प्रदूषण कम करने के बेमानी उपाय

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

दिल्ली की सरकारें हर साल सर्दियों में प्रदूषण से वैसे ही लड़ती हैं, जैसे अभी रेखा गुप्ता की सरकार लड़ रही है। इसमें कुछ भी नया नहीं है और कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे कुछ हासिल हो सके। यह सारी कवायद पहले भी बेकार साबित हुई हैं और अब भी बेमानी ही हैं। फर्क इतना है कि साल के साथ साथ इसके प्रचार की तीव्रता बढ़ती जा रही है। मीडिया की कवरेज बढ़ती जा रही है। अदालतों की सक्रियता और उनका दखल बढ़ रहा है। इतना सब कुछ होने के बावजूद वायु प्रदूषण की स्थिति में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आता है क्योंकि ये तमाम प्रयास सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं।

उनका असल मकसद कुछ हासिल करना नहीं होता है। सरकारों को पता होता है कि इससे कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है। क्योंकि वे जानते हैं कि बिना सोचे समझे योजनाओं की घोषणा कर रहे हैं, जिनका अनुपालन संभव ही नहीं है। लेकिन प्रदूषण बढ़ता है और लोगों का चीखना चिल्लाना बढ़ता है तो कुछ उपायों की घोषणा कर दी जाती है। ग्रैप का तीसरा या चौथा चरण लागू कर दिया जाता है। फिर धीरे धीरे मौसम के साथ अपने आप सब ठीक हो जाता है फिर सब भूल जाते हैं।

अभी दिल्ली में लगातार 10 दिन से हवा की गुणवत्ता ‘बेहद खराब’ या ‘गंभीर’ श्रेणी में है। यह सरकार की अपनी मॉनिटरिंग सिस्टम की रिपोर्ट है। निजी मॉनिटरिंग ऐप्स की बात करें तो हवा की गुणवत्ता इससे कहीं ज्यादा खराब है। फिर भी अगर सरकार की रिपोर्ट ही मानें तो उसने इसे ठीक करने के लिए क्या किया? बड़े जोर शोर से सरकार की ओर से ऐलान किया कि सरकारी और निजी कार्यालयों में आधे कर्मचारियों को वर्क फ्रॉम होम करना होगा। इस नियम को अनिवार्य किया गया। सवाल है कि कैसे तय होगा कि किस कंपनी या किस विभाग का कौन सा कर्मचारी घर से काम करेगा और कौन सा कर्मचारी ऑफिस आएगा? अगर किसी निजी या सरकारी कंपनी ने इस आदेश को नहीं लागू किया तो इसका पता कैसे चलेगा?

क्या दिल्ली सरकार ने मॉनिटरिंग का कोई सिस्टम बनाया है? जिसको वर्क फ्रॉम होम के लिए कहा गया है वह घर पर है या अपनी निजी गाड़ी से किसी मॉल में जाकर काम कर रहा है यह कैसे पता चलेगा? बिजली के स्विच की तरह वर्क फ्रॉम होम और वर्क फ्रॉम ऑफिस के फैसले होंगे तो लोग कैसे इसका पालन करेंगे? ऐसे अनेक सवाल हैं, जिनका किसी के पास जवाब नहीं है। लेकिन सरकार को यह आसान लगता है कि लोगों की नाराजगी दूर करने के लिए या कुछ करते हुए दिखने के लिए कह दिया जाए कि आधे लोग घर से काम करें।

ऐसे ही दिल्ली के पर्यावरण मंत्री ने लोगों से माफी मांगते हुए ऐलान किया कि बिना प्रदूषण नियंत्रण सर्टिफिकेट के किसी गाड़ी को पेट्रोल और डीजल नहीं मिलेगी। दिल्ली के सारे पेट्रोल पंप मालिक परेशान हो गए कि इस आदेश का पालन कैसे होगा? पेट्रोल पंप मालिकों का कहना है कि यह संभव ही नहीं है कि उनके यहां आने वाली हर गाड़ी का प्रदूषण सर्टिफिकेट चेक किया जाए। इसके लिए अतिरिक्त लोगों की नियुक्ति करनी होगी और उसके बाद हर जगह लंबी लाइन लग जाएगी। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि पेट्रोल और डीजल की आपूर्ति को अनिवार्य सेवा में रखा गया है। इसलिए अगर इसे अनिवार्य सेवा से हटाने का कानूनी प्रावधान नहीं किया जाता है तब तक वे कैसे लोगों को पेट्रोल और डीजल देने से मना कर सकते हैं? अगर किसी को मना किया और उसने केस कर दिया तो क्या होगा?

