संसद का सत्र सुचारू रूप से कैसे चले?

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

संसद का शीतकालीन सत्र सोमवार, एक दिसंबर से शुरू हो गया है। बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की भारी भरकम जीत के बाद यह सत्र हो रहा है। नए उप राष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन का यह पहला सत्र है। वे पहली बार उच्च सदन यानी राज्यसभा का संचालन कर रहे हैं। पिछले यानी मानसून सत्र में विवाद का जो मुख्य मुद्दा रहा था और जिस मुद्दे पर पूरा सत्र जाया हुआ था वह इस सत्र में भी है। दो दो जजों के खिलाफ महाभियोग का मामला भी है तो मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग लाने की विपक्ष की तैयारियां भी हैं। तभी सवाल है कि संसद का यह छोटा सा सत्र कैसे सुचारू रूप से चलेगा? ध्यान रहे शीतकालीन सत्र सिर्फ 19 दिन का है और इसमें 15 बैठकें होंगी।

इसमें सरकार को 10 विधेयक पेश करने हैं। हालांकि सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि संविधान के 131वें संशोधन का विधेयक पेश करने की उसकी कोई मंशा नहीं है। पहले यह प्रस्तावित विधेयकों की सूची में था। इसमें चंडीगढ़ को संविधान के अनुच्छेद 240 के तहत लाने का प्रस्ताव है। इससे चंडीगढ़ प्रशासन को केंद्र सरकार के नियमों से संचालित करने का अधिकार मिल जाएगा। सत्र के पहले दिन सरकार और विपक्ष दोनों ने अपना रवैया दिखा दिया है। सत्र शुरू होने से पहले प्रधानमंत्री ने मुख्य विपक्षी कांग्रेस को निशाना बनाते हुए कह दिया कि कुछ पार्टियां हार नहीं पचा पाती हैं। उनके इस बयान को कांग्रेस ने अहंकार बताया है। इस जुबानी जंग और दोनों सदनों में हंगामे के साथ कार्यवाही शुरू हुई है। फिर भी अगर दोनों पक्ष अपने रुख में थोड़ा लचीलापन ले आएं तो संसद का सत्र सुचारू रूप से चल सकता है। लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति को भी इसमें थोड़ी पहल करनी चाहिए।

संसद को सुचारू रूप से चलाने की पहली जिम्मेदारी सरकार की होती है। अगर सरकार विवाद के मुद्दों पर चर्चा के लिए तैयार हो जाए तो टकराव की 90 फीसदी संभावना समाप्त हो जाती है। मिसाल के तौर पर पिछले सत्र से विपक्ष चाहता है कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर पर चर्चा कराई जाए। पिछला पूरा सत्र इस पर विवाद में जाया हुआ था। ध्यान रहे सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा करा ली थी। सरकार को भी पता है कि चर्चा होते ही वह मुद्दा समाप्त हो गया। उसके बाद फिर कभी भी विपक्ष ने उसका मुद्दा नहीं उठाया। लेकिन एसआईआर पर चर्चा नहीं हुई तो मुद्दा आज तक चल रहा है।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू का यह कहना सही है कि सरकार चुनाव आय़ोग के प्रवक्ता नहीं है। लेकिन चुनाव आयोग द्वारा शुरू किए गए एसआईआर पर चर्चा कराने का फैसला तो सरकार को ही करना है! दूसरी बात यह है कि आयोग पर जो आरोप विपक्ष लगा रहा है उसका लाभार्थी तो भाजपा को ही बता रहा है तो वैसे भी भाजपा को चर्चा के लिए तैयार होना चाहिए ताकि वह अपना पक्ष रख सके। एसआईआर की सफलता बिहार में प्रमाणित हुई है। उसके आंकड़े सरकार के पास हैं। सो, एक बार उसे चर्चा करा लेनी चाहिए, जिससे यह मुद्दा समाप्त हो जाएगा।

