अराजनीतिक लोगों से कांग्रेस की मुश्किल

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही है। यह उसकी एक बड़ी समस्या है। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता है। कांग्रेस के आलाकमान के कमजोर होने की जो धारणा बनी है और सही धारणा बनी है, उसका कारण यह है कि कांग्रेस चुनाव नहीं जीत रही है। 2014 से पहले जब तक कांग्रेस चुनाव जीत रही थी, केंद्र में उसकी सरकार थी और एक दर्जन राज्यों में कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों की सरकार थी, तब तक जैसे भी थे राहुल गांधी बहुत मजबूत थे। वे अपने हिसाब से फैसले करते थे और किसी को भी नेता, मंत्री बना देने में सक्षम थे। लेकिन जब से चुनाव हारने का सिलसिला शुरू हुआ तब से उनकी शक्ति का ह्रास होता गया है और अब ऐसी स्थिति आ गई है कि पार्टी के क्षत्रप अपनी मनमानी कर रहे हैं। हालांकि इसमें कोई नई बात नहीं है। जब पार्टी के सर्वोच्च नेता का करिश्मा चूक जाए और वह चुनाव नहीं जीता सके तो उसकी ताकत कम होती ही है। भाजपा में लालकृष्ण आडवाणी के साथ भी ऐसा ही हुआ था।

लेकिन कांग्रेस की एकमात्र समस्या यह नहीं है कि चुनाव नहीं जिता पाने की वजह से कांग्रेस आलाकमान कमजोर हुआ है। यह उसकी कई समस्याओं में से एक समस्या है। ध्यान रहे भारतीय जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी और समाजवादियों पार्टियों का लंबे समय तक चुनाव हारने का इतिहास रहा है। लेकिन उनके नेतृत्व को लेकर कभी उस तरह से सवाल नहीं उठे, जैसे कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व यानी राहुल गांधी को लेकर उठ रहे हैं। चुनाव हारने वाली पार्टियों के भविष्य पर वैसी चिंता भी नहीं हुई, जैसी कांग्रेस को लेकर हो रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कांग्रेस में राजनीति करने वाले लोगों की कमी हो गई है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने या अखिलेश यादव से लेकर ममता बनर्जी जैसे प्रादेशिक क्षत्रपों ने राजनीति को 24 घंटे का काम बनाया है। राहुल गांधी और उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस यह काम नहीं कर पा रही है।

कह सकते हैं कि कांग्रेस की तमाम समस्याओं के मूल में यह कारण है कि उसके यहां राजनीति करने वाले लोग कम हो गए हैं। इस बात को ऐसे भी कह सकते हैं कि राहुल गांधी ने अपने आसपास बड़ी संख्या में अराजनीतिक लोगों को इकट्ठा कर लिया है। उनके सलाहकार, जिसे कोटरी कहते हैं, उसके सदस्य हों या उनकी ओर से राज्यों में नियुक्त किए गए नेता हों, उनमें बड़ी संख्या अराजनीतिक लोगों की है, जिनके साथ कांग्रेस के पुराने राजनीति करने वाले नेता तालमेल नहीं बैठा पा रहे हैं। बिहार में प्रभारी महासचिव कृष्णा अल्लावरू के साथ यही हुआ तो झारखंड के प्रभारी के राजू और तेलंगाना की प्रभारी मीनाक्षी नटराजन के साथ भी यही हो रहा है। महाराष्ट्र में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल के साथ यही समस्या है तो बिहार के प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम के साथ भी यही समस्या है। हिमाचल प्रदेश में नए प्रदेश अध्यक्ष विनय कुमार के साथ यही समस्या आने वाली है। सोचें, सोनिया गांधी के साथ अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह, जनार्दन द्विवेदी, मोतीलाल वोरा, एके एंटनी जैसे राजनीति करने वाले लोग थे तो राहुल गांधी के साथ सचिन राव, अलंकार सवाई, मनोज त्यागी, कौशल विद्यार्थी, कृष्णा अल्लावरू, मीनाक्षी नटराजन, हर्षवर्धन सपकाल जैसे निजी सहयोगी या सलाहकार हैं! एक तरफ ऐसे अराजनीतिक लोग हैं तो दूसरी ओर हाइपर एक्टिव डीके शिवकुमार, सिद्धारमैया, भूपेंद्र सिंह हुड्डा, सचिन पायलट, अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, रेवंत रेड्डी जैसे नेता हैं। इनका राहुल की टीम के साथ कैसे तालमेल बनेगा?

