बचत से कर्ज की ओर बढ़ रहा है भारत

Categorized as अजित द्विवेदी कालम

भारत के प्राचीन दर्शन में कर्ज लेकर घी पीने की सलाह देने वाले ऋषि भी हुए हैं। कर्ज की मय पीकर फाकामस्ती के रंग लाने की उम्मीद पालने वाले शायर भी हुए। लेकिन भारत के लोगों ने कभी भी कर्ज लेकर घी या मय पीने को जीवन का सिद्धांत नहीं बनाया। इसकी बजाय भारत मितव्ययिता को जीवन का सार मानने वाला देश रहा। लघु बचत के मामले में भारतीयों का जवाब नहीं है। तभी जब 2008 में दुनिया भर में मंदी आई, जिसे अमेरिका के सब प्राइम क्राइसिस के नाम से जाना जाता है तो भारत पर उसका कोई असर नहीं हुआ। भारत में सब कुछ सामान्य तरीके से चलता रहा। इसका कारण भारत के आम लोगों की लघु बचत रही। ध्यान रहे भारत के बैंकों ने राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार के कारण आम लोगों की बचत का बहुत पैसा लुटाया है। राजनेताओं के संरक्षण में लाखों करोड़ रुपए के बैंकिंग फ्रॉड हुए। फिर भी बैंकों की सेहत बहुत जल्दी सुधर गई क्योंकि भारत के लोग कर्ज लेकर मौजमस्ती करने की बजाय पैसे जमा करने को ज्यादा श्रेष्ठ आचरण मानते हैं।

परंतु अब प्राचीन काल से चला आ रहा जीवन मूल्य बदल रहा है। अब भारत में कर्ज लेने का चलन तेजी से बढ़ रहा है। दिखावे से दूर सादा जीवन और उच्च विचार के भारतीय दर्शन को नई पीढ़ी पीछे छोड़ कर वैसे ही दिखावे में दिवालिया होने की ओर बढ़ रही है, जैसे दक्षिण कोरिया के गगनम में हुआ। ‘ओपन गगनम स्टाइल’ गाना तो लोगों को ध्यान ही होगा। अमेरिका और लगभग समूचे पश्चिम में उपभोक्तावाद कर्ज लेकर घी या मय पीने के जीवन दर्शन पर ही फला फूला है। यह हकीकत है कि अमेरिका में औसत व्यक्ति अपने जीवन में जितना कमाएगा उतना वह कर्ज ले चुका है। सबका जीवन क्रेडिट पर चल रहा है। भारत भी उस जीवन दर्शन की ओर बढ़ रहा है। भारत तेजी से ऐसे लोगों का देश बनता जा रहा है, जिनका जीवन बैंक की किस्तें चुकाने के संघर्ष में जाया हो रहा है या आने वाले समय में होगा। आजकल हर चीज किस्तों पर उपलब्ध है। किस्तों पर आईफोन खरीदे जा रहे हैं। किस्तों पर विदेश दौरे हो रहे है और किस्तों पर शादियों के भव्य और चमकदार समारोह आय़ोजित किए जा रहे हैं। किस्तों पर बीमारियों के इलाज हो रहे हैं वह एक अलग संकट है।