सरकार तो पल्ला झाड़ कर अलग हो जाएगी और परेशान होना पड़ेगा पेट्रोल पंप के मालिक को! पेट्रोल पंप मालिकों की एक चिंता यह भी है कि लोग मना करने पर लड़ने को तैयार हो जाते हैं। कर्मचारियों के साथ मारपीट करने लगते हैं तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी? क्या सरकार पेट्रोल पंप पर सुरक्षा मुहैया कराएगी? सरकार के पास इन सवालों के जवाब नहीं हैं। उसने तो कुछ करते हुए दिखने के लिए एक आदेश दे दिया। अब इसका पालन होता है या नहीं यह देखना उसका काम नहीं है! सवाल है कि सरकार पूरे साल के लिए यह आदेश क्यों नहीं लागू कर देती है? अगर पूरे साल के लिए लागू किया तो कानूनी बदलाव भी होंगे और सरकार व पेट्रोल पंप मालिक इस पर अमल की स्थायी व्यवस्था बनाएंगे।

सरकार के सारे फैसले कितने तदर्थ हैं और बिना सोचे समझे हैं, इसकी एक मिसाल पांचवीं तक स्कूल बंद कर देने और उससे ऊपर की कक्षाएं हाइब्रिड मोड में चलाने का आदेश है। ध्यान रहे सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देकर कोई भी आदेश जारी करने से इनकार कर दिया। क्योंकि सर्वोच्च अदालत के सामने गरीब और निम्न मध्यवर्ग की ओर से कई वकील खड़े हो गए, जिन्होंने इस फैसले पर सवाल उठाया। क्या सरकार को नहीं पता है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर बच्चे निम्न पृष्ठभूमि से आते हैं, जिनके घर सड़कों के किनारे हैं, झुग्गियों में हैं, गांवों में हैं या अनधिकृत कॉलोनियों में हैं, उनके पास एयर प्यूरीफायर नहीं हैं और न घर से बैठ कर हाइब्रिड मोड में पढ़ाई करने के साधन हैं?

फिर उनकी पढ़ाई छुड़ा कर उनको घर बैठाने का क्या मतलब है? ऐसे बच्चों के माता, पिता सुबह काम पर जाते हैं और बच्चे स्कूल जाते हैं तो उनको एक समय का खाना मीड डे मिल के रूप में मिल जाता है। वह बंद होने का उनको बड़ा नुकसान हो रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस तरह स्कूल बंद कराने या हाइब्रिड मोड में कराने का प्रदूषण कम करने में कितना योगदान होता है इसका कोई व्यावहारिक अध्ययन किसी के पास नहीं है। फिर भी लोकप्रिय धारणा को प्रभावित करने के लिए सरकार इस तरह के फैसले करती है।

इसी तरह का एक फैसला गाड़ियों के मानक को लेकर है। बीएस चार तक की गाड़ी कब नहीं चलेगी और बीएस छह से नीचे की गाड़ी कब नहीं चलेगी या बाहर की किस मानक की गाड़ी कब दिल्ली में प्रवेश नहीं करेगी और किस तरह की सेवा में लगी गाड़ियों को छूट रहेगी यह घोषणा भी समय समय पर होती है। लेकिन इसका आधार क्या है और इसका अनुपालन कैसे होता है यह कोई नहीं बता सकता है। गाड़ियों की शक्ल से तो उनके मानक का पता नहीं चलता है और न कोई मानक इस बात की गारंटी है कि गाड़ी कम या ज्यादा धुआं दे रही है।

हो सकता है कि बीएस छह मानक वाली गाड़ी ज्यादा चल चुकी हो और ज्यादा धुआं देती हो लेकिन उसे चलने की अनुमति होगी और कम धुआं देने वाली बीएस पांच गाड़ी को अनुमति नहीं होगी। ग्रैप के चौथे चरण के तहत दिए गए इस आदेश का नतीजा यह है कि दिल्ली की सीमा पर हर जगह जाम लग रहा है, जिससे प्रदूषण और बढ़ता है। कृत्रिम बारिश कराने का प्रयोग कैसे फेल हुआ उसके बारे में बताने की जरुरत नहीं है। उस पर कई करोड़ रुपए खर्च करने के बाद अब उसकी कोई चर्चा भी नहीं है।

ऐसे ही सरकार बिजली के स्विच की तरह ग्रैप एक से लेकर ग्रैप चार तक शिफ्ट करती रहती है। प्रदूषण थोड़ा कम हुआ तो ग्रैप की श्रेणी घटा दी और थोड़ा बढ़ गया तो बढ़ा दी। क्या ऐसे प्रदूषण नियंत्रण होता है? दुनिया के तमाम जानकार मानते हैं कि इस तरह के उपाय प्रदूषण बढ़ने से पहले किए जाने चाहिए। यानी अगर ग्रैप एक लगाने की स्थिति है तो उसी समय ग्रैप तीन या चार लगा देना चाहिए ताकि प्रदूषण नहीं बढ़े। लेकिन दिल्ली में और व्यापक रूप से भारत में भी इसका उलटा होता है। जब प्रदूषण ‘गंभीर’ या ‘खतरनाक’ श्रेणी में पहुंच जाए तो ग्रैप चार लगाया जाता है और इसमें थोड़ी कमी होते ही फिर हटा लिया जाता है।

सरकार को पता है कि नवंबर से जनवरी तक तीन महीने वह कुछ भी कर ले, वायु प्रदूषण बढ़ेगा और हवा जहरीली होगी। फिर भी कोई उपाय जनवरी के बाद और नवंबर से पहले नहीं किया जाएगा। ऐन मौके पर उपाय किए जाएंगे। बेसब्री से कैलेंडर के पन्ने पलटे जाएंगे और सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा की जाएगी ताकि मौसम बदले और हवा साफ हो तो इस विवाद से मुक्ति मिले। इन्हीं तदर्थ उपायों की वजह से ग्रैप चार लगाने के बाद भी दिल्ली में प्रदूषण की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। लेकिन सरकारें और सरकारी एजेंसियां इससे कोई सबक नहीं लेंगी।


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