राहुल गांधी ने अपनी इनर टीम की पुरानी सदस्य मीनाक्षी नटराजन को तेलंगाना का प्रभारी बना कर भेजा है। उनके जाने पर कांग्रेस के नेता पहले तो बड़े खुश हुए लेकिन अब सब परेशान हैं। वे तेलंगाना में पदयात्रा कर रही हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उनका काम रणनीति बनाने का होना चाहिए, राजनीति करने का नहीं। यह सही है कि वे गांधीवादी तरीके से काम कर रही हैं लेकिन इससे व्यावहारिक राजनीति प्रभावित हो रही है। जुबली हिल्स विधानसभा का उपचुनाव लड़ना था तो कांग्रेस ने जितनी तिकड़म की उससे नटराजन खुश नहीं थीं। सबको पता है कि दक्षिण के सभी राज्यों की राजनीति पैसे के दम पर चलती है। लेकिन मीनाक्षी नटराजन को प्रदेश कांग्रेस का बेहिसाब पैसा बहाना या अजहरूद्दीन को विधान परिषद में भेज कर मंत्री बनाना पसंद नहीं आया। इसी तरह बिहार में कृष्णा अल्लावरू कांग्रेस के वेतनभोगी कर्मचारी की तरह राजनीति करते रहे हैं। वे विधानसभा चुनाव से ठीक पहले बिहार पहुंचे थे। ऐसे में उन्होंने कांग्रेस के तमाम पुराने नेताओं को साथ लेकर चुनावी राजनीति करनी थी तो उन्होंने उलटे पुराने नेताओं को न सिर्फ हाशिए में डाला, बल्कि उन सबको नाराज कर दिया। उसके बाद भी अगर वे बेहतर गठबंधन और सीट बंटवारा करा पाते तो मान लिया जाता कि वे अच्छे रणनीतिकार हैं। लेकिन गठबंधन और सीट बंटवारे दोनों में उन्होंने कांग्रेस का भट्ठा बैठा दिया।

एक समय था कि सोनिया गांधी के नजदीकी नेताओं और सलाहकारों की टीम के प्रति देश भर के कांग्रेस नेताओं के मन में सम्मान होता था। वे उनसे डरते भी थे। लेकिन अब राहुल गांधी की टीम मजाक का विषय है। उनकी एक ‘जय जगत’ टीम की चर्चा होती है, जिसके नेता सचिन राव बताए जाते हैं। इस टीम के नेता जाति, धर्म, धनबल, बाहुबल आदि से ऊपर उठ कर राजनीति करने के समर्थक बताए जाते हैं। अच्छी बात है। महात्मा गांधी साध्य की तरह साधन को भी पवित्र मानते थे। लेकिन क्या आज की राजनीति में ऐसा करना संभव और व्यावहारिक है? यह भी सवाल है कि राहुल गांधी जब 20 साल तक पुराने ढंग की राजनीति कर चुके तो अब गांधी मार्ग अपना कर क्या वे कांग्रेस का भला कर पाएंगे?

बहरहाल, कांग्रेस के सामने भाजपा के साथ साथ 24 घंटे राजनीति करने वाले प्रादेशिक क्षत्रपों की भी चुनौती है। उनसे निपटने के लिए राहुल गांधी नए और अराजनीतिक लोगों की टीम बना रहे हैं। कह सकते हैं कि कई बार खास किस्म की राजनीति से उब जाने के बाद लोग दूसरा विकल्प पसंद करते हैं। लेकिन भारत में अभी वैसी राजनीति का समय नहीं आया है। दूसरी बात यह है कि धीरे धीरे कांग्रेस पार्टी में ऐसे नेताओं की कमी होती जा रही है, जो अखिल भारतीय राजनीति समझते हैं या देश के हर राज्य में एक राजनीतिक असर रखते हैं। उनकी जगह लेने के लिए दूसरी कतार के नेता जल्दी सामने नहीं आते हैं तो कांग्रेस की समस्या और बढ़ेगी।


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