एआई क्रांति में भारत का अपना कुछ नहीं!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

दिल्ली में हुआ इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 भारत में एआई क्रांति की मजबूत आधारशिला रखने वाले कार्यक्रम साबित होगा या वक्ती मीडिया हाइप के बाद इसका भी मामला नेपथ्य में चला जाएगा और सब कुछ वैसे ही चलता रहेगा, जैसा पहले चलता रहा है? यह सवाल इसलिए है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से अब तक हुई तमाम औद्योगिक और संचार क्रांतियों में भारत की भूमिका नगण्य रही है। पहली औद्योगिक क्रांति में भी भारत ने न कुछ आविष्कार किया और न कोई निर्माण किया।

उसी तरह संचार क्रांति में भी भारत का योगदान एक यूजर देश के रूप में ही रहा। भारत ने हर क्रांति में बने उत्पादों का इस्तेमाल किया। अगर सोशल मीडिया क्रांति में भारत की उपलब्धि यह है कि भारत में सबसे ज्यादा 45 करोड़ फेसबुक यूजर हैं तो एआई क्रांति में अभी तक भारत की उपलब्धि का आंकड़ा यह है कि भारत में चैटजीपीटी के अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा यूजर हैं। भारत में इनका इस्तेमाल करने वालों की संख्या साढ़े 14 करोड़ है।

अब दुनिया भर की एआई कंपनियों में होड़ मची है कि किसके यूजर सबसे ज्यादा होंगे। गूगल को अपने जेमिनी के यूजर बढ़ाने हैं तो सुंदर पिचाई ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी साथ मीटिंग के बाद मीडिया के सामने कहा कि उनकी कंपनी भारत के दो करोड़ कर्मचारियों को एआई के इस्तेमाल की ट्रेनिंग देगा। इसी तरह सैम ऑल्टमैन की कंपनी ओपनएआई भी चैटजीपीटी के इस्तेमाल के लिए प्रशिक्षण देगी। माइक्रोसॉफ्ट ने भी 30 लाख लोगों को प्रशिक्षण देने की घोषणा की है। 30 साल पहले इसी तरह माइक्रोसॉफ्ट के ट्रेनिंग कैंप लगते थे। उनके पेशेवर भारत के लोगों को माइक्रोसॉफ्ट के ऑपरेटिंग सिस्टम के इस्तेमाल की जानकारी देते थे। लोगों को ईमेल और सर्च इंजन के इस्तेमाल में प्रशिक्षित किया जाता था।

आज भी वही इतिहास दोहरा रहा है। आप कोई भी यूट्यूब प्लेटफॉर्म खोलिए वहां सबसे ज्यादा विज्ञापन इस बात का आ रहा है कि एआई का इस्तेमाल करना सीखें और कमाई बढ़ाए। याद करें कैसे पहली संचार क्रांति के समय गली गली में कंप्यूटर और लैपटॉप रिपेयर की दुकानें खुलीं, उसके बाद मोबाइल हैंडसेट के रिपेयर और सिम बेचने की दुकानें खुलीं और अब हर जगह एआई सिखाने की दुकानें खुल रही हैं।

सवाल है कि इसमें भारत का अपना क्या है? इसी एआई इम्पैक्ट समिट में भारत की कंपनी सर्वम ने अपना प्लेटफॉर्म लॉन्च किया। बेंगलुरू स्थित कंपनी ने पहला मल्टी बिलियन पैरामीटर का एलएलएम यानी लार्ज लैंग्वेज मॉडल पेश किया। लेकिन अभी इसका इस्तेमाल शुरू नहीं हुआ है। आम लोगों के बीच यह नहीं पहुंचा है और न इसके पेशेवरों द्वारा लोगों को सर्वम के इस्तेमाल की ट्रेनिंग दी जा रही है। दूसरी ओर अमेरिका की कंपनियों के प्लेटफॉर्म करोड़ों की संख्या में लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं। चैटजीपीटी के कई वर्जन आ गए। उसे लगातार अपग्रेड किया जा रहा है। इसी तरह जेमिनी, ग्रॉक, परप्लेक्सिटी जैसे प्लेटफॉर्म का करोडों लोग इस्तेमाल कर रहे हैं। चीन के डीपसीक की बात छोड़ दें तो अमेरिकी कंपनियां पूरी दुनिया पर छा गई हैं। उनके यहां इस पर इतना रुपया खर्च किया जा रहा है, जिसकी भारत में कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

अमेरिका अगले साल एआई पर साढ़े छह सौ बिलियन डॉलर यानी करीब छह लाख करोड़ रुपए का है। चीन अगले साल सौ बिलियन डॉलर यानी एक लाख करोड़ रुपए का है। इसके मुकाबले भारत सरकार ने इस साल बजट में एआई के लिए एक हजार करोड़ रुपए का प्रावधान किया है। सोचें, कहां छह लाख और एक लाख करोड़ और कहां एक हजार करोड़! दुनिया के एआई पेटेंट में भारत का हिस्सा सिर्फ 0.39 फीसदी है तो चीन का हिस्सा 70 फीसदी है।

