भारतीयों में देश छोड़ने की होड़

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

पहले कुछ आंकड़ों से ही बात शुरू करते हैं। ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट यानी ओईसीडी की ओर से सोमवार, तीन नवंबर को इंटरनेशनल माइग्रेशन आउटलुक 2025 जारी किया गया। इसके मुताबिक 2023 में सवा दो लाख भारतीयों ने ओईसीडी समूह के देशों की नागरिकता हासिल की। इस अवधि में पूरी दुनिया से करीब 28 लाख लोगों ने ओईसीडी देशों की नागरिकता ली है, जिसमें अकेले भारत से सवा दो लाख लोग हैं।

भारत के बाद दूसरे स्थान पर फिलीपींस है, जिसके एक लाख 32 हजार लोगों ने 2023 में ओईसीडी देशों की नागरिकता हासिल की है। तीसरे स्थान पर चीन है, जिसके 96 हजार लोग इन देशों में बसे। भारतीय लोगों में ओईसीडी समूह के देशों की नागरिकता लेने का यह ट्रेंड ऐसा नहीं है कि एक साल का है। यह साल दर साल बढ़ता जा रहा है। 2022 में दो लाख 15 हजार के करीब लोगों ने ओईसीडी देशों की नागरिकता ली थी और उससे पहले 2021 में दो लाख सात हजार के करीब लोग इन देशों में जाकर बसे थे।

ओईसीडी समूह में कुल 38 देश हैं, जिनमें अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा जैसे देश शामिल हैं। इसमें उत्तरी अमेरिकी देशों के अलावा ज्यादातर यूरोपीय देश हैं। इन देशों की विशेषता यह है कि ये आर्थिक रूप से विकसित तो हैं ही साथ ही इन देशों में मानव जीवन के अनुकूल सबसे बेहतर स्थितियां हैं। हवा और पानी स्वच्छ है। खाने पीने की चीजें प्रदूषित नहीं हैं। कानून व्यवस्था की स्थिति बहुत बेहतर है। स्वास्थ्य व शिक्षा की विश्व स्तरीय व्यवस्था है और मानवाधिकारों के प्रति सजग दृष्टि है। तभी दुनिया भर के लोग इन देशों में बसना चाहते हैं। यह अलग बात है कि इन देशों के नागरिकों में बाहरी लोगों के प्रति नाराजगी बढ़ने लगी है और वे खुल कर विरोध करने लगे हैं। बहरहाल, भारत की नागरिकता छोड़ने वालों में सबसे ज्यादा 78 हजार से कुछ ज्यादा लोगों ने कनाडा में नागरिकता ली है, जबकि 52 हजार से कुछ ज्यादा लोग अमेरिका के नागरिक बने हैं। इसके बाद ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड का नंबर है।

इन आंकड़ों के बीच एक बड़ा दिलचस्प ट्रेंड यह दिख रहा है कि 2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है और यह प्रचार शुरू हुआ है कि भारत विश्वगुरू बन रहा है और दुनिया में भारत का डंका बज रहा है उसके बाद लोगों के देश छोड़ने का चलन ज्यादा बढ़ा है। इसमें अचानक बहुत तेज बढ़ोतरी हुई है। भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने से एक साल पहले 2013 में सिर्फ 15,388 भारतीयों ने ओईसीडी समूह के देशों की नागरिकता ली थी। ध्यान रहे उस समय इन देशों की नागरिकता हासिल करना बहुत आसान था। इन देशों में नाममात्र के लिए भी भारत विरोध की भावना नहीं थी। इन देशों के नागरिक भारतीय लोगों का खुले दिल से स्वागत करते थे। फिर भी भारत की नागरिकता छोड़ कर इन देशों में जाने वालों की संख्या बहुत सीमित थी। अब इन देशों में खास कर शीर्ष चार देशों, कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में भारत विरोधी भावनाएं बहुत बढ़ गई हैं। इन देशों के कई शहरों में भारतीय नागरिकों के ऊपर हमले हुए हैं और देश छोड़ कर जाने को कहा गया है। आए दिन भारत के लोग घृणा और हिंसा का शिकार हो रहे हैं। इतना ही नहीं इन देशों ने नागरिकता के नियम भी सख्त कर दिए हैं। फिर भी भारत छोड़ कर इन देशों की नागरिकता लेने की होड़ मची है।