सरकार के बाद दूसरी जिम्मेदारी विपक्ष की होती है, जिसने अरुण जेटली की इस बात की गांठ बांध ली है कि संसद को बाधित करना भी संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा है और इससे भी लोकतंत्र मजबूत होता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि सरकार से अपनी बात मनवाने या जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए कई बार संसद को बाधित करना भी एक रणनीति होती है। लेकिन इस रणनीति का ज्यादा इस्तेमाल नुकसानदेह भी हो सकता है। गौरतलब है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्ष के अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करने और भाजपा के बहुमत से नीचे आने के बाद विपक्ष ज्यादा आक्रामक हुआ है और किसी न किसी मुद्दे पर संसद की कार्यवाही बाधित कर रहा है। लेकिन विपक्ष को भी पता है कि इसका कोई राजनीतिक या चुनावी लाभ उसे नहीं हो पा रहा है।

पिछले लोकसभा चुनाव के बाद हुए राज्यों के चुनावों में छह में से चार राज्यों में एनडीए की सरकार बनी है और जम्मू कश्मीर में भी भाजपा का प्रदर्शन बेहतर हुआ है। कांग्रेस का प्रदर्शन इन सभी राज्यों में खराब रहा है। सो, एक बार चर्चा करके, बहस में हिस्सा लेकर और संसद को सुचारू रूप से चला कर देखना चाहिए। हो सकता है कि उससे विपक्ष को अपनी बात ज्यादा बेहतर ढंग से जनता तक पहुंचाने का मौका मिले। उनको समझना चाहिए कि उनकी गैरहाजिरी में बिना चर्चा के आम जनता से जुड़े जरूरी विधेयक पास हो रहे हैं। कानून बन रहे हैं। यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं है।

दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों यानी स्पीकर और सभापति की भी जिम्मेदारी है कि वे संसद का सुचारू संचालन सुनिश्चित करें। इसके लिए बहुत कुछ करने की जरुरत नहीं है। अगर दोनों सदनों में विपक्ष की बात भी सुनी जाने लगे तो व्यवस्था बहाल हो जाएगी। दुर्भाग्य से भारत में यह व्यवस्था बन गई है कि विपक्ष के 90 फीसदी से ज्यादा प्रस्तावों को आसन की ओर से खारिज किया जाता है और सरकार के 99 फीसदी प्रस्तावों को स्वीकार किया जाता है। इससे ऐसा लगता है कि आसन की ओर से नहीं, बल्कि सरकार की ओर से संसद का संचालन किया जा रहा है। अगर विपक्ष के भी प्रस्तावों को संतुलित अनुपात में स्वीकार किया जाए तो संसद के सुचारू संचालन का रास्ता बनेगा।

अभी विपक्ष को ऐसा लगता है कि उनकी बात पूरी तरह से अनसुनी की जाती है। चर्चा या काम रोको प्रस्ताव बिना सुने खारिज किए जाते हैं। उनके प्रतिरोध को दबाने का प्रयास किया जाता है। सदन में वेल में जाने से लेकर नारेबाजी करने, प्लेकार्ड ले जाने से रोका जाता है। साथ ही तुरंत सदन से निलंबित करने के फैसले हो रहे हैं। सरकार को विपक्ष की गैरहाजिरी में जरूरी विधेयक पास कराने की अनुमति दी जा रही है। यह धारणा बदलनी चाहिए।

विपक्ष की हमेशा यह मांग रहती है कि प्रधानमंत्री संसद में ज्यादा समय दें। पिछले सत्र में भी लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऑपरेशन सिंदूर पर हुई चर्चा का जवाब दिया और दो घंटे से ज्यादा का भाषण दिया। लेकिन उससे पहले वे सदन में नहीं बैठे और राज्यसभा में तो न जवाब दिया और न केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के समय मौजूद रहे। ध्यान रहे प्रधानमंत्री संसद सत्र के दौरान संसद भवन के अपने कार्यालय में रहते हैं लेकिन दोनों सदनों में बहुत कम समय देते हैं।

अगर प्रधानमंत्री की मौजूदगी संसद की कार्यवाही के दौरान बढ़ेगी तो विपक्ष को भी मजबूरी में मौजूद रहना होगा और बेहतर ढंग से कार्यवाही चल पाएगी। हालांकि इसमें भी सत्तापक्ष के सांसदों को भी ध्यान रखना चाहिए कि प्रधानमंत्री की मौजूदगी में उनके नाम के नारे लगाने, मेज थपथपाने और विपक्ष का मजाक उड़ाने को बाहर अच्छा नहीं माना जाता है। यह संसद की मर्यादा के अनुरूप नहीं है। ऐसे छोटे छोटे उपायों से संसद का सुचारू संचालन सुनिश्चित किया जा सकता है।


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