भारत सरकार एक हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है लेकिन देश के अरबपतियों ने लाखों करोड़ रुपए के निवेश का ऐलान किया। इतना बड़ा ऐलान है कि अमेरिका और चीन भी चित हो जाएं। अडानी समूह ने अगले 10 साल में 18 लाख करोड़ तो अंबानी समूह ने सात साल में 10 लाख करोड़ रुपए निवेश का ऐलान किया है। सोचें, यह रकम पढ़ कर लगेगा कि अब भारत एआई क्रांति का विश्वगुरू बनने वाला है। भारत को कोई नहीं रोक सकता है। यह भी भाव मन में पैदा होगा कि अमेरिका और चीन भारत के इन दो कारोबारियों के

सामने क्या हैं।

अब सवाल है कि क्या ये दोनों कारोबारी किसी एआई प्लेटफॉर्म का निर्माण करेंगे, क्या ये कोई चैटजीपीटी जैसा बना देंगे और भारत के लोग उसका इस्तेमाल करने लगेंगे? हम ज्यादा उम्मीद नहीं करते हैं। यह नहीं सोचते हैं कि भारत के अंबानी और अडानी कुछ ऐसा बना देंगे, जिसका इस्तेमाल अमेरिका या यूरोप के लोग करने लगेंगे लेकिन क्या भारत के लोगों के लिए भी ये कंपनियां कुछ बना पाएंगी? इनका इतिहास देखते हुए लग नहीं रहा है कि ये कुछ बनाएंगी। इन्होंने एआई क्रांति की फसल काटने का बंदोबस्त किया है। टाटा से लेकर अंबानी, अडानी तब सबने किसी न किसी अमेरिकी कंपनी के साथ तालमेल कर लिया है।

ये लोग उनके वेंडर की तरह काम करेंगे। भारत में सेक्टर स्पेशिफिक एप्लीकेशन बनाएंगे और उसके इस्तेमाल की फीस वसूल कर कमाई करेंगे। उस कमाई का भी बड़ा हिस्सा अमेरिका जाएगा।

अब सवाल है कि भारत की कंपनियां इतना रुपया किस चीज में निवेश करेंगी? भारत की कंपनियों का निवेश जमीन अधिग्रहण करने, उस पर बड़ी इमारतें बनवाने और वहां एआई के डेटा सेंटर स्थापित करके उन्हें चलाने में खर्च होगा। वे बुनियादी ढांचा तैयार करके अमेरिकी कंपनियों को देंगी ताकि वे अपना डेटा सेंटर स्थापित करें। यह बहुत दिलचस्प संयोग है कि भारत सरकार ने इस साल बजट में डेटा सेंटर को 21 साल तक के लिए टैक्स छूट देने की घोषणा की है। यानी विशाल डेटा सेंटर बनेंगे और सरकार को कोई टैक्स नहीं दिया जाएगा। इतना ही नहीं डेटा सेंटर में इस्तेमाल होने वाली बिजली आम इस्तेमाल से 40 फीसदी सस्ती होगी। कंपनियां बजट में मिली इस छूट का लाभ उठाएंगी।

ध्यान रहे भारत में डेटा कैपिसिटी अभी 1.2 गीगावॉट की है जो अगले चार साल में बढ़ कर पांच गीगावॉट होने वाली है। इसके लिए 20 से 30 गीगावॉट बिजली की जरुरत होगी और इसी अनुपात में डेटा सेंटर्स की कूलिंग के लिए अरबों लीटर पानी की जरुरत होगी। इस तरह भारत अपनी जमीन देगा, टैक्स छूट देगा, सस्ती बिजली देगा, पानी देगा और सस्ता मानव संसाधन देगा, जिस पर प्राइमरी कमाई अमेरिकी कंपनियों की होगी और उसके बाद उनकी पिछलग्गू भारतीय कंपनियों की कमाई होगी। एक आर्थिक जानकार ने बहुत अच्छा समझाया कि अमेरिका ने कोका कोला और पेप्सी बनाई तो जापान और दक्षिण कोरिया ने रेफ्रिजेरेटर बनाए फिर दोनों ने मिल कर दुनिया भर के देशों से खरबों डॉलर की कमाई की। एआई क्रांति में भी यही होता दिख रहा है। अमेरिकी कंपनियों ने एआई प्लेटफॉर्म बनाए और भारत के अरबपति उनके वेंडर बन कर उनके लिए डेटा सेंटर बना रहे हैं और दोनों मिल कर कमाई करेंगे।

इसमें भारत का अपना कुछ नहीं होगा। भारत ने जब किसी क्रांति में कोई हार्डवेयर नहीं बनाया तो सॉफ्टवेयर क्या बनाएगा? भारत एक बढ़िया कंप्यूटर और लैपटॉप नहीं बनाता है। भारत एक बढ़िया स्मार्ट फोन नहीं बनाता है। भारत अपना टेलीवेजिन सेट या रेफ्रेजेरेटर, एसी और वॉशिंग मशीन नहीं बनाता है। भारत के पास अपना ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं है। वर्ड से लेकर लाइनक्स और आयोस से लेकर एंड्रॉयड तक सब विदेशी है। फिर हम कैसे यह कल्पना कर रहे हैं कि भारत कोई एआई का लोकप्रिय प्लेटफॉर्म बना लेगा? भारत जैसे पहले कुछ नहीं कर सका और यूजर या इंटरमीडियरी बना रहा वैसे ही आगे भी बना रहेगा। वैसे भी किसी होड़ में क्यों पड़ना है। जैसे बाकी चीजें खरीद कर भारत इस्तेमाल करता है वैसे ही एआई का भी करेगा।


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