को जरुरत है। लेकिन नीतीश कुमार इसके दम पर भी मोलभाव नहीं कर पाए क्योंकि उनका अपना स्वास्थ्य ठीक नहीं है और उन्होंने इस काम के लिए अपनी पार्टी के जिन लोगों पर भरोसा किया वो उनकी कसौटियों पर खरे नहीं उतरे। केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह और पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की जिम्मेदारी थी कि वे नीतीश कुमार और जनता दल यू के हितों की रक्षा करें। इस काम में दोनों बुरी तरह से विफल हुए हैं।
यह सही है कि नीतीश कुमार की सेहत ठीक नहीं है और वे राजनीति व सरकार की जटिल कार्यप्रणाली को संभालने की स्थिति में नहीं हैं। लेकिन अगर उनकी पार्टी के वरिष्ठ नेता ईमानदार होते तो नीतीश कुमार की विदाई के बाद भी जनता दल यू का ही मुख्यमंत्री बनता। अभी वैसा होता नहीं दिख रहा है। ध्यान रहे जनता दल यू ने पिछला चुनाव ‘2025 से 30 फिर से नीतीश’ के नारे पर लड़ा था। इसलिए अगर सेहत के आधार पर नीतीश हटते हैं तो उनकी पसंद से उनकी पार्टी का कोई दूसरा नेता मुख्यमंत्री बनता तो इसे स्वाभाविक माना जाता। तभी सत्ता का हस्तांतरण स्वाभाविक नहीं है। इसलिए भाजपा को बहुत सोच समझ कर आगे बढ़ना होगा। उसे राजनीतिक और सामाजिक दोनों संतुलन बनाने पर ध्यान देना होगा।
बहरहाल, आने वाले दिनों में लंबे समय तक नीतीश कुमार के राजनीतिक योगदान की चर्चा होगी और बिहार के विकास या बदलाव में बतौर मुख्यमंत्री उनकी जो भूमिका रही उसकी भी चर्चा होगी। परंतु साथ ही यह बात भी इतिहास में दर्ज होगी कि इतने बड़े नेता के साथ अंत में कैसा बरताव हुआ। इतिहास इस बात को भी याद रखेगा कि जीवन भर परिवारवाद, वंशवाद और भ्रष्टाचार से दूर रहे एक नेता को उसकी सहयोगी पार्टी ने कैसे विदा किया। अब बिहार की राजनीति बुनियादी रूप से बदलेगी। विचारधारा के स्तर पर भी टकराव बढ़ेगा और सामाजिक स्तर भी संघर्ष की स्थितियां बनेंगी। यह सबक भी याद रखा जाएगा कि सहयोगी व सलाहकार कैसे चुना जाना चाहिए। ध्यान रहे बिहार का इतिहास विश्वासघात और भक्ति दोनों का नहीं रहा है। बिहार का इतिहास प्रतिरोध का रहा है।
