सब इन शंकराचार्य की गति को प्राप्त होंगे!

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

उत्तर प्रदेश में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानमंद के साथ जो हो रहा है वह भारतीय समाज के अंदर पल रही एक बड़ी बीमारी का लक्षण है। वह बीमारी धार्मिक और सामाजिक विभाजन की है, जिसे राजनीतिक लाभ के लिए बढ़ाया जा रहा है। यह पहली बार हो रहा है कि देश और समाज इस कदर निभाजित हुआ है। पहले समाज के स्तर पर विभाजन चुनावों के समय दिखते थे। हालांकि वह भी बहुत सीमित होता था। लेकिन आज स्थायी रूप से एक विभाजन दिखता है और दुर्भाग्य की बात यह है कि नेताओं के साथ साथ धर्मगुरु, आध्यामिक कार्यों में लगे लोग और साधारण से लेकर शंकराचार्य के स्तर तक साधु संत भी राजनीतिक लाइन पर बंटे हुए हैं।

लोग साधु, योगी और कथावाचक की जाति खोज ले रहे हैं और फिर उस आधार पर उसके समर्थन या विरोध में खड़े हो जाते हैं। लेकिन यह किसी स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत नहीं हो रहा है। केंद्र की मौजूदा सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी राजनीतिक लाभ के लिए सुनियोजित तरीके से इस विभाजन को बढ़ा रही है। शंकराचार्य का मामला और यूजीसी की नियमावली इसके दो ताजा संकेत हैं।

बहरहाल, यह दुर्भाग्य है कि एक राष्ट्र के रूप में भारत और इसके 140 करोड़ लोगों के नैतिक, धार्मिक या आध्यात्मिक उत्थान के लिए काम करने वाले साधु या संत या धर्मगुरू खोजने से नहीं मिलेंगे लेकिन नफरत फैलाते साधु संत चारों तरफ मिल जाएंगे। इतिहास में कभी भी भारत की आध्यात्मिक परंपरा ऐसी नहीं रही थी। ईसाई धर्मगुरू भड़काऊ बातें करते थे और झूठे सच्चे वादे करके धर्म परिवर्तन कराते थे या इस्लाम के प्रचारक मौलाना आदि भड़काऊ भाषणों से लोगों को उकसाते थे, जिहाद के लिए प्रेरित करते थे लेकिन हिंदू साधु संत इस तरह के काम नहीं करते थे।

यह अंतर बहुत साफ दिखता था और ऐसा इसलिए भी है क्योंकि बुनियादी रूप से ईसाई और इस्लाम दोनों राजनीतिक धर्म हैं, जो लालच या भय से फैलाए गए हैं। महात्मा गांधी ने साम्राज्यवाद को फैलाने वाली शक्तियों के तौर पर ईसाई पादरियों और चर्च को रेखांकित किया था। उन्होंने कहा था कि पहले इनके पादरी आते हैं, फिर इनके व्यापारी आते हैं और अंत में इनकी सेना आती है। इसी तरह इस्लाम तलवार के दम पर फैलता है यह आरोप अक्सर लगते रहते हैं।

लेकिन इस तरह की बातें हिंदू धर्म को लेकर नहीं कही जाती हैं तो इसका कारण यह था कि हिंदू धर्म के शंकराचार्य हों या दूसरे साधु संत हों वे समाज सुधार के कार्यों में रहते थे या धार्मिक अनुष्ठानों और आध्यात्मिक श्रेष्ठता प्राप्त करने के उपक्रमों में रहते थे। समय के साथ साथ इसमें बड़ा बदलाव आया है। अब भारत के साधु संत खुल कर राजनीति की बातें करते हैं। पार्टियों और नेताओं का समर्थन करते हैं। पांच हजार साल की सनातन परंपरा से अलग हट कर इस या उस नेता को हिंदू धर्म के रक्षक के रूप में रेखांकित करते हैं। सामाजिक विद्वेष फैलाने वाली बातें करते हैं। जाति और धर्म को लेकर ऐसी टिप्पणियां करते हें, जैसी टिप्पणी करने से नेता भी हिचकते हैं। देश के सम्मानित माने जाने वाले साधु संत महिलाओं को लेकर ऐसी अनर्गल बातें करते हैं, जिन्हें सुन कर सिर शर्म से झुक जाता है।

आज साधु संतों का आकलन उनकी योग्यता या धार्मिक, आध्यात्मिक उपलब्धियों के आधार नहीं किया जाता है, बल्कि इस आधार पर किया जाता है कि उसके आश्रम में कितनी भीड़ जुटती है, उसके आगे पीछे कितनी गाड़ियां चलती हैं, उसके आश्रम में कौन नेता, अभिनेता या खिलाड़ी पहुंचा, उसे कैसी सुरक्षा मिली हुई है आदि आदि। अगर धर्मगुरू चार्टर्ड फ्लाइट से चलता है तो वह सर्वश्रेष्ठ मान लिया जाएगा भले उसकी बातें कितनी भी मूर्खतापूर्ण और समाज का विभाजन करने वाली क्यों न हों। यह स्थिति एक राष्ट्र और समाज के रूप में भारत को रसातल में ले जा रही है।