अमेरिका या पश्चिमी दुनिया के मुकाबले भारत में फर्क यह है कि वहां सामाजिक सुरक्षा की योजनाएं हैं, जो भारत में नहीं हैं। वहां नौकरी जाने पर अच्छा खासा बेरोजगारी भत्ता मिलता है और जल्दी ही नौकरी मिल जाने की संभावना रहती है। भारत में ऐसा कुछ नहीं है। वहां कर्ज देने की सांस्थायिक व्यवस्था है। इसके उलट भारत में जैसे नौकरी असंगठित क्षेत्र की है वैसे ही कर्ज देने की व्यवस्था भी असंगठित क्षेत्र की है। ऐप के जरिए कर्ज देने वाली कंपनियों हजारों की संख्या में हैं। जो बिना किसी कोलैटरल के किसी ऐप के जरिए इंस्टेंट कर्ज देती हैं और साल में 18 फीसदी तक ब्याज वसूलती हैं। ब्याज और कर्ज चुकाने में असफल रहने पर सोशल मीडिया में बदनाम करने से लेकर गुंडे भेज कर धमकी देने और मारपीट तक होने की घटनाएं आम हैं। ऐप के जरिए इंस्टैंट लोने देने वाली कंपनियों के कर्ज के जाल में फंसे लोगों के बदनामी के डर से आत्महत्या करने की अनेक घटनाएं हुई हैं। आम नौजवान एक से ज्यादा क्रेडिट कार्ड से दिल खोल कर खर्च कर रहा है और उसके बाद उसका बकाया चुकाने के लिए संघर्ष कर रहा है।

क्रेडिट कार्ड के प्रचार और ‘बाई नाऊ पे लैटर’ के सिद्धांत ने युवाओं को इस जाल में ज्यादा उलझाया है। यह इस साल का यानी 2025 का आंकड़ा है कि चार में से एक व्यक्ति यानी 25 फीसदी लोग पर्सनल लोन ले रहे हैं और उसे मौजमस्ती करने, छुट्टियां मनाने, घऱ की साज सज्जा कराने या मेडिकल का बिल भरने पर खर्च कर रहे हैं। यह भी 2025 का आंकड़ा है कि आज चार में से एक आईफोन किस्तों पर खरीदा जा रहा है या क्रेडिट कार्ड से खरीदा जा रहा है। शादी की तैयारी कर रहे नए जोड़ों में से 26 फीसदी ने एक सर्वे में कहा है कि वे अपनी शादी को भव्य तरीके से करने के लिए पर्सनल लोन लेंगे। इन सबका असर यह हुआ है कि कर्ज की बढ़ती मात्रा चौंकाने वाले स्तर पर पहुंच गई है। 2014 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के अनुपात में 26 फीसदी घरेलू कर्ज था, जो 2024 में बढ़ कर 41.9 यानी करीब 42 फीसदी हो गया। सोचें, घरेलू कर्ज और जीडीपी का अनुपात 10 साल में 16 फीसदी बढ़ गया। यह बैंकिंग का आंकड़ा है कि अनसिक्योर्ड खुदरा कर्ज, जिसकी वसूली मुश्किल हो रही है वह तीन से चार लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। यह जितना आम आदमी का संकट है, उतना ही बड़ा बैंकिंग और देश की वित्तीय व्यवस्था का संकट है।

प्रचार और चमक दमक से प्रभावित भारत के युवा ‘कल हो न हो’ के अंदाज में जी रहे हैं। लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति और भविष्य की संभावनाएं इसको सपोर्ट नहीं करती हैं। तभी वे लगातार कर्ज के जाल में फंसते जा रहे हैं। फीयर ऑफ मिसिंग आउट यानी फोमो सिंड्रोम युवाओं को हर वह काम करने के लिए प्रेरित कर रहा है, जो वे सोशल मीडिया में देख रहे हैं। तभी देखा देखी महंगी चीजें खरीदने, महंगे रेस्तरां में जाने, महंगी शादियां करने या छुट्टियों के लिए महंगी जगहों पर जाने की सोच से उनके ऊपर कर्ज का बोझ बढ़ रहा है। इसमें अगर मेडिकल इमरजेंसी हो जाए तो संकट और गहरा हो जाता है। इन सबका मिला जुला असर यह है कि वित्तीय अपराध बढ़ रहे हैं और युवाओं पर मानसिक दबाव बहुत बढ़ रहा है। अवसाद या दूसरी मेंटल हेल्थ की बढ़ती समस्य़ाओं में कहीं न कहीं इसका भी हाथ है। नौकरी की अनिश्चितता और काम का दबाव उनकी समस्याओं में और बढ़ोतरी कर रहा है।


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