दिलचस्प बात यह है कि भारत से लोग किसी मानवीय संकट की वजह से इन देशों में नहीं जा रहे हैं। दुनिया के कई देशों खास कर मुस्लिम देशों से शरणार्थी मानवीय संकट के कारण इन देशों में जा रहे हैं। लेकिन भारत से जाने का ट्रेंड आउट ऑफ च्वाइस है। यानी लोग अपनी पसंद से इन देशों में जा रहे हैं। नागरिकता हासिल करने से पहले बड़ी संख्या में भारतीय लोग इन देशों में कामकाज के सिलसिले में जा रहे हैँ। 2023 में करीब छह लाख भारतीय इन देशों में पेशेवर कारणों से गए। यह उससे पहले यानी 2022 के मुकाबले आठ फीसदी ज्यादा था। अगले दो साल यानी 2024 और 2025 के आंकड़े बाद में आएंगे। लेकिन जो ट्रेंड है उसके कमजोर होने के संकेत नहीं हैं, बल्कि तमाम विरोध और नफरत के बावजूद भारत के नागरिकों के इन देशों में जाने का सिलसिला तेज हुआ है।

सोचें, यह संख्या कानूनी रूप से इन देशों में जाकर नागरिकता लेने वालों की है या कानूनी रूप से वैध वीजा के साथ इन देशों में जाने वालों की है। इनके अलावा हजारों की संख्या में लोग हर साल अवैध रूप से इन देशों में घुसने का प्रयास करते हैं। यह भी हकीकत है कि भारत के लोग इन देशों में जाकर वहां की बुनियादी व्यवस्था में सकारात्मक योगदान दे रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक ओईसीडी समूह के देशों में भारतीय डॉक्टर और नर्स सबसे बड़ी संख्या में हैं। ब्रिटेन के कुल विदेशी डॉक्टरों में भारत के डॉक्टरों का हिस्सा 23 फीसदी है। इसी तरह अमेरिका में यह हिस्सा आठ फीसदी है।

अब सवाल है कि भारत में ऐसा क्या बदल गया, जिसकी वजह से इतनी बड़ी संख्या में लोग दूसरे विकसित, सभ्य और लोकतांत्रिक देशों में बस रहे हैं या बसने के लिए परेशान हैं? यह बात तो समझ में आती है कि इन देशों में हालात बहुत बेहतर हैं। पिछले दिनों एक जानकार ने बताया कि दुबई जाकर सेटल होने के पीछे एकमात्र कारण सुरक्षा की भावना थी। भारत में कोई भी व्यक्ति अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं हो सकता है। लेकिन दुबई में हर छोटे, बड़े अपराध से सुरक्षा है। सुरक्षा की यह भावना लोगों को ओईसीडी देशों में जाकर बसने के लिए निर्देशित करती है। इसके अलावा बेहतर अवसर की उपलब्धता, बच्चों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा और बेहतर जीवन स्तर भी लोगों को निर्देशित करने वाली शक्ति है। लेकिन यह समझ में नहीं आता है कि भारत छोड़ने के लिए क्या चीज प्रेरित कर रही है? दूसरा सवाल यह है कि लोगों की चिंता अभी की है या भविष्य की चिंता में वे देश छोड़ रहे हैं?

ऐसा लग रहा है कि तात्कालिक कारणों से ज्यादा भविष्य की चिंता में लोग भारत छोड़ने को प्रेरित हो रहे हैं। सरकार की ओर से 2047 तक भारत को विकसित बना देने के वादे पर कम से कम उस वर्ग के लोगों में भरोसा नहीं है, जो पेशेवर योग्यता के दम से दुनिया के किसी देश में जाकर काम हासिल करने और बसने में सक्षम हैं या आर्थिक रूप से इतने सक्षम हैं किसी भी देश में जाकर बस सकते हैं। इसका अर्थ है कि देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता को लेकर उनके मन में संदेह है। सरकार के विकास के दावों को लेकर भी उनके मन में भरोसा नहीं है। यही कारण है कि अर्थ और ज्ञान से संपन्न लोग देश छोड़ने की बेचैनी में हैं।


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