बहरहाल, विषयांतर हो गया लेकिन प्रयागराज वे माघ मेले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्यों के साथ जो हुआ और अब जिस तरह से एक दूसरे संत के हिस्ट्रीशीटर शिष्य द्वारा उनके खिलाफ नाबालिग बच्चों के यौन शोषण के आरोप लगा कर मुकदमा दर्ज कराया गया है वह इस गंभीर व्याधि का एक लक्षण है। सबको पता है कि अविमुक्तेश्वरानंद वाचाल हैं। वे शंकराचार्य स्वरूपानंद के शिष्य हैं और अपने गुरू की तर्ज पर खूब बयानबाजी भी करते हैं। उनके बयान अक्सर भाजपा और उसकी केंद्र व राज्यों की सरकारों के खिलाफ होते हैं। उन्होंने पिछले साल के कुंभ मेले में हुई भगदड़ और उसकी मौतों को लेकर तल्ख टिप्पणी की थी। उन्होंने राज्य की भाजपा सरकार को कठघरे में खड़ा किया था। इस आधार पर उनको भाजपा विरोधी और कांग्रेस समर्थक साधु माना जाता है।

हालांकि वे कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियों के खिलाफ भी बोलते रहते हैं। प्रयागराज में उनके साथ जो हुआ और उसके बाद से जो हो रहा है वह उनकी राजनीतिक सक्रियता से जुड़ा हुआ है। शुरुआत मौनी अमावस्या के दिन हुई, जब वे अपनी पालकी से शाही स्नान के लिए जा रहे थे और उनकी पालकी रोक दी गई है। प्रोटोकॉल का हवाला दिया गया। जब उनके शिष्यों ने आगे बढ़ने का उपक्रम किया तो बल प्रयोग करके सबको रोका गया। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पालकी की क्षत्रप टूट गई और उनके शिष्यों को, जिनमें वेदपाठी ब्राह्मण बटुक थे, गिरा गिरा पर लातों, घूसों से पीटा गया। इसके बाद जब वे अन्न, जल त्याग कर अनशन पर बैठे तो उनको एक नोटिस भेज दिया गया कि ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है तो वे अपने को शंकराचार्य क्यों कह रहे हैं।

सबसे पहली बात तो यह है कि मेले का प्रोटोकॉल एक बात है लेकिन धर्मगुरुओं के स्नान की परंपरा तो धर्मगुरु ही तय करते हैं। कोई भी धार्मिक परंपरा सरकार नहीं तय करती है। वह धर्मगुरू तय करते हैं। इसी तरह किस संत का पट्टाभिषेक किस रूप में हुआ है यह भी तय करना प्रशासन का काम नहीं है। देश में अनगिनत अखाड़े, मंदिर, मठ, आश्रम आदि हैं उनमें प्रधान तय करने का अपना सिस्टम है। स्वंय योगी आदित्यनाथ को उनके गुरू योगी अवैद्यनाथ ने गोरक्षापीठ का महंत नियुक्त किया।

ऐसे ही शंकराचार्य की नियुक्ति शंकराचार्य करते हैं। अविमुक्तेश्वरानंद की नियुक्ति उनके गुरू स्वरूपानंद ने की थी। इसके अलावा दूसरी परंपरा यह है कि चारों शंकराचार्य, जिसको शंकराचार्य मानेंगे वही असली होगा। चार में शृंगेरी और द्वारका के शंकराचार्य उनको शंकराचार्य मानते हैं, जबकि पुरी के शंकराचार्य उनके स्टैटस को लेकर खामोश थे। इस विवाद के बाद उन्होंने भी समर्थन किया है। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा शुरू होने से पहले उनका पट्टाभिषेक भी हो चुका है। हालांकि प्रशासन के सामने इस सफाई की आवश्यकता नहीं थी। यह दुर्भाग्य है कि एक साधु को इस तरह की सफाई देनी पड़ रही है। दूसरी ओऱ पुलिस, प्रशासन और राज्य या केंद्र की सरकार में से किसी ने उनके अनशन की सुध नहीं ली। वे अन्न जल त्याग कर अनशन पर बैठे रहे और ऐसा लग रहा है कि राज्य व केंद्र की सरकार को लगा कि इनके साथ यही बरताव होना चाहिए क्योंकि ये हमारे विरोधी है।

यह राजनीतिक आधार पर साधु संतों के बंटने की अनिवार्य परिणति है। आज अगर केंद्र व उत्तर प्रदेश की सरकार के कामकाज पर सवाल उठाने की वजह से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रशासन का शिकार बनें हैं तो कल कांग्रेस की सरकार आने पर या किसी कांग्रेस शासित राज्य में उन संतों के साथ ऐसा ही हो सकता है, जो सोनिया या राहुल गंधी और कांग्रेस के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी करते हैं। ऐसे संतों की लंबी सूची है। उनको सोचना चाहिए कि जब इस व्यवस्था में एक शंकराचार्य के साथ ऐसा हो सकता है तो अनपढ़, अज्ञानी कथावाचकों और कथित साधु संतों का क्या होगा?


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